सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार ने वेतन भुगतान से झाडा पल्ला

सरकार ने अदालत में कहा, लॉकडाउन में वेतन कटौती के लिए कंपनियां स्वतंत्र हैं

लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को पूरा वेतन देने का आदेश देने वाली मोदी सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में पलटी मार दी है। सरकार ने कहा कि यह कंपनी और कर्मचारी के बीच का मसला है। यही नहीं सरकार ने कहा कि हम इसमें दखल नहीं देंगे। कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है और फैसला 12 जून को आएगा।

सरकार ने कहा यह पलायन रोकने के लिए था आदेश

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा कि जब लॉकडाउन शुरू हुआ था, तब कर्मचारियों के काम वाली जगह को छोड़कर अपने गृहराज्यों की ओर पलायन करने से रोकने के मंशा के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। लेकिन अंततः ये मामला कर्मचारियों और कंपनी के बीच का है और सरकार इसमें दखल नहीं देगी।

ज़नाब मोदी ने का एक और बयान जुमला साबित करते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ये तो नौकरी देने वाले और करने वाले के बीच का मसला है। लिहाजा, इसमें हमारा दखल देना उचित नहीं।

पीएम मोदी ने कहा था सबको वेतन देना होगा

लॉकडाउन लागू होने से पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा था कि लॉकडाउन की अवधि के दौरान कर्मचारियों की वेतन में कटैौती नहीं की जानी चाहिए। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 29 मार्च को आदेश जारी किया गया था कि लॉकडाउन की अवधि के दौरान भी कंपनियों को कर्मचारियों को पूरा वेतन देना होगा। ऐसा न किए जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी रोक

लॉकडाउन के दौरान वेतन के भुगतान को लेकर कंपनियों को आदेश देने की माँग वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सरकार के इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आखिर सरकार कंपनियों से लगातार कितने दिन बिना काम के पूरा वेतन देने की उम्मीद रखती है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने गृह मंत्रालय के आदेश के पालन पर रोक लगा दी थी।

अदालत ने सरकार से कहा कि आपका यह पक्ष रहा है कि लॉकडाउन के दौरान भी कर्मचारियों को वेतन का पूरा भुगतान होना चाहिए।

जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली बेंच ने कहा है कि 54 दिनों के लॉकडाउन के दौरान की वेतन के भुगतान को लेकर कंपनियों और कर्मचारियों के बीच कोई सहमति बननी चाहिए।

बेंच में शामिल जस्टिस संजय किशन कौल ने केंद्र सरकार से कहा, ‘आप कर्मचारियों की जेब में पैसे डालने का प्रयास करते रहे हैं। ऐसे में अब कुछ समाधान किए जाने की जरूरत है।’

अदालत  ने पूछा- आखिर कहां गए 20 हजार करोड़ रुपये?

सुनवाई के दौरान जस्टिस कौल ने कहा कि आप एक ओर तो ये दावा कर रहे हैं कि आपने कामगारों की जेब में पैसे डाले हैं। वो 20 हजार करोड़ रुपए आखिर कहाँ गए? इस पर अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि हमने सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्योगों की मदद में वो रकम लगाई है। सरकार ने ये बहुत जबरदस्त काम किया है।

इस पर जस्टिस कौल ने कहा कि हम अपने सवाल का जवाब चाहते हैं, सरकार के लिए सर्टिफिकेट नहीं।

वहीं, वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि स्थायी कर्मचारियों और कामगारों के मुकाबले अस्थाई कामगारों पर ही ज्यादा असर पड़ा है। एनडीएमए पर सख्त अमल की वजह से कामगारों को अब कारखानों तक लाने- ले जाने के लिए वाहन सेवा देनी जरूरी हो।

ईएसआई फंड से भी लाभ नहीं मिलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि ईएसआई फंड का इस्तेमाल प्रवासी/अन्य मजदूरों के हित में किया जा सकता है? इस पर अटार्नी जनरल ने कहा कि उस फंड का इस्तेमाल तो रिटायरमेंट के बाद की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए होता है। उस फंड को रिडॉयरेक्ट नहीं कर सकते। हां, कर्मचारी कर्ज ले सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि मूल आदेश प्रवासी मजदूरों को लेकर था। क्या इसे सामान्य कामगार तक विस्तार दे सकते हैं? अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि इसमे कोई आपत्ति नहीं होगी। मेहनताना मिले तो कोई क्यों प्रवासी या पलायन करेगा।

कम्पनियों ने दायर की थी याचिका

कुछ उद्योगों ने लॉकडाउन में पूरा वेतन देने के 29 मार्च के आदेश को चुनौती दी है। दायर याचिका में अपने स्टाफ को वेतन देने में उन्होंने असमर्थता जताई थी। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से एक सप्ताह में जवाब मांगा था।

मोदी सरकार ने कहा, आदेश लिया वापस

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार के नए नोटिफिकेशन में लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने की शर्त को हटा दिया गया है।

केंद्र ने कहा था कि 17 मई को नई अधिसूचना जारी हुई है जिससे पुरानी 29 मार्च की अधिसूचना समाप्त हो गई है, जिसे यहां चुनौती दी गई है।

सरकार ने कहा कि निजी कंपनियां लॉकडाउन के दौरान अपने श्रमिकों की वेतन कटौती के लिए स्वतंत्र हैं।  लेकिन उद्योगों के वकीलों ने सरकार के इस कदम को भी नाकाफी कहा।

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