अमर शहीद उधम सिंह के अधूरे सपने को साकार करें!

जन्म दिवस 26 दिसम्बर; शहादत दिवस 31 जुलाई

क्या चाहते थे शहीद उधम सिंह?

भारत की आज़ादी के आन्दोलन के उधम सिंह अमर सेनानी और हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता के प्रतीक पुरुष रहे हैं। अंग्रेजी गुलामी के इतिहास के काले पन्नों में से एक- जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्ड के ख़ूनी दृश्य को उन्होंने अपनी आँखों से देखा था और जालिमों से बदला लेने की ठानी, जिसे पूरा करके यह शहीद अमर हो गया। लेकिन उनका सपना आज भी अधूरा है।

अनाथालय से क्रांति के पथ तक

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब प्रान्त के संगरूर जि़ले के सुनाम गाँव हुआ था। छोटी उम्र में ही माँ-बाप और बड़े भाई की मृत्यु की वजह से वह अनाथ हो गये। उनका लालन-पोषण अनाथालय में हुआ। मैट्रिक की पढ़ाई कर उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर जंग-ए-आज़ादी के मैदान में कूद पड़े। 1924 में विदेशों में भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली क्रान्तिकारी गदर पार्टी में सक्रिय रहे और विदेशों में चन्दा जुटाने का काम किया। उधम सिंह ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए), इण्डियन वर्कर्स एसोसिएशन आदि क्रान्तिकारी संगठनों के साथ अलग-अलग समय पर काम भी किया।

13 अप्रैल का वह भयावह हत्याकांड

अंग्रेज हुक्मरानों ने भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने के उद्देश्य से अक काले कानून ‘रॉलेट ऐक्ट 1919’ (अराजक और क्रान्तिकारी अपराध अधिनियम, 1919) को निर्मित किया था। इस क़ानून के अनुसार ब्रिटिश सरकार किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुक़दमा चलाये और सुनवाई किये उसे जेल में डाल सकती थी। जिसके विरोध में देशव्यापी हड़तालें, जुलूस और प्रदर्शन हो रहे थे। उन्ही में से एक था पंजाब के अमृतसर का जलियाँवाला बाग़।

13 अप्रैल सन् 1919 को वैशाखी के दिन निहत्थी जनता पर अंग्रेज़ों ने गोलियाँ चलवा दी थीं। अमृतसर के जलियाँवाला बाग़़ में के विरोध में शान्तिपूर्वक तरीक़े से विरोध कर रहे महिलाओं-बच्चों-बूढ़ों समेत सैकड़ों भारतीयों पर अंग्रेज़ी हुकूमत के नुमाइन्दों ने अन्धाधुँध गोलीबारी कर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। इस गोलीकाण्ड में हज़ारों लोग घायल और शहीद हुए थे। गोली चलाने का हुक्म ‘जनरल एडवर्ड हैरी डायर’ नामक अंग्रेज़ अफ़सर ने दिया था। किन्तु इसके पीछे पंजाब के तत्कालीन गवर्नर जनरल रहे ‘माइकल ओ’ड्वायर’ का हाथ था।

उधम सिंह ने सबक सिखाने का संकल्प लिया

गोरी हुकूमत द्वारा रचे गये इस क़त्लेआम का बालक उधम सिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने इसके ज़िम्मेदार पंजाब के तत्कालीन गवर्नर को मौत के घाट उतारने का संकल्प लिया। इस हत्यारी घटना के क़रीब 21 साल बाद, 13 मार्च 1940 को लन्दन के एक हॉल में उन्होंने ‘माइकल ओ’ड्वायर’ को गोलियों से निशाना बनाया और ख़त्म कर दिया। ‘ओ’ड्वायर’ की हत्या के बाद उधम सिंह ने खुद अपनी गिरफ़्तारी दी।

उधम सिंह के अमर विचार

उधम सिंह शहीद भगतसिंह से प्रभावित थे और उन्हें अपना आदर्श मानते थे। मुक़दमे के दौरान उधम सिंह ने कहा, ”मेरे जीवन का लक्ष्य क्रान्ति है। क्रान्ति जो हमारे देश को स्वतन्त्रता दिला सके। मैं अपने देशवासियों को इस न्यायालय के माध्यम से यह सन्देश देना चाहता हूँ कि देशवासियो! मैं तो शायद नहीं रहूँगा। लेकिन आप अपने देश के लिए अन्तिम साँस तक संघर्ष करना और अंग्रेज़ी शासन को समाप्त करना और ऐसी स्थिति पैदा करना कि भविष्य में कोई भी शक्ति हमारे देश को गुलाम न बना सके”। उन्होंने हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद! और ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो! नारे बुलन्द किये। अंग्रेज़ों ने इस जाँबाज को 31 जुलाई 1940 को फाँसी पर लटका दिया।

मजहबी एकता के प्रतीक पुरुष

उधम सिंह हिन्दू, मुस्लिम और सिख जनता की एकता के कड़े हिमायती थे, इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’ रख लिया था। यही नाम उन्होंने अपने हाथ पर भी गुदवा लिया था। उन्होंने वसीयत की थी कि फाँसी के बाद उनकी अस्थियों को तीनों धर्मों के लोगों को सौंपा जाये।

तेज लूट और धार्मिक विभाजन का यह दौर और उधम सिंह

देश की अंग्रेजी गुलामी से आज़ादी से पहले जिस तरह मेहनतकश मज़दूरों-किसानों का शोषण हो रहा था, वो आज भी बदस्तूर जारी है। जलियाँवाला कांड से भी भयावह खुनी कांड आज़ाद भारत के हुक्मरान कर रचाते रहे हैं। देश आज काले लुटेरों द्वारा खुलेआम रौंदा जा रहा है। लम्बे संघर्षों के दौरान हासिल हक़-अधिकार तेजी से छिन रहे हैं। रौलेट एक्ट से भी ज्यादा ख़तरनाक कानून आज़ाद भारत की सरकार थोप चुकी है। मोदी राज देश की मेहनतकश जनता के लिए भयावह दुस्वप्न बन गया है।

दूसरी ओर जाति मज़हब के नाम पर देश में बंटवारे भयावह स्तर पर तीखे हो चुके हैं। मोदी राज में सीएए  जैसे साम्प्रदायिक कानून थोप रही है। धर्म के नाम पर इन्सान को इन्सान के दुश्मन के तौर पर खड़ा किया जा चुका है। अंग्रेजों के भक्त ही आज देशभक्त बन बैठे हैं और असल देशभक्त आवाम को जेलों में ठूंस रहे हैं। और इन सबकी आड़ में कोरोना आपदा को लुटेरों के ‘अवसर’ में बदल रहे हैं।

आइए शहीदों के सपनों को साकार करें

ऐसे में मज़हबी एकता के प्रतीक अमर शहीद उधम सिंह जैसे तमाम क्रान्तिकारी देशभक्तों के सन्देश को याद करते हुए हमें जाति-धर्म से ऊपर उठाकर मेहनतकश जमात की एकता को मजबूत करना होगा। शोषक-उत्पीड़क पूँजीवादी लुटेरी व्यवस्था को बदलने के लिए इसके ख़िलाफ़ मोर्चा खोलना होगा। छिनते अधिकारों, बढ़ती छंटनी-बंदी, बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बुनियादी मुद्दों पर अपने संघर्ष को तेज करना होगा।

उधम सिंह जैसे शहीदों ने शोषक व्यवस्था को ख़त्म कर एक शोषण-मुक्त समतामूलक समाज को बनाने के लिए कुर्बानी दी थी। आइए, उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए संकल्प लें, आगे बढ़ें!

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