सीबीएससी पाठ्यक्रम से हटाए गए लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और नागरिकता के पाठ

स्कूली बच्चों को राहत के नाम पर, क्या संवैधानिक आदर्शों को किया जा रहा है दरकिनार?

कोरोना महामारी के दौर में स्कूली शिक्षा में रुकावट आने के कारण देश भर के विभिन्न शैक्षिक बोर्ड अपने पाठ्यक्रमों में कटौती घोषित कर रहे हैं। इसके पीछे तर्क है कि महामारी से पढ़ाई का करीब 30% वक्त बर्बाद हुआ है, जिस कारण बच्चों पर बोझ कम करने के लिए 9वीं से 12वीं कक्षा तक के बच्चों के पाठ्यक्रम का 30% हिस्सा काट दिया जाएगा। काटे गए पाठों की सूचि में सामाजिक विज्ञान और राजनैतिक विज्ञान के बेहद महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

9 वीं कक्षा में संविधान की रचना और लोकतांत्रिक अधिकार, 10 वीं में लोकतंत्र और विविधता, लिंग, धर्म व जाति, लोकप्रिय संघर्ष एवं आन्दोलन और लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ, 11वीं कक्षा में संघवाद, राष्ट्रवाद, नागरिकता और धर्मनिरपेक्षता व 12 वीं में पड़ोसी देशों के साथ भारत का सम्बन्ध, सामाजिक एवं नए सामाजिक आन्दोलन और क्षेत्रीय आकांक्षाएं जैसे विषयों को पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है। 

इस कदम को बच्चों और शिक्षकों के लिए कार्रायभार में राहत के रूप में दर्शाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे समय में इस कदम से बच्चों और शिक्षकों का बोझ कम भी हो तो बच्चों की शिक्षा पर लम्बे दौर में इन विषयों के काटे जाने का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। शिक्षा पाठ्यक्रम में समाज शास्त्र, राजनैतिक विज्ञान जैसे विषय ना केवल परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि देश के हर नागरिक के वैचारिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण हैं । यह विषय हर नागरिक को अपने देश की राजनीती, संविधान, अपनी सामाजिक जिम्मेदारिय और अधिकारों को समझने में मदद करते हैं| ऐसे में परीक्षा का बोझ कम करने के नाम पर इन मूल भूत विषयों को खोखला करना देश के नागरिकों की आने वाले पीढ़ी को वैचारिक रूप से कमज़ोर और सीमित करने का काम करेगी ।

शिक्षाविदों के अलावा विभिन्न विपक्षीय पार्टियों ने नेताओं ने भी इस कदम पर सरकार की निंदा की। वहीं दूसरी ओर मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ने लगाए जा रहे सभी इल्जामों को गलत बताते हुए कहा की “शिक्षा को ले कर राजनीति ना की जाए।

वास्तव में राहत का साधन, या महामारी के राजनैतिक इस्तेमाल का एक और उदाहरण?

कोरोना माहामारी ने जिन अभूतपूर्व परिस्थितियों को जन्म दिया है उनसे निपटने के लिए कुछ निर्णायक कदम लेने की ज़रुरत वाजिब है। ऐसे कदम लेने के लिए सभी राज्य और केंद्र सरकार ज़िम्मेदार हैं। इसी हवाले से सरकार ने पिछले महीनों में सामाजिक-आर्थिक जीवन के कई पहलुओं में कई बड़े परिवर्तन भी किये हैं। श्रम कनूनों में मज़दूर-विरोधी परिवर्तन, उद्योगों का निजीकरण व लोगों पर सरकार की बढ़ती हुई निगरानी, सभी कोरोना संकट के नाम पर किये जा रहे हैं। किन्तु दुःख की बात रही है की यह परिवर्तन देश की जनता के हित में ना हो कर, मुख्यतः मालिक वर्ग और दक्षिणपंथी राजनैतिक विचारधारा के नज़रिए से ही की गयी हैं। शिक्षा प्रणाली में किये जा रहे परिवर्तन भी इसी का हिस्सा हैं।

धर्मनिरपेक्षता, नागरिकता, जनतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर यह सरकार लगातार गलत सुर्खियाँ बनाती रही हैं। संविधान को नकार कर मनुस्मृति को देश का परम कानून मानना और संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राजनीतिक मांगों में लम्बे समय से रहा है। पिछले दिनों में नागरिकता के कानून में धार्मिक आधार जोड़ने, विभिन्न मानवाधिकार कर्मियों पर पुलिस कार्यवाही करने व संघवाद को सीमित करने जैसे सरकार द्वारा लिए गए कदम की रौशनी में पाठ्यक्रम में हुई कटौती को देखें तो काटे गए विषयों के चुनाव के पीछे की राजनैतिक मंशा साफ़ दिखती है। आखिर पाठ्यक्रम में कुल 190 वषय होने के बावजूद इनमे से ख़ास इन्हीं विषयों को क्यों काटा गया, जबकि यह टॉपिक इन विषयों में केंद्रीय कांसेप्ट का दर्जा रखते हैं?

9 वीं-12 वीं में पढ़ने वाले छात्र अगले कुछ सालों में चुनाव में भाग ले कर मतदान के द्वारा देश की राजनीती में सक्रीय भूमिका निभाने लगेंगे। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता, जनतांत्रिक अधिकार जैसे विषयों के बारे में न समझना, व उनके महत्वा को कम कर के आंकना युवाओं की राजनैतिक सोच पे बड़ा प्रभाव रख सकता है।

क्या सच में छात्र और शिक्षकों के लिए चिंतित है सरकार?

पाठ्यक्रम कटौती के साथ साथ कोरोना दौर में स्कूली शिक्षा व्यवस्था में दो नए पहलु भी जुड़े हैं: 1. ऑनलाइन शिक्षा और 2. विश्व बैंक का स्ट्रेंथेनिंग टीचिंग-लर्निंग एंड रिजल्ट्स फॉर स्टेट्स (स्टार्स) प्रोग्राम।

जहाँ आज ऑनलाइन तकनीकों के महत्वा को सभी मान रहे हैं, बिना उचित प्रबंध किये ऑनलाइन शिक्षा को पूरी स्कूली शिक्षा का आधार बना दिया जाना बच्चों की एक बड़ी आबादी को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रहा है। टच फ़ोन और कम्पुटर जैसे उपकरणों की मांग, पहले से गहरे आर्थिक संकट से गुज़र रहे मज़दूर वर्ग के माता-पिताओं पर और भी बड़े बोझ डाल रही है, और मज़दूर परिवारों के बच्चों को शिक्षा प्रणाली में और भी पीछे कर रही है। इस तरह की तनीकों का इस्तेमाल के लिए शिक्षण प्रणाली निजी कम्पनियों और ज़ूम व गूगल जैसे प्लेटफार्म पर आश्रित हो रही है जो शिक्षा में निजीकरण को तेज़ कर रहे हैं और छत्रं और शिक्षकों के निजि डाटा की सुरक्षा को भी नुक्सान पहुंचा सकते हैं|

दूसरी ओर स्ट्रेंथेनिंग टीचिंग-लर्निंग एंड रिजल्ट्स फॉर स्टेट्स (स्टार्स) प्रोग्राम के नाम पर 6 राज्यों में स्कूली शिक्षा में 500 मिलियन डॉलर का उधार दिया है। यह राशि केन्द्रीय और राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा व्यवस्था में लगाए गए कुल बजट का मात्र 1.4% है । किन्तु इसके बहाने वे भारत की सरकारी स्कूली शिक्षा में निजी संस्थानों के प्रवेश के रास्ते खोलने व पाठ्यक्रम के विषयों, प्रशिक्षण और परीक्षण के मानकों के बारे में विभिन्न शर्तें थोपने की कोशिश कर रहे हैं। शिक्षाविदों का कहना है की विश्व बैंक के इस हस्तक्षेप से शिक्षा प्रणाली में भारतीय बच्चों की बड़ी आबादी के जाती – धर्म और विभिन्न प्रक्रार के पिछड़ेपन की परिस्थितियों में शिक्षा पाने की विशेषता को नहीं समझा जाएगा और इससे बच्चों की बड़ी संख्या पेशेवर शिक्षण-प्रशिक्षण में धकेल दी जाएगी और उन्हें सामान शिक्षा का अधिकार नहीं मिलेगा।

कोरोना के कारण शिक्षा प्रणाली पर पड़े असर से उभरने की बजाये यह सभी कदम साफ़ तौर से शिक्षा के अधिकार को और दुर्लभ बनाने, व समाज में शिक्षा की प्रगतिशील संभावनाओं को मंद कर इसे सत्ताधारी ताकतों के हांथों का उपकरण बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसे में पाठ्यक्रम में कटौती करने के पीछे छात्रों और शिक्षकों को राहत देने की मंशा का दावा सरकार की पूरी नीति के साथ मेल खाता नज़र नहीं आ रहा।

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