अंधेर नगरी-3 : इस सप्ताह की कविताएं !

अपराधबोध / नित्यानंद गायेन

वो जो बहुत संवेदनशील लगते थे हमें
उनकी बनावटी संवेदनशीलता की बाहरी परत
अब उतर चुकी है

उनसे भूख
और लोगों की मौत पर
सवाल मत पूछिए
वे नाराज़ हो जाएंगे

मैंने भी पूछा था
सड़क पर मरते मजदूरों के बारे में
कहा था उनसे-
आपकी बातों से पेट तो नहीं भरेगा !
उन्होंने मुझे बाहर धकेल दिया

एक अधेड़ उम्र की औरत
कमरा खाली कर चली गयी दो दिन पहले
फ्लैट्स वाले बाबुओं ने उससे
अपने घरों में काम कराने से मना कर दिया

साईकल पर कचौड़ी बेचने वाले एक पिता ने
गांव जाकर ख़ुदकुशी कर ली
वो मुझे भी कवि कहता था
मैंने उसे कविता नहीं सुनाई
एक दिन कुछ पैसे देना चाहा
उसने मुस्कुराकर कहा था – आपकी हालत तो मैं भी जानता हूँ
कमरे में आते-आते भीग गई थी मेरी आँखें
किन्तु चीख़ कर रो नहीं पाया था उस रात

उसे महामारी ने नहीं
उसे व्यवस्था और इस मुखौटाधारी समाज ने मारा है

एक साथी ने फोन पर कहा – पता नहीं आगे क्या करूंगा !
कोरोना मारेगा या ख़ुद ही मर जाऊँगा

लॉकडाउन में भूख तो नहीं रुकी
मौत भी नहीं रुकी
भूख से मेरे लोगों की सूची कहीं देखी है आपने

काम छूटने पर कमरा खाली कर गयी औरत की मैंने कोई ख़बर नहीं ली
ख़ुदकुशी कर चुके उस कचौड़ी वाले के परिवार को
मैंने नहीं देखा !!

सड़क पर चलते हुए मारे गये सैकड़ों मजदूरों को बचाने के लिए
मैं कुछ नहीं कर पाया
अपने तमाम अपराधों में
मैं इसे भी शामिल करता हूँ
मजबूरी या विवशता कह कर इस अपराध से
मुक्त नहीं होना चाहता ….


भूखों की रोटी हड़प ली गई है / बर्टोल्ट ब्रेख़्त

भूखों की रोटी हड़प ली गई है
भूल चुका है आदमी मांस की शिनाख्त
व्यर्थ ही भुला दिया गया है जनता का पसीना।
जय पत्रों के कुंज हो चुके हैं साफ।
गोला बारूद के कारखानों की चिमनियों से
उठता है धुआं।


इसे भी देखें –

जिंदा रहे तो फिर आएंगे / सत्येंद्र कुमार रघुवंशी

तुम्हारे शहरों को आबाद करने
वही मिलेंगे गगनचुम्बी इमारतों के बीच
प्लास्टिक की तिरपाल से ढंकी अपनी झुग्गियों में

चौराहों पर अपने औजारों के साथ
फैक्ट्रियों से निकलते काले धुंए जैसे
होटलों और ढाबो पर खाना बनाते , बर्तन धोते
हर गली हर नुक्कड़ पर फेरियों में
रिक्शा खींचते ऑटो चलाते
सँवारियो को मंजिल तक पहुंचते

हर कही हम मिल जायेंगे
पानी पिलाते और गन्ना पेरते
कपड़े धोते और प्रेस करते
समोसा तलते पानीपूरी बेचते

ईट भट्ठों पर ,तेजाब से धोते जवाहरात
पालिस करते स्टील के बर्तनों को
मुरादाबाद ब्रास के कारखानों से लेकर
फिरोजाबाद की चूड़ियों , पंजाब के खेतों
से लेकर लोहामंडी गोविंदगढ़
चाय के बागानों से लेकर जहाजरानी तक
मंडियों में माल ढोते
हर जगह होंगे हम

बस इस बार ,एक बार घर पहुंचा दो
घर पर बूढ़ी माँ है , बाप हैं
खबर सुनकर परेशान हैं

बाट जोह रहे हैं काका काकी
मत रोको हमे जाने दो

आएंगे फिर जिंदा रहे तो
नही तो अपनी मिट्टी से समा
जायेगे चुपचाप


युद्ध / आदित्य कमल

लुटेरे हैं… तो युद्ध है !

पागलपन नहीं है युद्ध
क्या पागलपन में जुटाई जाती हैं सेनाएँ
जमा किए जाते हैं असलाह ?
बाज़ार है, और बाज़ार पर कब्ज़ा है
कब्ज़ा है, और कब्ज़े की मारामारी है
मारामारी है… मारामारी की सियासत है
सियासत है और सियासत में युद्ध है..!

लुटेरे हैं… तो सतत ज़ारी है युद्ध !!

युद्ध है
तो युद्ध के खिलाफ भी हो सकता है-युद्ध।

दुनिया भर के
शोषितों-उत्पीड़ितों की
विराट सेना से बड़ी
कोई सेना नहीं होती।

लुटे-पिटे लोग
जब सड़कों पर होते हैं
तो सीखते है युद्ध !
राजनीतिक सरगर्मियों के बीच
जमा होते जाते हैं उनके भी कई हथियार
कंठस्थ होते जाते हैं दाव-पेंच
लड़ाइयों के कठिन पाठ।

जब लोग पूछने लगते हैं सवाल कि
हमारे बेटे किनके लिए मारे जा रहे हैं
तो वो समझने लगते हैं हित…
कि दरअसल युद्ध किनके हितों के लिए हैं।

सचेत सर्वहाराओं के लश्कर
निश्चय ही ध्वस्त करेंगे –
लुटेरों के छुपने की आखिरी शरणस्थली
पूंजी के गुप्त बंकर तक।

इतिहास गवाह है।

हरामखोरों के मैनेजरों ने
तभी तो भयाक्रांत हो
लगा रखी है हथियारों की होड़
नुमाइश आतंक की
फैला रखा है भय का वातावरण
पूरी दुनिया में
हीस्टीरिया, युद्धोन्माद !

आओ, हम संगठित मुट्ठियाँ उठाएँ
चारों तरफ़ से घेरें उन्हें।
आओ, रूख करें हम अपनी लड़ाई का
सीधा उनकी तरफ
ताकि खदेड़ दी जाए
दोनों तरफ के लुटेरों की सेना
कि फिर कोई युद्ध न हो।

उत्पीड़ितों की सेना को करना ही पड़ेगा –
युद्ध-युद्ध के विरूद्ध !



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