श्रम न्यायालय,चेन्नई ने अशोक लीलैंड को बर्खास्त कर्मचारी को 4 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया।

लेबर कोर्ट, चेन्नई ने अशोक लीलैंड प्रबंधन को निर्देश दिया है कि वह अपने फाउंड्री डिवीजन में कथित कदाचार के आरोप में बर्खास्त किए गए श्रमिक को 4 लाख का मुआवजा दे।

अदालती फैसले के अनुसार, आर राजकुमार को प्रबंधन द्वारा 16 जून, 2016 को कदाचार के आरोपों में बर्खास्त कर दिया गया था। राजकुमार पर कंप्यूटराइज्ड अटेंडेंस डेटाबेस के साथ छेड़छाड़ करने और सितंबर 2015 में तीन दिनों के लिए अपनी उपस्थिति गलत तरीके से दर्ज़ करने और दिनांक 01.03.2013 से 22.09.2015 तक की अवधि के लिए अर्थात 17 दिनों तक उक्त रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ करके गलत तरीके से मजदूरी का दावा करने का आरोप था। इसके लिए कर्मचारी के ख़िलाफ़ एक आरोप पत्र जारी किया गया था और अनुशासनात्मक कार्यवाही भी हुई जिसमें घरेलू जांच के बाद एक रिपोर्ट के आधार पर राजकुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।

इसके खिलाफ, राजकुमार ने अपनी बर्खास्तगी को ख़ारिज करने और कंपनी को सेवा की निरंतरता के साथ बहाल करने और पूरी मजदूरी और अन्य लाभों का भुगतान करने का निर्देश देने के लिए श्रम न्यायालय में केस दायर किया था।

श्रम न्यायालय ने कहा कि वह श्रमिकों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना(VRS) स्वीकार करने का दबाव डालने के प्रबंधन की नीयत के बारे में प्रार्थी के तर्क को संज्ञान में नहीं लेना चाहती है। अदालत ने कहा कि जिन परिस्थितियों में प्रबंधन ने श्रमिक पर विश्वास खोया है, वे स्पष्ट रूप से साबित हो चुके हैं और इसलिए श्रमिक को उसी स्थान पर वापस बहाल करने के लिए कंपनी को निर्देशित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने श्रमिक की लगभग 23 वर्षों की सेवा और उसके अंतिम वेतन 40,812 और उसके विरुद्ध किसी अन्य कदाचार के सबूत के अभाव को ध्यान में रखते हुए यह मुआवजा निर्धारित किया है। यह मुआवजा याचिकाकर्ता द्वारा याचिका में मांगे गए बैक वेज और अन्य लाभों के साथ बहाली की मांग के बदले में दिया गया है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रबंधन को इस आदेश (15 जून) के प्रकाशन की तारीख से 30 दिनों के भीतर मुआवजे का भुगतान करना होगा, ऐसा नहीं करने पर 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा।

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