कोरोना काल में ना रोज़गार और ना खाना

और बढ़ती आत्महत्या

मूलतः उत्तरप्रदेश के आज़मगढ़ के रहने वाले अजीत लॉकडाउन के बाद से दिहाड़ी-मज़दूरी छूट जाने की वजह से परेशान थे. लुधियाना पुलिस ने अप्रैल, मई और जून के बीच ज़िले में हुई आत्महत्याओं में 11 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा दर्ज किया है. अजीत इस बीच आत्महत्या करने वाले ज़िले के 76 लोगों में से एक थे.लॉकडाउन के बाद से ही लुधियाना के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 11 और 15 साल के उनके दोनों बेटों को स्कूल और पढ़ाई छोड़नी पड़ गई थी. पति की मौत के बाद अब पढ़ाई-लिखाई की तरफ़ बच्चों की वापसी की उम्मीद सविता की आँखों में मद्धम पड़ने लगी है. परिवार अब तक अजीत की आत्महत्या के गहरे सदमे में है.

मई के उन मुश्किल दिनों को याद करते हुए सविता कहती हैं, “मेरे पति रोज़ की दिहाड़ी करते थे. किसी फ़ैक्टरी में, किसी निर्माण साइट पर या जहाँ भी उनको काम मिलता, वहाँ चले जाते. दिन भर की मज़दूरी से उन्हें कभी 200, कभी 300, तो कभी 400-500 रुपए तक मिल जाते थे. बस उन्ही पैसों से हमारा गुज़ारा होता था. लॉकडाउन के 10-15 दिन बाद ही हमारी हालात ख़राब होने लगी. रोज़ कमाने-खाने वाले लोग थे हम, कोई बचत तो थी नहीं. दिहाड़ी का काम मिलना भी पूरी तरह बंद हो चुका था.”जमा-पूँजी के नाम पर इस प्रवासी मज़दूर परिवार के पास रेहड़ी का एक ठेला था. कोई रास्ता न देखते हुए अजीत ने उसे भी दो हज़ार रुपए में बेच दिया लेकिन वह पैसे भी कुछ हफ़्तों में ख़त्म हो गए.

सविता बताती हैं, “पास के थाने ने घोषणा की थी कि लॉकडाउन की वजह से रोज़गार खोने वाले सभी ज़रूरतमंदों को सरकार की तरफ़ से राशन के पैकेट दिए जाएँगे. मेरे पति दो-तीन बार थाने वो राशन का पैकेट लेने गए लेकिन हर बार भीड़ में धक्के खाकर ख़ाली हाथ लौट आए. जिस रात घटना हुई, उस दोपहर भी वो थाने में राशन की उम्मीद में गए थे, लेकिन बात नहीं बनी.””घर में सिर्फ़ आधा किलो चावल और एक किलो आटा बचा था. लेकिन ग़रीब मज़दूरों की कौन सुनता है? घर आए तो पहली बार मैंने उन्हें सोच में डूबा हुआ देखा. शाम हो गई थी, तो मैंने चाय बनाकर दी उन्हें. चाय पीते हुए कहते रहे कि मैं चिंता न करूँ. राशन की कुछ न कुछ व्यवस्था हो ही जाएगी. मैंने भी उनसे कहा कि वो भी चिंता न करें. कुछ न कुछ इंतज़ाम हो ही जाएगा. फिर मैंने रात का खाना बनाया. परोस के सबसे पहले बेटे को थाली पकड़ाई और कहा कि अपने पापा को खाना दे आए. बेटा थाली लिए-लिए उनके कमरे में घुसा और तुरंत मम्मी-मम्मी पुकारता हुआ चिल्लाने लगा. मैं दौड़ते हुए गई, तो देखा वो कमरे में अपनी जान दे चुके थे.”

घटना के 10 दिन बाद सविता अपने बेटों के साथ श्रमिक एक्सप्रेस से आज़मगढ़ आ गईं. बच्चों को पढ़ाने, मज़दूरी करने और ज़िंदगी वापस शुरू करने की उम्मीद में उन्होंने लुधियाना का किराए का घर ख़ाली नहीं किया है.लुधियाना के आख़िरी दिनों की तकलीफ़ सविता की आवाज़ में चुभती कील सी उभर आती है. “हम लॉकडाउन के शुरू में ही गाँव आ जाना चाहते थे, लेकिन कोई साधन ही नहीं था. अगर गाँव चले गए होते, तो खाने-पीने का दुख नहीं होता. शहर में तो मदद करने वाला भी कोई नहीं था. जो कुछ लोग पहचान के थे वो भी पाँच किलो आटे से ज़्यादा कितनी मदद कर पाते? फिर आख़िरकार सरकार ने हमको गाँव भी भेजा, लेकिन तब जब हम अपना सब कुछ इस शहर में खो चुके थे.” ये कहते हुए सविता के शब्द आंसुओं में बिखर जाते हैं.

लुधियाना पुलिस की ओर से जारी आँकड़ों के अनुसार लॉकडाउन के बाद अप्रैल-मई और जून के महीनों में ज़िले में आत्महत्या दर में 11 फ़ीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस बीच हुई 76 आत्महत्याओं के लिए पुलिस ने अवसाद के साथ-साथ घरेलू कलह और आर्थिक विषमताओं को भी प्रमुख कारण बताया.ज़िले के पुलिस आयुक्त राकेश अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि लॉकडाउन खुलने के बाद से हालात में सुधार हो रहा है. उन्होंने बताया, “कोरना और लॉकडाउन ने यहाँ सभी के जीवन को गहरे तक प्रभावित किया है. लेकिन लोगों की मदद के लिए हमने पुलिस का हेल्पलाइन नंबर शुरू किया है और धीरे-धीरे चीज़ों के वापस नॉर्मल होने की उम्मीद है.”2016 में हुए सबसे हालिया ‘राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 करोड़ लोगों को चिकित्सकीय मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरत है जबकि यह सेवाएँ सिर्फ़ 3 करोड़ भारतीयों को मिल पा रही हैं.

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति उदासीन सामाजिक रवैए को दिखाने वाला दूसरा आँकड़ा यह बताता है कि दुनिया भर में आत्महत्या करने वाली सभी महिलाओं में से 36 प्रतिशत भारतीय महिलाएँ हैं. विश्वप्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका लैंसेट के अक्तूबर 2018 के ‘लैंसेट पब्लिक हेल्थ’ अंक में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक़ विश्व की कुल जनसंख्या में मात्र 18 फ़ीसदी हिस्सा रखने वालीं भारतीय महिलाएँ दुनिया में होने वाली कुल स्त्री आत्महत्याओं में 36 फ़ीसदी हिस्सा रखती हैं.वहीं, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने अपने सरकारी आँकड़ों में 3.6 प्रतिशत की बढ़त दर्ज करते हुए बताया कि 2018 में देश में 1 लाख 34 हज़ार लोगों ने ख़ुद अपनी जान ली है.यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि 2018 में पारित हुए ‘मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017’ के तहत भारत में आत्महत्या के अपराधीकरण का क़ानून ख़त्म करते हुए मानसिक बीमरियों से जूझ रहे लोगों को मुफ़्त मदद का प्रावधान किया गया है.इस नए क़ानून के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के मदद पहुँचाना, इलाज करवाना और पुनर्वास देना सरकार की ज़िम्मेदारी होगी.

भारत के साथ-साथ पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ से जूझ रहे लोगों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. हालाँकि, इस मामले में अभी तक विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से कोई ठोस बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे शोध अवसाद और आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों पर कोरोना के संभावित असर को दर्ज करते हैं.सर्वे के नतीजे बताते हुए एक ई-मेल इंटरव्यू में एसपीआईएफ़ के संस्थापक नेल्सन विनोद मोज़ेस ने कहा कि कोरोना के बाद से देश में ख़ुद को चोट पहुँचाने (स्लेफ़ हार्म), अपनी मृत्यु की कामना करने और ख़ुद अपनी जान लेने की प्रवृत्ति कई गुना बढ़ी हुई पाई गई है.

नेल्सन विनोद मोज़ेस कहते हैं, “भारत में आत्महत्या की दर वैसे भी ग्लोबल एवरेज से 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा है. ऐसे में हालात तो पहले ही मुश्किल थे लेकिन कोरोना के बाद बीमारी के जिस भय और जिन आर्थिक विषमताओं का सामना लोगों को करना पड़ा है, उसने कई लोगों को हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया है. हमारे सर्वे के नतीजों के अनुसार कोरोना के बाद से तक़रीबन 65 प्रतिशत लोगों ने ख़ुद को मारने के बारे में सोचा या ऐसे प्रयास किए. साथ ही तक़रीबन 71 प्रतिशत लोगों में कोरोना के बाद मरने की इच्छा बढ़ी हुई पाई गई है.”

मानसिक स्वास्थ्य कर्मचारियों ने एसपीआईएफ़ को यह भी बताया कि अवसाद के शिकार पुराने ठीक हो चुके मरीज़ दोबारा अवसाद की गिरफ़्त में जा रहे हैं. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए मदद मांगने आने वाले मरीज़ों की संख्या में भी 68 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.इसके बाद हरकत में आए स्थानीय प्रशासन ने आनान-फानन में मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों के लिए ‘पुलिस मित्र’ नाम से एक हेल्प लाइन शुरू की. ज़िले के पुलिस अधीक्षक विवेक सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि लॉकडाउन के बाद स्थानीय लोगों में घरेलू विवाद, तनाव और अवसाद के मामले बढ़े हुए पाए गए थे.

विवेक सिंह ने बताया, “कोरोना के बाद लोग घरों में बंद हो गए और अचानक घरेलू विवाद के मामले बढ़ने लगे. हमारे ज़िले में तो बच्चों के आत्महत्या करने के मामले भी सामने आए हैं. जैसे किसी भी काम से मना किया गया, तो नाराज़ होकर बच्चों ने आत्महत्या कर ली. बाक़ी की कई घटनाएँ आर्थिक विषमताओं के चलते हुई थीं. उदाहरण के लिए हमारे यहाँ एक टेंट और कैटरिंग के व्यवसायी ने आर्थिक समस्या के कारण आत्महत्या कर ली. उसने अपने व्यवसाय और शादी के लिए हाल ही में लोन लिया था और तभी कोरोना के चलते सारा काम ठप पड़ गया.”

सुरेश झामवानी कहते हैं, “लॉकडाउन और कोरोना से वैसे तो सभी को बहुत दिक़्क़त हुई है, लेकिन खंडवा का हमारा व्यापारी सिंधी समाज तो सीधे-सीधे इसमें पिस गया. हमारे सारे धंधे चौपट हो गए और अब लॉकडाउन खुलने के बाद भी व्यापार को गति पकड़ने में न जाने कितने महीने लग जाएँगे. बड़े भाई साहब की भी अपनी एक किराने की दुकान थी. रोज़ 1000-1500 की बिक्री हो जाती थी और उसी में से जो 100-200 रुपए का मुनाफ़ा होता था रोज़ का, उसी से उनका घर चलता. घर में पत्नी हैं और दो बेटियाँ हैं. एक 10 बरस की है और एक 13 की. पूर परिवार दुकान की कमाई पर आश्रित था. लेकिन कोरोना के दो मामले निकलने के बाद पुलिस ने पूरे क्षेत्र को सील बंद कर दिया. 12 जून को जब भाई साब गए हैं, तब उनकी दुकान बंद हुए 45 दिन बीत चुके थे.”

बड़े भाई से हुई अंतिम बातचीत को याद करते हुए सुरेश बताते हैं कि दुकान का बंद होना उन्हें लगातार अवसाद में धकेल रहा था.सुरेश कहते हैं, “जब भी बात होती, वो एक ही रट लगाए रहते. कब खुलेगा लॉकडाउन? खुल भी गया, तो दुकान कब खुलेगी? दुकान खुलेगी, तो लोग सामान ख़रीदेंगे या नहीं? घर का ख़र्च कैसे चलेगा? वो बस इन्हीं सब सवालों में ग़ुम रहते. हम उन्हें तस्सली भी दिलाते कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा लेकिन वो अंदर ही अंदर घुलते जा रहे थे.”बीबीसी से बातचीत में खंडवा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर डीएस चौहान ने कहा कि सभी मौतों को सीधे-सीधे कोरोना से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. उन्होंने बताया, “कुछ लोग जो व्यापारी वर्ग से आते थे, उनकी आत्महत्या के मामलों में तो कोरोना से संबंध हो सकता है, लेकिन बाक़ी मामलों में पारिवारिक कलह और घरेलू हिंसा जैसे पुराने कारण भी रहे हैं.”

बीबीसी से बातचीत में ज़िले में बढ़ रही आत्महत्याओं का ग्राफ़ खींचते हुए वह कहते हैं, “लॉकडाउन के एकदम बाद शुरू के दिनों में हमारे पास कोरोना से डरे हुए मरीज़ आते थे. फिर महीने भर बाद जब यह साफ़ होने लगा कि कई लोग ठीक होकर घर भी जा रहे हैं, तब सबको समझ में आया कि यह मामला एक महीने में नहीं निपटने वाला है. इसके बाद हमारे पास लोग ‘लॉकडाउन कब खुलेगा, कोरोना कब जाएगा?’ जैसे सवालों की चिंता के साथ आने लगे. दिहाड़ी मज़दूर, नाश्ता-चाय बेचने वाले, छोटा मोटा होटल या ट्रांसपोर्ट का धंधा करने वाले लोग तो 15 दिन में ही एकदम हाशिए पर आ गए. लोगों के सामने दो जून की रोटी जुटाने का संकट था.”

लॉकडाउन और उसके बाद के महीनों के समाज के अलग-अलग वर्गों पर पड़ रहे प्रभाव को समझाते हुए डॉक्टर इंगले बताते हैं, “नौजवान छात्रों में भविष्य की अनिश्चिता को लेकर तनाव था. ख़ासतौर पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे बच्चे तो ज़्यादा अवसाद में आ रहे हैं. बूढ़ों को अवसाद में लग रहा है कि वो किसी काम के नहीं रहे. यहाँ तक कि मेरे पास मज़दूरों के मामले भी आते, जो व्यापारियों कि दुकानों पर काम ढूँढते, भटकते और व्यापारी यह कहकर हाथ जोड़ लेते कि उनका ख़ुद का काम ठप पड़ा है. वह किसी और को रोज़गार क्या देंगे? यहाँ लोगों के बीच में अवसाद के साथ-साथ घरेलू विवादों और हिंसा के मामले भी बढ़ रहे हैं. आत्महत्या के मामले तो बढ़े ही हैं. यहाँ तक कि अब भी आत्महत्या का प्रयास करने वाले दो से तीन मामले तो रोज़ आ ही जाते हैं.”

इस रिपोर्ट के लिए किए गए साक्षात्कारों के दौरान अवसाद के शिकार कई लोगों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर घर में रहने को ‘घुटन’ से जोड़ते हुए कहा कि वह शहरों में माचिस के डिबिया सरीखे छोटे और बंद घरों में रहने को मजबूर हैं.”घर में हिलने की भी जगह नहीं. सारा दिन दीवारें देखती रहती हूँ. ऐसा लगता है जैसे दीवारें मुहँ को आ रही हों और फिर अचानक घबराहट होने लगती है”- ऐसी बातें कई मरीज़ों ने साझा की.शहरी मकानों, मानसिक स्वास्थ्य और अवसाद के गहरे संबंध पर बात करते हुए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ अर्बन सेटेलमेंट से जुड़ीं और ‘नगरीय आवास प्रबंधन अधिकारों’ पर काम करने वाली राशि मेहरा कहती हैं कि ‘घर’ का लोगों के मानसिक स्वास्थ्य से सीधा संबंध है.

राशि मेहरा ने कहा, “कोरोना ने हम सभी को शहरी आवासों को नए सिरे से देखने के लिए मजबूर किया है. लेकिन सच तो यह है कि ग़रीब चाहे लुधियाना का हो, खंडवा का या दिल्ली का, उसे सँकरे अंधेरे घरों में ही रहना पड़ता है. मसलन हमारे शोध के मुताबिक़ झुग्गी बस्ती में रहने वाली दिल्ली की 30 प्रतिशत जनसंख्या राजधानी की मात्र 0.6 प्रतिशत ज़मीन पर रह रही है. इन ग़रीबों से ज़्यादा (2 प्रतिशत) तो राजधानी में गाड़ियों की पार्किंग की जगह है. लेकिन, अब कोरोना के बाद हमें घर और आवासीय परिसरों का निर्माण कुछ इस तरह से करना होगा जिससे लोगों के पास ‘सामुदायिक जगहें’ बचें. पार्क हों, वाचनालय और ऐसे सामुदायिक स्थान हों जहाँ घबराहट होने पर आदमी आस-पड़ोस के दो लोगों से मिलने या दो बातें करने जा सके.”

बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, “देखिए, कोरोना और उससे लोगों को हो रही आर्थिक और रोज़गार की क्षति अवसाद का बहुत बड़ा कारण है. लेकिन, हमें यह समझना होगा कि मरीज़ एक ही दिन में आत्महत्या के ख़्याल तक नहीं पहुँचता. इससे पहले अवसाद के हल्के लक्षण नज़र आते हैं. जैसे कि नींद न आना, नींद बार-बार टूटना, भूख न लगना, अपने दोस्तों या परिजनों से कम बात करना, उदास रहना, ऐसे काम जिनमें आपको पहले ख़ुशी मिलती थी, जैसे खेलना इत्यादि, अब उन कामों में ख़ुशी न मिलना. ऐसे लक्षण होने पर तुरंत ही किसी मनोचिकित्सक से परामर्श लें. सही समय पर इलाज और देखरेख होने से अवसाद को बढ़ने से रोका जा सकता है.”

प्रियंका दुबे

बीबीसी से साभार