आज का मुद्दा क्या है, ढूँढते रह जाओगे!

झूठ के “महापलों” के बीच सच के ‘‘एक पल’’ की तलाश- 2

संकट महाभिषण है! कोविड-19 महामारी है, लॉकडाउन है। पलायन का दर्द है, छंटनी की तलवार है। वेतन के लाले पड़े हैं और ज़िन्दगी बेहाल है। मरते-खपते लोग हैं, तो इलाज़ का आभाव है…! चीनी कम्पनियों को अरबों का ठेका भी है और चीनी सामानों के बहिष्कार का शोर भी! पर असल मुद्दा क्या है?

प्रवासी मज़दूरों का दर्द और घरवापसी की महाविपदा, भटकती ट्रेनों, सबको वेतन देने के जुमले की बात, ताली-थाली पीटने, मोमबत्तियां जलाने, 18 दिन महाभारत का धैर्य, टैक्स का बोझ, सस्ते तेल की महँगी कीमत, इलाज के नाम पर भयावह वसूली जैसे मुद्दे कहाँ खो गए?

देश में कोरना संक्रमण के मामले छलांगें ले रही हैं, मौत के आंकडे तेजी से बढ़ रहे हैं, भारत संक्रमण के मामलों में दुनिया में चौथे स्थान पर काबिज हो चुका है। पिछले पांच महीने के दौरान मोदी सरकार की घोषणाएँ अपरिपक्वता और फरमानशाही का दर्पण बन गईं!

मेहनतकश जनता की भयावह तबाही के बीच अडानियों-अम्बानियों के मुनाफे छलांगे ले रही हों! मज़दूरों के अधिकारों में तेज होती डकैतियों से त्रस्त जनता में विरोध बढ़ने लगा हो! बिहार चुनाव की अमित शाह की वर्चुअल रैली फ्लाप हो गई हो। एकमात्र “हिन्दू राष्ट्र” नेपाल भी पहली बार आइना दिखला दिया! तो अचानक चीन से युद्ध का शंखनाद कैसे हो गया!

चीन से युद्ध और जवानों की मौत सुर्ख़ियों में आ गई! अब सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग ने सवाल उठाए कि सब कुछ जानते हुए भी जवानों को बिना हथियार के क्यों भेजा गया? सवाल तो और भी कई उठ रहे हैं…।

इस श्रृंखला की पहली कड़ी भी पढ़ें- झूठ कैसे बन जाता है सच

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इधर कोविड त्रासदी के बीच दुबका-सहमा भाजपा-संघ का आईटी सेल चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए फिर सक्रिय हो गया! वह भी उस चीन से वाकयुद्ध तेज हो गया, जिससे कुछ दिनों पहले तक कोविड जाँच के किट आ रहे थे! जिसे रैपिड ट्रांजिट कॉरिडोर तक के ठेके मिल गए!

ग़जब का खेल है! जब सरदार पटेल की करोड़ों रुपए की मूर्ति चीन से आई थी, तब चीनी झालर के बहिष्कार का मुद्दा कोप घर में चला गया था! तब पटेल की विरासत को कब्जाने का खेल प्रधान था! इसबीच बड़े मधुर सम्बन्ध रहे मोदी और जिनपिंग के!

मोदी और चीन के राष्ट्रपति की शिखर ...

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 2014 में अहमदाबाद की मुलाक़ात हो या 2019 में महाबलीपुरम में एक साथ सैर करना, तब दोनों देशों के बीच मधुर लगे रहे रिश्ते अब कड़वाहट और टकराव से भर गए हैं।

असल में संकट में चीन भी है और उससे अधिक भारत भी! देशों के भीतर का संकट सीमा पर उभरकर आ गया और भीतर के भयावह संकट पर यह छा गया!

मुद्दा घूमा, तो रोजी-रोटी का संकट, कोरोना को लेकर तमाम आशंकाएं, सरकारी अव्यवस्था और अक्षमता, दवा-इलाज, कोविड के विकट रूप लेते आंकड़े, मंदी, महँगाई… सब चला गया ठन्डे बसते में!

आज एकबार फिर देश के रंगमंच पर जनविरोधी सरकारी नीतियों की बेलगाम गति, और आमजनता की बढ़ती तबाही के बीच तमाम खेल जारी हैं। विभ्रम के नये-नये बादल उमड़-घुमड़ रहे हैं। ….और इसमें विलुप्त हो गये हैं जनता के असल मुद्दे!

कोशिश करके देखो, ढूंढ़ते रह जाओगे!

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