छँटनी-बंदी का दौर : आईपी सॉफ्टकॉम में मज़दूरों की छँटनी

जब बच्चों के खर्चे का बोझ बढ़ा, तो मज़दूरों के पेट पर पड़ गई लात

रुद्रपुर (उत्तराखंड)। एक तरफ सरकार द्वारा सब को रोजगार देने का लॉलीपॉप और दूसरी ओर मज़दूरों की छँटनी-बंदी का तेज होता दौर। ताजा घटना में एंटीवायरस बनाने  वाली आईटी सॉफ्टकॉम कंपनी में छँटनी-बंदी की प्रक्रिया तेज हो गई है। अबतक 15 श्रमिक बाहर हो चुके हैं।

रुद्रपुर स्थित कंपनी के इस प्लांट ने कोरोना/लॉकडाउन से ठीक पहले 8 मज़दूरों कि अचानक छँटनी कर दी थी। मज़दूर अभी इसके खिलाफ श्रम विभाग में न्याय की गुहार लगाई रहे थे कि कोरोना आपदा में सब कुछ लॉकडाउन हो गया और मज़दूरों को अपना हिसाब लेकर घर जाना पड़ा।

इस बीच कंपनी ने अपना उत्पादन फिर शुरू किया और अब पिछले हफ्ते सात और स्थाई श्रमिकों की छँटनी कर दी है। 

उल्लेखनीय है कि इस कंपनी में कुल 21 स्थाई श्रमिक थे। अब महज 6 स्थाई श्रमिक और चार लोडिंग अनलोडिंग के ठेका श्रमिक बचे हैं। कब इनकी भी छँटनी हो जाए कहना मुश्किल है।

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सरकारी रियायतें निचोड़कर पलायन का धंधा

इस कंपनी ने सरकारी सब्सिडी और टैक्स की छूटों के साथ यहां पर अपना कारोबार शुरू किया था। लेकिन सरकारी रियायतों की अवधि समाप्त होने के साथ कई कंपनियों की तरह आईपी सॉफ्टकाम भी मज़दूरों का खून निचोड़ने के बाद इलाके से पलायन करने की फिराक में है।

हालांकि एंटीवायरस बनाने के कारण इस कंपनी के ऊपर मंदी का कोई साया नहीं है, क्योंकि कंप्यूटर, मोबाइल, नेट के विस्तार के साथ एंटीवायरस की भी मांग और खपत बहुत ज्यादा बढ़ी है। मामला सिर्फ यह है कि कंपनी पुराने मज़दूरों से छुटकारा पाकर कम वेतन वाले नए मज़दूरों व नई सब्सिडी और नए टैक्स की छूटों के साथ कारोबार करना चाहती है।

यही है नया भारत

अभी जब पुराने श्रम कानूनों के मौजूद रहते यह स्थिति है कि श्रम विभाग ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने से हाथ खड़ा कर दे रहा है, तो सोचिए श्रम कानूनों के पूरी तरीके से खत्म हो जाने के बाद मज़दूरों के हाल कितने बेहाल होंगे?

कितना आसान हो गया है मज़दूरों का मन भरकर खून निचोड़ना और फिर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकना!

अधेड़ उम्र में जब बच्चों के खर्च का बोझ मज़दूर पर ज्यादा पड़ता है, ठीक ऐसे वक्त में पेट पर लात पड़ती है और मज़दूर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाते हैं।

यही देश का विकास!

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