उत्तराखंड : विभिन्न कंपनियों के मज़दूर संघर्षरत, प्रशासन मौन

माइक्रोमैक्स, वोल्टास, गुजरात अंबुजा, एलजीबी व इंटरार्क के मज़दूर न्याय के लिए आंदोलित, श्रमिक संयुक्त मोर्चा ने लिया कार्यक्रम

रुद्रपुर (उत्तराखंड)। यह एक खुली सच्चाई है कि आज के दौर में मज़दूरों का दामन-शोषण तेजी से बढ़ा है। इसकी बानगी उत्तराखंड के मजदूरों के संघर्ष से देखा जा सकता है। कोरोना/लॉकडाउन के बीच औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल पंतनगर व सितारगंज के मज़दूर लंबे समय से संघर्षरत हैं। जहाँ श्रमिक संयुक्त मोर्चा ने भी कार्यक्रम घोषित किया है।

जहाँ एक तरफ गैर कानूनी छँटनी के खिलाफ पौने दो साल से भगवती प्रोडक्ट्स (माइक्रोमैक्स) के मज़दूर संघर्षरत हैं, वहीं वोल्टास, गुजरात अंबुजा, एलजीबी में ग़ैरक़ानूनी गेटबन्दी के खिलाफ संघर्ष जारी है, तो इंटरार्क के मज़दूर 195 मज़दूरों की ग़ैरक़ानूनी चेन्नई स्थानांतरण के ख़िलाफ़ संघर्ष की मशाल जलाए हुए हैं।

माइक्रोमैक्स : न्यायालय से जीत, फिर भी संघर्ष को मजबूर

27 दिसंबर 2018 को माइक्रोमैक्स प्रोडक्ट्स बनाने वाले भगवती प्रोडक्ट्स लिमिटेड ने 303 श्रमिकों की गैर कानूनी छँटनी कर दी थी। एक लंबे और सतत संघर्ष के बाद मज़दूरों ने औद्योगिक न्यायाधिकरण से जीत हासिल की। जहाँ छँटनी गैरकानूनी घोषित हो चुका है। लेकिन कोरोना/लॉकडाउन बहाना बन गया और मामला उलझ गया।

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संघर्ष के इसी क्रम में उच्च न्यायालय नैनीताल से प्रबंधन को कार्यबहाली करने से रोक का आदेश नहीं मिला। इसके बावजूद श्रम विभाग द्वारा हाईकोर्ट का हवाला देकर वार्ता से हाथ पीछे खींच लिया गया। धरना स्थल पर आए दिन निकलते साँपों और प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए मज़दूरों का संघर्ष जारी है।

वोल्टास लिमिटेड में 11 महीने से गेटबंदी के ख़िलाफ़ संघर्ष

वोल्टास लिमिटेड, सिडकुल पंतनगर के यूनियन अध्यक्ष व महामंत्री सहित नौ मज़दूर 25 सितंबर 2019 से गैरकानूनी गेट बंदी के शिकार हैं।

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ज्ञात हो कि वोल्टास इम्पलाइज यूनियन ने दिसंबर 2018 में अपना माँगपत्र दिया था। तब से मज़दूर दमन झेल रहे हैं। श्रम विभाग ने लगातार पूरे मामले को उलझाए रखा। मामला ले ऑफ, वेतन कटौती, सेवा समाप्ति में उलझा रहा और प्रबंधन की मनमानी बढ़ती रही। हालांकि लेऑफ गैरकानूनी घोषित हो चुकी है। वेतन की आरसी भी कटी, जिसे प्रबन्धन ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

इन्हीं सब स्थितियों के बीच लॉक डाउन हो गया और मज़दूरों का मामला उलझ गया। श्रम विभाग बाकी अन्य दूसरे संगीन मामलों की सुनवाई करने की जगह हाई कोर्ट का हवाला देकर चुप्पी साधे बैठ गया है। और वेतन का आभाव झेलते मज़दूर संघर्षरत हैं।

गुजरात अम्बुज : भुखमरी के बीच आंदोलित हैं मज़दूर

गुजरात अंबुजा एक्सपोर्ट्स लिमिटेड, सितारगंज के मज़दूरों ने जनवरी 2020 में प्रबंधन के शोषण आदि का सवाल उठाया और अपना एक माँग पत्र दिया। मज़दूरों ने वैधानिक हड़ताल की। इसी दौरान लॉकडाउन घोषित हो गया और मज़दूरों का विवाद अटक गया।

अभी हालिया समय में मज़दूरों ने विधायक आवास पर बाल सत्याग्रह की घोषणा की। शासन-प्रशासन और विधायक सक्रिय हुआ और एक वार्ता में मज़दूरों को बँधुआ बनाने वाले समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया, जिसे मज़दूरों ने इंकार कर दिया।

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मज़दूरों ने अन्याय-अत्याचार के ख़िलाफ़ उच्च न्यायलय, नैनीताल के समक्ष एक जनहित याचिका पत्र भी भेजा है।

फिलहाल मज़दूर गेट पर मौजूद हैं, कार्य पर जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सारी जगह सन्नाटा है।

एलजीबी : महामंत्री की अवैध गेटबंदी

एलजी बालाकृष्णन एंड ब्रॉस लिमिटेड, सिडकुल पंतनगर में मज़दूरों के वेतन में ग़ैरक़ानूनी कटौती की शिकायत करने पर 20 मई को यूनियन के महामंत्री पूरन चंद पांडे का अवैध रूप से प्रबंधन ने गेट बंद कर दिया। यूनियन ने श्रम विभाग में सुनवाई की अपील की। बमुश्किल एक वार्ता कराने के बाद सहायक श्रम आयुक्त ने बोल दिया कि जैसा मैनेजमेंट कह रहा है वैसा करो नहीं तो हम इसमें कुछ नहीं करेंगे।

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कंपनी में जब से यूनियन बनी है (2012) तब से, दमन का क्रम जारी है। तमाम संघर्षों के बाद करीब 3 साल बाद अभी जनवरी 2020 में माँग पत्र पर यूनियन का समझौता हुआ। लेकिन यूनियन अध्यक्ष जो कि 2012 में टर्मिनेट हुए थे और 2015 में जीतकर किसी तरीके से कंपनी में कार्यरत हुए थे, का मामला आज भी प्रबंधन ने विवादित बना रखा है। बार-बार हराने के बावजूद वह दो बार हाईकोर्ट और दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट भी जा चुका है।

इन स्थितियों में मज़दूरों का संघर्ष जारी है।

इंटरार्क : 195 मज़दूरों के चेन्नई ट्रांसफर के ख़िलाफ़ मज़दूरों का संघर्ष जारी

पंतनगर में स्थित इन्टरार्क बिल्डिंग प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंधन ने कोरोना/लॉक डाउन के बीच पहले 29 सुपरवाइजर/इंजीनियरों की सेवा समाप्त कर दी। उसके बाद 195 स्थाई श्रमिकों को गैर कानूनी रूप से चेन्नई स्थानांतरित करने का नोटिस चस्पा कर दिया। जबकि कानूनी रूप से किसी भी तरीके से बिना मज़दूरों की सहमति के उन्हें राज्य से बाहर नहीं भेजा जा सकता है। कंपनी के प्रमाणित स्थाई आदेश में भी ऐसा स्पष्ट है और राज्य के कानूनों में भी।

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ऐसे में मज़दूरों ने आंदोलन की राह पकड़ी तो श्रम विभाग ने वार्ताएं शुरू किन, जो औपचारिकता भर रहीं। इस बीच यूनियन ने उच्च न्यायालय नैनीताल से इस पर स्थगनादेश ले लिया। श्रम विभाग ने इसी को बहाना बनाकर वार्ताओं को स्थगित कर दिया।

ज्ञात हो कि इंटरार्क कंपनी के जिले में दो प्लांट हैं- पंतनगर और किच्छा और दोनों जगह संघर्ष से यूनियनें बन चुकी हैं।  अभी दोनो यूनियनों ने अखिल भारतीय इंटरार्क मज़दूर फेडरेशन बनाकर अपनी एकता मज़बूत कर ली है और नए उत्साह से संघर्ष जारी है।

श्रमिक संयुक्त मोर्चा ने ली पहल

इस विषम परिस्थिति में श्रमिक संयुक्त मोर्चा, उधम सिंह नगर ने पहल ली और सभी संघर्षरत मज़दूरों के मुद्दे को लेकर संघर्ष की रणनीति बनाई है। जिला प्रशासन से वार्ता के साथ कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर मानव श्रृंखला बनाने का कार्यक्रम लिया है। हालाँकि अचानक 72 घंटे के स्थानीय लॉकडाउन की घोषणा से घोषित कार्यक्रम फिलहाल स्थगित हो गया, लेकिन संघर्ष की तैयारी पूरी है।

हालात कठिन, संघर्ष जारी

हालात बेहद कठिन हैं। कोरोना बहाना बना गया है और श्रमक़ानूनी अधिकार भी ख़त्म हो रहे हैं। ज़ाहिर है कि मज़दूरों के पास संघर्ष के अलावा कोई रास्ता नहीं है। शासन-प्रशासन जहाँ मज़दूरों की बात आती है, वहाँ उन्हें रोकने के लिए कोरोना और लॉक डाउन का भय दिखलाने की कोशिश करता है।

जबकि सच्चाई यह है लॉकडाउन और बढ़ते कोरोना के मामलों के बीच सारे कारखाने निर्बाध गति से चल रहे हैं। कारखानों के संचालन और उत्पादन में कोई रुकावट न पैदा हो प्रशासन इस पर लगा है। लेकिन जिन मज़दूरों के दम पर कारखाने चलते हैं, उनके लिए प्रशासन के पास सुनने के लिए वक्त तक नहीं है।

ऐसे कठिन समय में सभी जगह के मज़दूर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह जरूर है कि हर जगह के संघर्ष में मज़दूरों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना रखा है। इसलिए प्रकृति  के साथ शासन प्रशासन और कंपनी के तमाम विपरीत स्थितियों के बावजूद संघर्ष जारी है।

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