अंधेर नगरी – 1 : इस सप्ताह की कविताएं !

सफ़ूरा ज़रग़र की अजन्मी बिटिया की ओर से

सब कुछ ठीक है अम्मा! / अंशु मालवीय

सलाखों की छाया तुम्हारे पेट पर देखी है मैंने
और सुनी है तुम्हारे दिल की थरथराहट
कोख के पानी में

सब कुछ ठीक है अम्मा!

तुम जेल की कोठरी में हो
और मैं तुम्हारी कोख में
तुम अपने वतन में हो
मैं अपने वतन में
सलाखों से रिसती धूप
रौशनदान से झांकती चांदनी
तुम्हारी धड़कन में सीझकर पहुंचते हैं मेरे पास।

सब कुछ ठीक है अम्मा!

वे जब तुम्हें कैद कर लाए ना अम्मा
उन्हें पता नहीं था
वे एक को नहीं दो को कैद कर लाए हैं
जब तुम्हें खाना दिया
तो पता नहीं था उन्हें
तुम्हें एक की नहीं दो की भूख है
जब सोईं ना तुम
तो पता ही न चला उन्हें
कि ये एक की नहीं दो की नींद है
और कहां पता चलना था उन्हें
कि तुम्हारी आंखों में
एक के नहीं दो के ख़्वाब हैं
कैसा चकमा दिया उन्हें अम्मा
तुम्हारे भीतर छुपकर आ गई मैं

मैं बहुत खुश हूं अम्मा!

अपनी उन आंखों से जो अभी नहीं खुलीं
मैंने एक दुनिया देखी
अपने उन कानों से जो कुछ नहीं सुनते
मैंने कुछ गीत सुने
अपनी उस ज़बान में जो अभी नहीं चली
मेरे पास कुछ जवाब हैं
अजन्मे जवाब अम्मा!
मेरे बाप का नाम पूछें तो कहना वतन
मेरा वतन पूछें तो मुट्ठी भर जेल की माटी देना
मेरा धरम पूछें
तो कहना वहीं जो मादरे हिंद का है
और जो पूछें अम्मा तुमसे
कौन है तुम्हारे पेट में
तो कहना आज़ादी का इक नन्हा नग़्मा पलता है!

बंदिनी मांएं आज़ाद नहीं होतीं
जनमती है
बंदिनी बेटियां जनमती नहीं
आज़ाद होती हैं
तुम कब जनमोगी अम्मा
मैं कब आज़ाद होउंगी!


दुर्भाग्य / हूबनाथ

राजा की मखमली पोशाक
गुलाबी गाल
मोतियों से खिलखिलाते दांत
महामंत्री के सुडौल सुष्ठु
स्वर्णसमान काया से
बिल्कुल भी नहीं लगता था
कि राज्य में
किसी भी तरह की
कोई कमी थी
अनाज के कोठार लबालब
ख़ज़ाना खचाखच
खुशियां लहालोट
दो हजार मील तक मार करनेवाले प्रक्षेपास्त्र
ब्रह्मास्त्र
बारूद इतना कि
धरती को कईबार रेत बना दे
आत्मविश्वास इतना
कि ईर्ष्या हो ईश्वर को
जब चाहे
राजा जा सकता था
चांद पर
और वहां से देखकर
अपने ख़ुशहाल राज्य को
फूला नहीं समाता
राजा
कभी बीमार नहीं होता
कभी भूखा नहीं रहता
कभी पैदल नहीं चलता
राजा कभी मरता भी नहीं
इसलिए
भूख क्या है
बीमारी क्या है
मृत्यु क्या है
राजा नहीं जानता
राजा न बुद्ध है न बुद्धू
राजा सर्वशक्तिमान
सर्वज्ञ सर्वोच्च सत्ता है
ऐसे
भूतो न भविष्यति राजा के
सुशासन में
कुछ लोग भूख से बचने
मौत से बचने
बीमारी से बचने
पैदल चल रहे हों
भूखे मर रहे हों
आत्महत्या कर रहे हों
बेरोज़गारी बेकारी से
तो इसके ज़िम्मेदार
वे ख़ुद हैं
राजा नहीं
राजा ने तो मना किया था
घर से निकलने को
पैदल चलने को
भूखे रहने को
राजा को सब कुछ दिखता है
चांद पर से
फर्क सिर्फ इतना कि
इन्सान दिखता है
कीड़े मकोड़ों की तरह
इसमें राजा का क्या दोष
वह तो दिन रात राज्य की
ख़ुशहाली के लिए
खटता रहता है
वह इतनी दौलत
इतनी संपत्ति
इतने साधन
जुटा देना चाहता है
कि कोई कमी न रहे
कोई भूखा न रहे
कोई बेकार न रहे पर
दुर्भाग्य भी तो कुछ होता है
कुछ दुष्ट लोग
प्रजा के दुर्भाग्य के लिए
कोसते हैं राजा को
जबकि दुर्भाग्य तो
पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का
फल होता है
इसमें
बिचारे राजा का क्या दोष!


कैसे भूलेंगे आखिर ! / आदित्य कमल

कई दिनों से नहीं निवाला; कैसे भूलेंगे आखिर
हाथ का घट्ठा,पाँव का छाला; कैसे भूलेंगे आखिर !

कंधे पे बच्चे की लाश ले भटके हैं मीलों-मीलों
भूख -प्यास से पस्त, बेलाला; कैसे भूलेंगे आखिर !

अंतहीन दुख-दर्द, तबाही, ज़िल्लत और हिकारत के
जीवन का हर दिन है काला, कैसे भूलेंगे आखिर !

खाली हाथ खड़े हैं बेवश, सिर्फ हाथ मलते हमसब
हरेक ओर लटका है ताला, कैसे भूलेंगे आखिर !

तेरे फर्जी भाषण के हर एक शब्द अब चुभते हैं
सीधे छाती पर है भाला, कैसे भूलेंगे आखिर !

चौकीदार का अर्थ असल तुमने हमको जो सिखलाया
‘दौलत वालों का रखवाला’, कैसे भूलेंगे आखिर !

देशराग बजवाओ, देश की हड्डी चूसने वालों तुम
हमको तो है देशनिकाला, कैसे भूलेंगे आखिर !


राजा, वज़ीर, चोर, सिपाही / शुभाष त्राण

राजा, वज़ीर, चोर, सिपाही,
बनिया, भिश्ती और कसाई,

जीत गये हैं मिल कर सारे,
भ्रष्टाचार की बड़ी लड़ाई ।
अंधड़ और बवंडर को अब,
नाम दिया जाय पुरवाई ।
व्यापारी की बाँछें खिल गई
साधू ने भी अलख जगाई ।
जमाखोर का नारा है कि,
चोखा धन्धा , खरी कमाई।
तुलसी बाबा लिख छोड़ें है,
समरथ को नाहीं दोष गुसाँई



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