विरोध के बावजूद 41 कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया शुरू

सार्वजानिक कंपनियों को बेचने में सक्रिय हैं प्रधानमंत्री मोदी

कोरोना/लॉकडाउन का लाभ उठाकर मोदी सरकार मज़दूर अधिकारों को छीनने और जनता की गाढ़ी कमाई से खड़े सार्वजानिक उद्योगों को औने-पौने दामों में मुनाफाखोर कम्पनियों को सौपने के लिए पूरी तरह से सक्रिय है। इसी क्रम में ज़नाब मोदी ने 41 कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।

चीन से विवाद और चीनी सामानों के बहिष्कार के शोर के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को 41 कोयला खदानों के वाणिज्यिक खनन की नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी। सरकार के इस कदम से देश का कोयला क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खुल गया।

खनन नीलामी प्रक्रिया शुरू करने की मंजूरी देते हुए ज़नाब मोदी फरमाते हैं कि देश कोरोना वायरस संक्रमण से अपनी लड़ाई जीत लेगा और इस संकट को एक अवसर में बदलेगा। ज़नाब की मंशा साफ़ है कि अवसर निजी कंपनियों के हित में बदल रहा है।

मोदी ने कहा कि नीलामी प्रक्रिया की शुरुआत होना देश के कोयला क्षेत्र को ‘दशकों के लॉकडाउन’ से बाहर निकालने जैसा है। यानी सरकार देश की जनता को लॉकडाउन में उलझाकर सार्वजनिक सम्म्पत्तियों को मुनाफाखोरों को सौपना ही ‘लॉकडाउन’ से बाहर आना है।

प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नीलामी प्रक्रिया का उद्घाटन किया। कोयला खदानों पर अपनी गिद्ध दृष्टि लगाए वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल और टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

कोयला और खान मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा कि देश के कोयला उत्पादन को एक अरब टन तक पहुंचाने के लिए क्षेत्र में 50,000 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। कोयला मंत्रालय ने फिक्की के साथ मिलकर 41 कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया शुरू की है।

यह नीलामी कोयला खदान (विशेष प्रावधान) अधिनियम और खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम के तहत की गई है।

देश के विभिन्न हिस्सों में इस कदम का विरोध हो रहा है।

छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य क्षेत्र के नौ सरपंचों ने नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर खनन नीलामी पर गहरी चिंता जाहिर की है और कहा था कि यहां का समुदाय पूर्णतया जंगल पर आश्रित है, जिसके विनाश से यहां के लोगों का पूरा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

ग्राम प्रधानों ने कहा था कि एक तरफ प्रधानमंत्री आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ खनन की इजाजत देकर आदिवासियों और वन में रहने वाले समुदायों की आजीविका, जीवनशैली और संस्कृति पर हमला किया जा रहा है।

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