अब उत्तराखंड में भी “फ़िक्स्ड टर्म” नौकरी को क़ानूनी मान्यता

मालिकों के हित में श्रम कानूनों में बदलाव की कड़ी में स्थाई आदेश क़ानून में बदलाव, स्थाई नौकरी होगा सपना

केंद्र से लेकर राज्य सरकारों द्वारा कोविड 19 को अवसर में बदलने के तहत पूँजीपतियों के हित मे श्रम क़ानूनों में बदलाव की गति तेज हो गई है। अब उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने राज्य के स्थाई आदेश में संशोधन के द्वारा नियत अवधि (फ़िक्स्ड टर्म) को क़ानूनी जमा पहना दिया है।

उत्तराखंड सरकार ने उत्तर प्रदेश औद्योगिक सेवायोजन मॉडल स्थाई आदेश, 1992 (उत्तराखंड राज्य में यथाप्रवृत्ति) में संशोधन के द्वारा बड़ा बदलाव किया है। नए  संशोधन के तहत फ़िक्सड टर्म को  कानूनी मान्यता मिल गई है।

स्थाई रोजगार होगा सपना

14 जुलाई 2020 को जारी अधिसूचना के तहत अब कर्मकार की श्रेणी में नियत अवधि के नियोजन को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। ज़ाहिर है कि आने वाले समय में स्थाई रोजगार सपना होगा। निर्धारित पैकेज पर नियत अवधि के लिए अधिकार विहीन मज़दूर रखे जाएँगे।

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मज़दूर संघों के सुझाव डाले रद्दी की टोकरी में

यहाँ यह गौरतलब है कि राज्य सरकार ने गुपचुप तरीके से दिनांक 12/06/2020 को मॉडल स्थाई आदेश में परिवर्तन करने कि एक सूचना जारी की थी और 30 दिनों के भीतर उसमें सुझाव मांगे गए थे। विभिन्न यूनियनों की ओर से इस पर आपत्ति प्रकट की गई थी। लेकिन सभी को दरकिनार करते हुए मनमाने तरीके से उत्तराखंड सरकार ने यह संशोधन पारित कर दिया।

मुख्यमंत्री ने 7 दिनों में श्रम सुधार का किया है ऐलान

ज्ञात हो कि अभी चार-पांच दिनों पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक समाचार पत्र के वेबिनार के जरिए यह जानकारी दी थी कि 7 दिनों के भीतर निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उनके अनुरूप श्रम सुधार के प्रस्ताव तैयार कर लिए जाएंगे और उसे केंद्र सरकार के पास भेज दिया जाएगा।

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मालिकों के हित में कर्मठ सरकार द्वारा उससे पूर्व ही यह अधिसूचना जारी हो गई।

जारी अधिसूचना में परिवर्तन

14 जुलाई को जारी इस अधिसूचना के तहत “यह आदेश (उत्तर प्रदेश औद्योगिक सेवायोजन मॉडल स्थाई आदेश, 1992) (संशोधन-1) आदेश 2020 कहा जाएगा।” और यह संपूर्ण उत्तराखंड राज्य में लागू होगा, और अधिसूचना जारी होने के दिन से ही यह मान्य होगा।

संशोधन के प्रस्तर 3 (च) में लिखा है की “नियत अवधि योजन कर्मकार- ऐसे व्यक्ति को नियत अवधि नियोजन कर्मकार कहा जाएगा, जो नियत अवधि के लिए नियोजन की लिखित संविदा के आधार पर कार्यरत हैं…।”

इसके अन्य संशोधनों में प्रस्तर 18 के 4 (3) के तहत “औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 (1947 का अधिनियम संख्या 14) तथा उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 (1947 का अधिनियम संख्या 28) के उपबांधों के अधीन रहते हुए,

“नियत अवधि नियोजन के आधार पर नियोजित कोई कर्मकार, ठेका या नियोजन के नवीनीकरण न होने या उनकी समाप्ति पर, यदि उसकी समाप्ति कर दी जाती है, किसी नोटिस या उसके बदले वेतन का हकदार नहीं होगा।”

आपदा बदल रहा है “अवसर” में

साफ है कि कोविड-19 महामारी को मोदी सरकार ने अवसर में बदलने का जो एलान किया था, उसकी कड़ी में ही केंद्र से लेकर राज्य सरकारें मालिकों के हित मे अवसर प्रदान कर रही हैं और पूँजीपतियों के मुताबिक़ तेजी से सुधार कर रही हैं। और एक-एक करके लंबे संघर्षों के दौरान हासिल हुए श्रम कानूनी अधिकारों को खत्म करने पर आमादा हैं।

बदलाव यानी “हायर एंड फायर”

2014 में केंद्र की गद्दी पर आसीन होने के बाद मोदी सरकार ने तेज गति से रोजगार के जिन कथित नए रूपों का सृजन किया, उसके मूल में है ‘हायर एंड फायर’ यानी जब चाहो रख लो, जब चाहो निकालो दो।

इसी के तहत फोकट के मज़दूर नीम ट्रेनी को मान्यता दी और दूसरी तरफ स्थाई रोजगार की जगह नियत अवधि के रोजगार (फ़िक्स्ड टर्म) की शुरुआत की।

मजेदार बात यह है कि इसको खत्म हो रहे 44 श्रम कानूनों की जगह 4 संहिताओं में बदलने से अलग केवल स्टैंडिंग आर्डर (स्थाई आदेश) अधिनियम में परिवर्तन के द्वारा यह खेल खेला जा रहा है। उसी कड़ी में उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने मज़दूरों के हक पर यह एक बड़ा हमला बोला है।

ज़ाहिरातौर पर, आने वाले समय में स्थाई रोजगार लगभग विलुप्त होगा और मनमाने तरीके से 2,3 या 5 साल के लिए नियत अवधि तक मजदूर रखे जाएंगे। जो कई कारखानों में लागू भी हो चुका है।

जनवाद के नाम पर खेल

गौरतलब है सरकारें कथित रूप से 30 दिन में आपत्ति देने का समय निर्धारित कर रही हैं, लेकिन मज़दूर संगठनों के किसी भी एक सुझाव को भी माना नहीं है। मज़दूरों के सारे सुझाव को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया है। मोदी सरकार ने भी और राज्य सरकारें भी यही कर रही हैं।

इस प्रकार जनवाद के नाम पर भी यह खेल जारी है।

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