मज़दूर वर्ग से दुश्मनी, पूँजीपतियों से प्यार, होश में आओ मोदी सरकार!

मासा के आह्वान पर ‘मज़दूर संघर्ष अभियान’ शुरू, 9 अगस्त को होगा अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन

मोदी सरकर व राज्य सरकारों द्वारा मेहनतकश-मज़दूर जमात पर भयावह हमले के ख़िलाफ़ मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने एक माह के ‘मज़दूर संघर्ष अभियान’ की शुरुआत की है। 9 अगस्त को मासा के ऑनलाइन कन्वेंशन के साथ शुरू यह अभियान ‘अंग्रेजों भारत छोडो’ के प्रतीक दिवस 9 अगस्त को अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन के साथ समाप्त होगा।

देशभर के जुझारू मज़दूर संगठनों-यूनियनों के साझा मंच मासा ने यह अभियान ऐसे समय में शुरू किया है, जब संकटग्रस्त मेहनतकश जनता की भयावह पीड़ा से मुँह मोड़कर कोरोना महामारी को मोदी सरकार पूँजीपतियों के ‘अवसर’ में बदलने में सक्रिय है। मालिकों की सेवा में केंद्र की मोदी सरकार से लेकर विभिन्न रंगों में रंगी राज्य सरकारें आक्रामक रूप से जुटी हुई हैं। हक़ के लिए उठे हर आवाज़ को कुचलने के लिए मुस्तैद हैं।

लम्बे संघर्षों से हासिल श्रम क़ानूनी अधिकारों को निष्प्रभावी बना रही है, जनता के खून-पसीने से खड़े सरकारी-सार्वजानिक संपत्तियों को अडानियों-अम्बानियों को सौंप रही है, प्रवासी व असंगठित मज़दूरों को बेहाल-बेरोजगार मरने के लिए छोड़ दी है, स्वास्थ्य व्यवस्था बेहाल है और उसे कार्पोरेट के लूट का जरिया बना दिया गया है।

दूसरी ओर प्रतिरोध के नाम पर कुछ एक देशव्यापी विरोध कार्यक्रम या सालाना एक-दो दिनी हड़ताल महज रस्मअदायगी बन गई हैं। जबकि आज हो रहे विकट हमलों के ख़िलाफ़ प्रचंड आन्दोलन ही एक मात्र रास्ता है।

मासा का मानना है कि साझी एकता के साथ मज़दूर आन्दोलन को मज़दूर वर्ग के जुझारू और निर्णायक संघर्ष में तब्दील करना होगा!

इसी सोच के तहत मासा ने 9 जुलाई से 9 अगस्त तक के एक माह के ‘मज़दूर संघर्ष अभियान’ की शुरुआत की है। इस दौरान मेहनतकश आवाम के बीच जमीनी स्तर पर विभिन्न तरीके से अभियान संचालित होगा और विभिन्न माँगों के ज्ञापन पर हस्ताक्षर अभियान भी चलेगा। इसी के साथ सोशल मिडिया पर भी अभियान जारी रहेगा!

9 अगस्त बर्तानवी साम्राज्यवाद से मुक्तिकामी संघर्ष का प्रतीक दिन है। 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोडो का नारा पूरे देश में बुलंद हुआ था। इसी प्रतिक दिन 9 अगस्त, 2020 को अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन आयोजित होगा!

मासा द्वारा जारी पर्चा-

इस अभियान के लिए मासा ने एक पर्चा जारी किया है। प्रस्तुत है पूरा पर्च-

मज़दूर वर्ग से दुश्मनीपूँजीपतियों से प्यार, होश में आओ मोदी सरकार!

9 जुलाई से 9 अगस्त तक मज़दूर संघर्ष अभियान

9 अगस्त को अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन में शामिल हों!

श्रम कानूनों को निष्प्रभावी बनाना, 12 घंटा कार्य-दिवस, बेलगाम छंटनी-बेरोज़गारी, प्रवासी और असंगठित मज़दूरों के जीवन-आजीविका का संकट, सरकारी क्षेत्रों का निजीकरण, बिगड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा, बढ़ती महंगाई, युद्धोन्माद और धार्मिक नफ़रत फ़ैलाना, जनवादी अधिकारों पर हमला – नहीं सहेंगे!

रस्म-अदायगी नहीं, मज़दूर आंदोलन को मज़दूर वर्ग के निरंतर, जुझारू और निर्णायक संघर्ष में तब्दील करें!

मज़दूर वर्ग पर लगातार बढ़ते हमलों के बीच आई कोरोना महामारी में केंद्र में बैठी मोदी सरकार ने कोरोना के बजाए देश की आम मेहनतकश जनता के खिलाफ़ युद्ध छेड़ दिया है। कोविड-19 से लड़ने के नाम पर अनियोजित देशव्यापी लॉकडाउन लागू कर मज़दूर व आम आबादी को अभूतपूर्व आर्थिक संकट में डाल दिया गया। 44 श्रम कानूनों को ध्वस्त कर 4 श्रम कोड थोपने की कोशिशों के साथ मज़दूर वर्ग पर लगातार हमले महामारी के पहले से ही जारी थे, जिसे भाजपा सरकार सहित कांग्रेस पार्टी व अन्य दलों की राज्य सरकारों ने और भी तेज़ कर दिया है।

तीन राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों को निलंबित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है जिसे आगे बढ़ाने का विचार अन्य राज्य सरकारें भी कर रही हैं, लगभग आधे राज्यों में कार्य दिवस 8 घंटे से बढ़ा कर 12 घंटे तक कर दिया गया है। निजी क्षेत्र हो या सरकारी, मज़दूर-कर्मचारियों की बेलगाम छंटनी की जा रही है। पीएफ दर घटा दिया गया, केंद्रीय व कुछ राज्यों के सरकारी कर्मचारियों का डेढ़ साल के लिए महँगाई भत्ता (डीए व डीआर) दर फ्रीज़ कर दिया गया, वेतन घटाया जा रहा है, और तो और कोरोना की आड़ में मज़दूरों व जनपक्षीय ताकतों द्वारा शोषण दमन के खिलाफ उठी आवाज़ों को कुचला जा रहा है।

24 मार्च 2020 को कोई आवश्यक तैयारी और प्रभावी कदम उठाये बिना मात्र 4 घंटे पूर्व घोषणा करके मोदी सरकार ने अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लागू कर दिया। करोड़ों श्रमिकों का रोज़गार छिन गया तथा उनके परिवार भुखमरी का शिकार हो गए। लॉकडाउन की अवधि का वेतन भी मज़दूरों को नहीं मिला और इस मसले पर सरकार के साथ सुप्रीम कोर्ट ने भी मालिकों का पक्ष लिया।

परिवहन के साधन बंद किये जाने से बेरोज़गार प्रवासी मज़दूर पैदल ही अपने घर चल पड़े जिनमें भूख, प्यास, थकान, सड़क व रेल हादसों में सैंकड़ों जानें चली गईं। मज़दूरों की इस दयनीय स्थिति के खिलाफ उठे विरोध के दबाव में सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई, हालांकि जिसका किराया भी इन मज़दूरों से ही वसूला गया, ट्रेनें भटकती रहीं और सफ़र के दौरान कइयों की मौत हो गई।

सरकार के 20 लाख करोड़ के जुमला पैकेज में भी जितनी भी राहत है, वो पूँजीपतियों के लिए ही है। आटा, दाल, तेल आदि खाद्य सामग्रियों की महंगाई की वृद्धि दर 10% से ज्यादा है। लॉकडाउन से पैदा हुई भुखमरी से मामूली राहत प्रदान करने वाली प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ भी सभी गरीबों तक नहीं पहुंचा है। सारी दुनिया में तेल बेहद सस्ता हो रहा है परंतु भारत सरकार ने ढाई सौ प्रतिशत कर लाद कर पेट्रोल-डीज़ल अत्यधिक महंगा कर दिया है। रसोई गैस बेहद महंगी कर दी गई है और बस व रेल किराए बढ़ा दिए हैं।

निर्माण मज़दूरों के सेस फंड में सरकार द्वारा अब तक इकट्ठा ₹31,000 करोड़ पड़ा हुआ है और इससे मात्र ₹5000 करोड़ ही पंजीकृत निर्माण मज़दूरों के बीच बांटा गया है। निर्माण मज़दूरों की बहुत बड़ी संख्या पंजीकृत ही नहीं है। बेरोज़गार हुए और घर लौटे मज़दूरों द्वारा मनरेगा में काम की माँग करने के बावजूद मनरेगा में काम नहीं दिया जा रहा है और मज़दूरी भी बेहद कम है।

आर्थिक संकट में फंसी भूख और बेरोज़गारी का सामना कर रही मज़दूर मेहनतकश आबादी को राहत देने के बजाय सरकार पूँजीपतियों व धन्नासेठों की सेवा करने में व्यस्त है। निजीकरण के ज़रिए सरकारी संस्थानों को कौड़ियों के दाम बेचकर मुनाफाखोरों के हवाले किया जा रहा है।

कई क्षेत्रों – कोयला, रेल, खनिज, रक्षा, उत्पादन, हवाई क्षेत्र प्रबंधन, हवाई अड्डे, वायुयानों का रखरखाव, बिजली वितरण कंपनियां और परमाणु ऊर्जा का निजीकरण किया जा रहा है। 109 मार्गों पर 151 निजी रेलें चलाए जाने की प्रक्रिया चल रही है। कोयला क्षेत्र में वाणिज्यिक खनन लागू करने के तहत 41 खदानों की नीलामी की जा रही है। देश की सुरक्षा से जुड़े रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्र में भी 51% से 74% विदेशी निवेश बढ़ाकर विदेशी पूँजीपतियों का दखल देश की सुरक्षा के मामले में भी बढ़ाया जा रहा है।

बर्बाद सरकारी स्वास्थ्य ढांचे के चलते कॉरपोरेट अस्पतालों में लोगों की अकल्पनीय लूट जारी है। सरकारी डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों, आशा वर्कर, आंगनबाड़ी वर्कर- हेल्पर, जिन्हें सरकार कोरोना योद्धा पुकारती है, से काम तो दिन रात करवाया जा रहा है किंतु उनको पर्याप्त सुरक्षा उपकरण देने में सरकार विफल रही है। आंगनबाड़ी, आशा व मिड डे मील कर्मियों को तो सरकार श्रमिक भी नहीं मानती है। सफाई कर्मियों को भी सरकार कोरोना योद्धा बताती है परंतु वे भी आए दिन पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बिना काम करते हुए अपनी जान से हाथ धो रहे हैं।

आम मेहनतकश जनता के बीच पनपे असंतोष को भांप कर और बिहार चुनाव के मद्देनज़र, जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा सरकार द्वारा अवाम में चीन-पाकिस्तान के खिलाफ जनता में युद्धोन्माद फ़ैलाया जा रहा है। विपक्ष में कांग्रेस भी युद्धोन्माद बढ़ाने का ही काम कर रही है। सीमा विवाद का हल युद्ध से नहीं बल्कि बातचीत के माध्यम से ही हो सकता है। जवानों, जो कि मज़दूरों-किसानों के ही बेटे हैं, की जान की परवाह किये बगैर उनकी शहादत को भाजपा व कांग्रेस दोनों ही वोट हासिल करने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं, और पूँजीपति मुनाफ़ा बटोरने के लिए।

देश में बचे-खुचे जनवादी माहौल को भी मोदी सरकार खत्म करने पर आमादा है। मज़दूरों के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव के साथ तमिलनाडू में पिता-पुत्र जयराज व फेनिक्स की हिरासत में बर्बर यातनाओं के बाद हत्या, बढ़ती पुलिस बर्बरता को दिखाता है। जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को देशद्रोही बोल कर जेल में डाला जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा सीएए विरोधी आंदोलनकर्ताओं को रिहा करने की अपील के बावजूद उनपर यूएपीए लगा कर उन्हें कैद में रखा जा रहा है, दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा मामले की छानबीन में प्रगतिशील आवाज़ों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे लादे जा रहे हैं, और सुनियोजित ढंग से पूँजीवादी शोषण-दमन के खिलाफ मज़दूर वर्ग के बढ़ते गुस्से और एकता को तोड़ने के उद्देश्य से हिंदू-मुस्लिम के नाम पर जनता में नफरत पैदा की जा रही है।

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) का मानना है कि कोरोना-संकट के दौरान पैदा हुई समस्याएं मौजूदा शोषण मूलक व्यवस्था का परिणाम हैं। इस संकट से पूर्व भी मज़दूर वर्ग पर हमले, भयंकर बेरोज़गारी बढ़ने, बेरोजगारों और संकटग्रस्त किसानों द्वारा आत्महत्याएं करने, जनवादी आवाज़ों पर दमन का क्रम जारी था, परंतु कोरोना की आड़ में मोदी सरकार ने इसमें अभूतपूर्व ढंग से तेज़ी ला दी है। अतः आज सख्त ज़रूरत है कि मज़दूर वर्ग अपनी तात्कालिक माँगों के साथ-साथ लगातार ध्वस्त किये जा रहे जनवादी अधिकारों को बचाने और मोदी सरकार द्वारा फासिस्ट तानाशाही स्थापित करने के मंसूबों को हमेशा के लिए परास्त करने के लिए एकजुट हो।

इसी संदर्भ में मासा ने 9 जुलाई से 9 अगस्त तक एक महीने का ‘मज़दूर संघर्ष अभियान’ और 9 अगस्त, जो कि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के प्रारंभ का ऐतिहासिक दिन है, को अखिल भारतीय विरोध दिवस आयोजित करने का निर्णय लिया है। मासा आम मेहनतकश जनता और मज़दूर व न्याय-पक्षधर ताकतों से इस अभियान से जुड़ने और 9 अगस्त को देशव्यापी प्रदर्शन में शामिल हो कर मेहनतकश जनता की मुक्ति और एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए निर्णायक संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान करता है।

मासा द्वारा प्रस्तुत तात्कालिक मांगें

  1. श्रम कानूनों में किये गए सभी मज़दूर विरोधी संशोधनों को तत्काल रद्द किया जाए। विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कार्य दिवस 12 घंटे का किये जाने का मज़दूर विरोधी फैसला तुरंत रद्द किया जाए। DA और DR दर फ्रीज़ करने और PF में कटौती करने का फ़रमान तुरंत वापस लिया जाए।
  2. न्यूनतम वेतन रु. 25,000 किया जाए। सभी बेरोजगारों को रु. 15,000 मासिक बेरोज़गारी भत्ता दिया जाए।
  3. लॉकडाउन के पूरे समय के लिए सभी मज़दूरों को पूरा वेतन दिया जाए। लॉकडाउन के चलते बेरोज़गार हुए लोगों को रु. 15,000 प्रति परिवार सरकारी सहायता दी जाए तथा उनके लिए रोज़गार का प्रबंध किया जाए।
  4. कोरोना संकट के बहाने उद्योगों में लगातार की जा रही छंटनी और वेतन काटे जाने पर तत्काल रोक लगाई जाए। निकाले गए मज़दूर कर्मचारियों को काम पर वापस लिया जाए।
  5. घर वापस गए प्रवासी मज़दूरों को आर्थिक सहयोग के साथ-साथ उनके गांव में ही उपयुक्त स्वास्थ्य सुविधा और आजीविका का बंदोबस्त किया जाए। उन्हें मनरेगा कार्य दिया जाए। मनरेगा मज़दूरी में वृद्धि कर उसे कम से कम रु. 800 किया जाए तथा साल में प्रति व्यक्ति दो सौ दिन की रोज़गार गारंटी दी जाए। मनरेगा की तर्ज पर शहरी मज़दूरों के लिए भी रोज़गार गारंटी कानून बनाया जाए।
  6. सभी स्वास्थ्य कर्मियों और सफाई कर्मियों की सुरक्षा का इंतज़ाम किया जाए। भोजन माता (मिड डे मील), आशा और आंगनवाड़ी कर्मियों को ‘कर्मचारी’ का दर्जा देकर सभी सुविधाएं दी जाएं।
  7. निजीकरण और ठेकेदारी प्रथा पर तत्काल रोक लगाई जाए।
  8. पेट्रोल, डीज़ल व रसोई गैस के दाम कम किये जाएं। बस व रेल का किराया घटाकर कम से कम 2014 के दरों पर लिया जाए।
  9. सब के लिए कोरोना टेस्ट व संक्रमित व्यक्तियों का इलाज निःशुल्क करवाया जाए। इसके लिए निजी अस्पतालों का अधिग्रहण करके उनका राष्ट्रीयकरण किया जाए।
  10. विरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकार पर हमला, अंध-राष्ट्रवाद के आधार पर युद्धोन्माद फ़ैलाना और धर्म-जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन और नफ़रत पैदा करने की राजनीति बंद की जाए। यूएपीए जैसे काले कानून रद्द किये जाएं। फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार किये राजनीतिक कैदियों, व सभी सीएए विरोधी आंदोलनकारियों को रिहा किया जाए।

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा)

मासा के घटक संगठन:

ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल (AIWC), ग्रामीण मजदूर यूनियन (बिहार), इंडियन काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (ICTU), इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (IFTU), IFTU सर्वहारा, इंकलाबी केंद्र (पंजाब), इंकलाबी मजदूर केंद्र, जन संघर्ष मंच हरियाणा, कर्नाटक श्रमिक शक्ति, मज़दूर सहयोग केंद्र (गुड़गांव-बावल), मज़दूर सहयोग केंद्र (उत्तराखंड), मज़दूर समन्वय केंद्र, सोशलिस्ट वर्कर्स सेंटर (तमिल नाडु), स्ट्रगलिंग वर्कर्स कोऑर्डिनेशन कमिटी (SWCC, पश्चिम बंगाल), ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ़ इंडिया (TUCI)

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