आर्थिक तंगी से जूझते क्लर्कों ने सुप्रीम कोर्ट से लगाई गुहार

वकीलों के साथ लगे क्लर्कों ने माँगा 15 हजार रुपए मासिक सहायता

कोरोना/लॉकडाउन से भारी आबादी रोजी-रोटी की मोहताज हो गई है। इनमे से ही वकीलों के साथ लगे क्लर्क/मुंशी की भी एक बड़ी संख्या है, जो काम ना होने से आर्थिक तंगी में फंस गए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट बार क्लर्क एसोसिएशन ने मदद की गुहार लगाई है और 15 हजार रुपए मासिक सहायता देने की अपील की है।

याचिका में कहा गया है कि पिछले तीन महीनों से क्लर्क वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय आपदा नियम के तहत केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह प्रत्येक सदस्य को 15 हजार रुपये मासिक तौर पर भुगतान करें।

काम बंदी से क्लर्क को नहीं मिला वेतन

सुप्रीम कोर्ट बार क्लर्क एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि लॉकडाउन की घोषणा 24 मार्च को हुई थी लेकिन उसके बाद ये तमाम क्लर्क वित्तीय संकट में आ गए हैं और इस तरह उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।

याचिका में कहा गया है कि ऐसे तमाम क्लर्क को मूल वेतन तक नहीं मिल पाई है। ऐसे में कोर्ट से गुहार लगाई गई है कि केंद्र सरकार को निर्देशित किया जाए कि वह प्रत्येक सदस्य को जब तक स्थिति सामान्य नहीं होती तब तक भुगतान करें।

जीवनयापन हो गया है मुश्किल

याचिका में कहा गया है कि वकीलों के साथ क्लर्क का कामकाज है। वह वकीलों से जुड़े हुए हैं। वकीलों की कमाई नए केस की फाइलिंग से जुड़ी हुई है। लेकिन बीते कुछ महीनों से बहुत ही कम मामलों में केस फाइल की गई है। ऐसे में वकील अपने क्लर्क को भी भुगतान नहीं कर पाए हैं।

ज्यादातर बार क्लर्क की स्थिति ऐसी है कि उन्हें अपना जीवन यापन चलाने तक के लिए पैसे नहीं हैं। उनके बच्चों की स्कूल फीस, खाने और स्वास्थ्य की दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। उनके पास कोई और जरिया भी नहीं है। इस विषम परिस्थिति में असोसिएशन ने मदद की गुहार लगाई है।

संकट लॉकडाउन का सीधा परिणाम

याचिका में कहा गया है कि एसोसिएशन के सदस्यों के लिए जो ‘वर्तमान दुख’ पैदा हुए हैं, केंद्र द्वारा दिए गए लॉकडाउन का एक सीधा परिणाम है, और यह न केवल बड़े पैमाने पर लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए , बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका भी सरकार की जवाबदेही है।

नागरिकों के देखभाल की ज़िम्मेदारी सरकार की

याचिका में लिखा है कि सरकार को एसोसिएशन के सदस्यों सहित अपने सभी नागरिकों की देखभाल का कर्तव्य निभाना है, यह इंगित किया गया है कि क्लर्कों को अब तक अपने संबंधित राज्यों से कोई वित्तीय सहायता या सहायता प्राप्त नहीं हुई है और केंद्र द्वारा किसी भी विशिष्ट योजना के तहत कवर नहीं किया गया है।

याचिका में दर्ज है कि केंद्र ने मई के महीने में 20 हजार करोड़ के वित्तीय सहायता पैक की घोषणा की थी, जिसमें लघु उद्योगों, प्रवासी श्रमिकों और अन्य आर्थिक रूप से परेशान लोगों को शामिल किया गया है, हालांकि, याचिकाकर्ता एसोसिएशन और अन्य सदस्यों और समान रूप से है” क्लर्क” के पेशे के लोगों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं बनाई गई है, जो पूरे भारत में प्रचलित है।

ये सदस्य हमारी कानूनी प्रणाली का एक अभिन्न और अपरिहार्य हिस्सा हैं और उनके जीवित रहने को अत्यधिक महत्व दिया जाना चाहिए। “

केंद्र सरकार से दिलाया जाए मुआवजा

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि भारत सरकार ने कोरोना से लड़ने के लिए करोड़ों के मदद की घोषणा की है। डिजास्टर मैनेजमें एक्ट की धारा-11 के तहत इस तरह की परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रावधान करता है। ऐसे में याचिकार्ताओं की गुहार है कि उन्हें मुआवजा दिए जाने का केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए।

शिकायत निवारण के लिए एक राष्ट्रीय योजना तैयार करने से संबंधित प्रश्न उठाते हुए लिखा है:

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 11 इन शिकायतों के निवारण के लिए राष्ट्रीय योजना तैयार करने के लिए विचार करती है। लेकिन इस तरह की कोई योजना तैयार नहीं की गई है।”

इसलिए, यह अतिरिक्त रूप से प्रार्थना की गई है कि सरकार को जल्द से जल्द एक राष्ट्रीय योजना के साथ आने के लिए कहा जाए, जिसमें पूर्व-व्यापी मुआवजे की शर्तें और राशि स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट हो।

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