जुझारू मज़दूर नेता दत्ता सोनावने बने कोविड-19 का शिकार

एक संघर्षशील नेता का असमय चला जाना, मज़दूर आन्दोलन की अपूर्णीय क्षति है!

भारतीय हवाई अड्डे के कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष 57 वर्षीय दत्ता सोनावने, 13 जून 2020 को  मुंबई के कांदिवली स्थित ईएसआई अस्पताल में कोविड 19 का शिकार हो गए। एक ऐसे संकटपूर्ण समय में, जब कोरोना/लॉकडाउन संकट के साथ मजदूर अधिकारों पर हमले तेज हैं, दत्ता जैसे नेता का चला जाना, अपूर्णीय क्षति है।

एक ठेका मज़दूर से जुझारू ट्रेड यूनियन कर्मी तक

दत्ता मुंबई के छत्रपति शिवाजी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के ट्रॉली विभाग में एक अनुबंध कर्मी थे। उन्होंने वर्ष 1993 में हवाई अड्डे पर काम करना शुरू किया और 1994 तक वह और उनकी यूनिट के 100 से अधिक श्रमिक यूनियन ने शामिल हो गए।

तब मुंबई में हवाई अड्डों पर ठेका श्रमिकों को संगठित करने की यूनियन की गतिविधियां चरम पर थी। उन दिनों भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइंस और पवन हंस के कर्मचारी हर रोज हजारों की संख्या में संगठित हो रहे थे।

वेतन भुगतान वाले दिन मज़दूरों से ठेकेदारों द्वारा “हफ्ता” या जबरन पैसे वसूली को रोकने की मांग के साथ, इन संघर्षों से प्रेरित होकर दत्ता भी यूनियन में शामिल हो गए। उन दिनों एएआई में ये वसूली का काम कई जगह पर खुलेआम किया जाता था। यूनियन का मुख्य संघर्ष इस प्रथा को बन्द करवाना था और अधिकारियों से शिकायत करने का कोई फ़ायदा नहीं था।

यह हवाई अड्डे के टर्मिनल बिल्डिंग, आनुषंगिक इकाईयों, वर्कशॉप, प्लांट, रनवे, सड़कों और हवाईअड्डों से लगी सैकड़ों एकड़ ज़मीन पर बसी मज़दूरों की कालोनियों की एकता और बड़ी संख्या में थी, जो इस माँग को हासिल कर सकती थी।

इन मज़दूरों में लोडर, स्वीपर, कैंटीन वर्कर, मालिस, सुरक्षा गार्ड, रनवे पर बर्ड चेज़र, बढ़ई, राजमिस्त्री, प्लंबर, पंप ऑपरेटर, इलेक्ट्रीशियन, मैकेनिक, हेल्पर्स, स्टोर कीपर, क्लर्क आदि शामिल थे और इन्हें ठेका, कैजुअल, अस्थाई मज़दूर आदि विभिन्न श्रेणियों में बांटा हुआ था।

ये सभी मज़दूर स्थायी प्रकृति के काम करते थे। काम के बदले उन्हें मामूली तनख्वाह के अलावा कुछ नहीं मिलता था। उनके बदन पर बहुत चमकीले रंगों वाली जैकेट या डंगरी होती थीं ताकि उन्हें आसानी से कहीं भी देखा जा सके। बस उनके एयरपोर्ट पास छीनकर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था। मारपीट होना आम बात थी।

एक बार मजदूरों के एकजुट होने और पलटकर वार करना सीखने के बाद यह सब बंद हो गया।

हवाई अड्डे को ठेकेदारों के साथ चिह्नित किया गया था। कहीं-कहीं ठेकेदार के अधीन सौ से अधिक मज़दूर काम करते थे और कहीं बस एक श्रमिक। एक बार जब संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हुई, तो इसने ज़ोर पकड़ लिया और हर जगह के मज़दूर केवल अपनी इकाइयों के नेतृत्व के लिए ही सामने नहीं आए, बल्कि अन्य इकाइयों और कंपनियों के लिए भी खड़े हुए।

जो मज़दूर एक-दूसरे के साथ वर्षों से काम कर रहे थे, लेकिन अलग-अलग ठेकेदारों के अधीन काम करने की वज़ह से वे एक-दूसरे को नहीं जानते थे, वही अब संघर्ष में एक दूसरे का हाथ थामे साथी बन गए।

संघर्षों से मिला हक़

यह एक लंबी कहानी है। अदालत के आदेशों और समझौतों के माध्यम से, ज्यादातर मज़दूरों की नौकरी पक्की हो गई लेकिन बिना संघर्ष यह संभव नहीं था। इन प्रबंधकों ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को तब तक लागू नहीं किया, जब तक कि दिल्ली में मुख्यालय का घेराव नहीं किया गया, जहां मजदूरों ने वहां से जाने से तबतक इनकार कर दिया जबतक उन्हें लिखित जवाब नहीं मिला।

लेकिन दत्ता जैसे कुछ लोग अभी भी तथाकथित संविदा पर काम कर रहे थे, लेकिन यूनियन होने के वज़ह से पिछले 25 सालों से नौकरी कर रहे थे।

जब मुंबई हवाई अड्डे का निजीकरण किया गया तो अधिकांश स्थायी कर्मचारियों ने निजी कंपनी एमआईएएल में शामिल होने के विकल्प से इनकार कर दिया और एएआई के साथ बने रहे। जिन निजी कंपनियों ने हवाईअड्डों का अधिग्रहण किया, उन्होंने एक बार फिर इन सभी पदों पर नए ठेकाकर्मियों की भर्ती कर ली।

दत्ता : एक मज़दूर का संघर्षमय जीवन

दत्ता उस दिन से सक्रिय थे जब वे यूनियन में शामिल हुए थे।

दत्ता सोनावने दलित थे, जो दमित-उत्पीडित धोर जाति (चर्मकार समुदाय) से ताल्लुक रखते थे। वह कोहिनूर मिल्स में नौकरी करने वाले मिल मज़दूर का बेटा था और उनकी माँ दादर सब्जी मंडी में सब्जियां बेचती थी। उन्होंने अपने गाँव में स्कूल की पढ़ाई की। उन्होंने दादर अंबेडकर कॉलेज से 11 वीं और 12 वीं की।

मिलों के बंद होने के बाद 6 सदस्यों वाला उनका परिवार पूरी तरह से उनके वेतन पर निर्भर था क्योंकि तब तक वे दादर स्थित एक प्रेस में मज़दूरी करने लगर थे। प्रेस में भी उन्होंने यूनियन बनाई और मज़दूरों के लिए संघर्ष किया।

दत्ता, जिन्हें सभी श्रमिकों द्वारा दादा या बड़ा भाई कहा जाता था, केवल अपने यूनियन के श्रमिकों के लिए काम नहीं करते थे। वह जहाँ भी गए वहाँ के श्रमिकों की समस्याओं में शामिल हो गए चाहे वे दूसरे यूनियन के लोग हो या असंगठित क्षेत्र के मज़दूर हों। उसके लिए यह मज़दूर वर्ग और गरीब और उनके खिलाफ होने वाले अन्याय का मामला था।

वो जल्द गुस्सा हो जाते थे और अक्सर उन लोगों के साथ लड़ बैठते थे जो उनके सबसे करीब थे, लेकिन कभी किसी मज़दूर ने इस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह जानता था कि वह उनके लिए चिंतित था।

वे यूनियन कार्यालय में और हवाई अड्डे या अन्य जगहों पर लंबे समय तक काम करते थे, यदि आवश्यक हो तो यूनियन के कार्य के लिए शहर से बाहर भी जाते थे। दफ्तर में झाड़ू लगाना और पानी भरना या कोई पत्र, पर्चा या पोस्टर लिखना, श्रमिकों को संबोधित करना, दूसरों को यूनियन के काम में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना, आंदोलन या प्रचार करना, दूसरों के साथ एकजुटता दिखाना हो, कोई भी काम हो उन्होंने लाल झंडे की स्थिति को समझा।

अन्याय के ख़िलाफ़ मुखर आवाज़, एक सच्चे सर्वहारा

असंगठित क्षेत्र की मज़दूर यूनियनों में शायद ही कोई दिन बिना समस्याओं के गुजरता हो। जहाँ कभी प्रबंधन या ठेकेदारों द्वारा कोई अन्याय होता था, वह मुखर होकर और सैद्धांतिक तरीके से मज़दूरों को अपने साथ लेकर लड़ाई लड़ता था। खुद की परवाह किए बिना वह हमेशा दूसरों के बारे में सोचता था।

तमाम यूनियनों ने दत्ता सोनावने के निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने मजदूरों और गरीबों के साथ हर जगह एक गहरा जुडाव महसूस किया। वह एक सच्चे सर्वहारा थे। यूनियन में उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। वह हर रोज याद आएंगे और यूनियन और हमारे जीवन में उनके योगदान को हम हमेशा याद रखेंगे। उन्होंने जो उदाहरण स्थापित किया है वह अनुकरणीय है।

इस कोरोना महामारी के दौरान जब सरकारें बेशर्मी से लॉकडॉउन और महामारी के अवसर का इस्तेमाल कर मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकशों पर हमला कर रही हैं, उनके सभी कानूनी अधिकारों को छीना जा रहा, यहाँ तक कि यूनियन बनाने के उनके अधिकार को भी कुचला जा रहा है।

ऐसे में आज जनता के बीच निकलकर आने वाले लड़ाकू नेतृत्व वाली यूनियन को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। मज़दूरों के बीच से कई दत्ता पैदा होते रहेंगे। मजदूर वर्ग लाल झंडे को थामे रहेगा और पलटकर वार करेगा !

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दौरान एयरपोर्ट के श्रमिकों की समस्याएँ

जैसा कि हम जानते हैं कि कोविड 19 को विदेश से भारत लाया गया है। और यह हवा के माध्यम से आया था। इसलिए देश के अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे कोरोना के प्रवेश द्वार रहे हैं। लॉकडाउन के बाद कुछ उड़ानों को छोड़कर हवाई अड्डों को बंद कर दिया गया था। श्रमिकों को 25 मार्च से 25 मई तक घर पर रहने के लिए कहा गया था उसके बाद उन्हें काम पर वापस बुलाया गया था।

लॉकडाउन के दौरान महीने की पहली तारीख़ को मिलने वाले वेतन का जान बूझकर 10 से 12 दिन विलम्ब से भुगतान किया गया। पहले श्रमिकों को उनके तय मासिक वेतन से कम भुगतान किया गया था, लेकिन बाद में यूनियन द्वारा प्रबंधन के समक्ष समस्या उठाए जाने के बाद उन्हें बचे हुए पैसे भी मिल गए।

जब पहली बार मार्च में कोरोना संक्रमण के मामले आने शुरू हुए तो कुछ श्रमिकों (सभी नहीं) को एक मास्क और एक जोड़ी दस्ताना दिया गया था। इसके बाद कुछ नहीं दिया गया। तापमान मापने वाली मशीन कभी काम नहीं करती है। यह सामान्य से नीचे तापमान दर्शाती है। सार्वजनिक और स्टाफ शौचालय की साफ़ सफाई नहीं की जाती है। ज्यादातर समय उनमें साबुन नहीं होता है और नल को हाथ से खोलना पड़ता है। सेनेटाइजर भी नहीं दिए जाते हैं।

हालांकि मार्च में बायोमेट्रिक अटेंडेंस मशीन का उपयोग बंद कर दिया गया था लेकिन 24 मई से लॉकडाउन खुलने के बाद से श्रमिकों को हाजिरी लगाने के लिए इसका उपयोग करने पर मजबूर किया जाता है। जबकि परमानेंट श्रमिकों को इस चीज़ से छूट दी गई है।

24 मई की रात से घरेलू उड़ानों के फ़िर से शुरू होने के बाद से, श्रमिकों को काम पर वापस बुला लिया गया और रोस्टर के अनुसार उन्हें एक दिन छोड़कर ड्यूटी करने को कहा गया है। काम करने को तैयार सभी श्रमिकों ने ड्यूटी ज्वाइन कर ली, लेकिन अचानक 9 जून को ड्यूटी रोस्टर बदलकर 55 वर्ष से अधिक आयु के श्रमिकों को ड्यूटी करने से रोक दिया गया था।

काम से हटाए गए इन श्रमिकों को अभीतक कोई नोटिस नहीं दिया गया है। लिखित में कुछ भी न देकर प्रबंधन अपने सभी विकल्प खुले रखता है।

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