इस सप्ताह : उदय प्रकाश की तीन कविताएं !

जलावतनी / उदय प्रकाश

उन्होंने दबा दिए सारे बटन
जल गए सारे बल्ब

अनगिनत रँगों के अपार उजाले में
जगमगा उठा वह महा-शहर

’कितना अन्धेरा है यहाँ ?’
मैंने धीरे से कहा
किसी रोशनी से सराबोर सड़क पर चलता हुआ

शहर से निकाला गया मुझे
इतना बड़ा झूठ बोलने के लिए।


जो बेतरह ठगा गया है / उदय प्रकाश

जो बेतरह ठगा गया है, ठग उसे देख कर हंसे जा रहे हैं
जो ठग नहीं भी हैं, वे भी हंस रहे हैं
लेकिन जो ठगा गया है, वह प्रयत्न करता है हंसने का
और आख़िरकार हंसता है वह भी एक अजब तरीके से

उसकी हंसी में कोई ज़माना है जहाँ वह लाचार है

जिसे मार दिया गया है वह मरने के बाद बेचैनी से अपना चश्मा ढूँढ़ रहा है
उसे वे चेहरे ठीक से नहीं दिखे थे मरने के पहले
जो उसकी हत्या में शामिल थे
कुछ किताबें वह मरने के बाद भी पढ़ना चाहता है
जो मरने के ठीक पहले मुश्किल से ख़रीदी गईं थीं तमाम कटौतियों के बाद

वह मरने के पहले कोई सट्टा लगा आया था
अब वह जीत गया है
लेकिन वह जीत उधर है जिधर जीवन है जिसे वह खो चुका है

एक सटोरिया हंस रहा है
बहुत से सटोरिये हंस रहे हैं
उन्हीं की हुकूमत है वहाँ, जहाँ वह मरने से पहले रहता था

अरे भई, मैं मर चुका हूँ
तुम लोग बेकार मेहनत कर रहे हो
कोई दूसरा काम खोज़ लो
हत्या के पेशे में नहीं है इन दिनों कोई बेरोज़गारी

एक बात जो वह मरने से पहले पूछना चाहता था कवियों से
वह बात बहुत मामूली जैसी थी
जैसे यही कि तुम लोग भई जो कविताएँ आपस में लिखते हो
तो वे कविताएँ ही किया करते हो

या कुछ और उपक्रम करते हो

इस कदर हिंसा तो कवि में पाई नहीं जाती अक्सर ऐसा पुराने इतिहास में लिखा गया है
अपने मरने के पहले वह उस इतिहास को भी पढ़ आया था
जिस इतिहास को भी पिछले कुछ सालों में बड़े सलीके से
नई तकनीक से मारा गया

जहाँ वह दफ़्न है या जहाँ बिखरी है उसकी राख़
वहाँ हवा चलती है तो सुनाई देती है उस हुतात्मा की बारीक़ धूल जैसी महीन आवाज़

वह लगातार पूछता रहता है
क्यों भई ! कोई शै अब ज़िन्दा भी बची है ज़माने में ?

मैं राख़ हूँ फ़कत राख़
मत फ़ूँको
आँख तुम्हारी ही जलेगी।


तकरीबन सत्तर साल हो गए होंगे / उदय प्रकाश

अब से तकरीबन सत्तर साल हो गए होंगे
जब कहा जाता है कि गाँधी जी ने अपने अनुयायियों से कहीं कहा था
सोचो अपने समाज के आख़िरी आदमी के बारे में
करो जो उसके लिए तुम कर सकते हो
उसका चेहरा हर तुम्हारे कर्म में टँगा होना चाहिए तुम्हारी
आँख के सामने

अगर भविष्य की कोई सत्ता कभी यातना दे उस आख़िरी आदमी को
तो तुम भी वही करना जो मैंने किया है अँग्रेज़ों के साथ

आज हम सिर्फ़ अनुमान ही लगा सकते हैं कि
यह बात कहाँ कही गई होगी
किसी प्रार्थना सभा में या किसी राजनीतिक दल की किसी मीटिंग में
या पदयात्रा के दौरान थक कर किसी जगह पर बैठते हुए या
अपने अख़बार में लिखते हुए
लेकिन आज जब अभिलेखों को संरक्षित रखने की तकनीक इतनी विकसित है
हम आसानी से पा सकते हैं उसका सन्दर्भ
उसकी तारीख़ और जगह के साथ

बाद में, उन्नीस सौ अड़तालीस की घटना का ब्यौरा
हम सबको पता है

सबसे पहले मारा गया गाँधी को
और फिर शुरू हुआ लगातार मारने का सिलसिला

अभी तक हर रोज़ चल रही हैं सुनियोजित गोलियाँ
हर पल जारी हैं दुरभिसन्धियाँ

सत्तर साल तक समाज के आख़िरी आदमी की सारी हत्याओं का आँकड़ा कौन छुपा रहा है ?
कौन है जो कविता में रोक रहा है उसका वृत्तान्त ?

समकालीन संस्कृति में कहाँ छुपा है अपराधियों का वह एजेण्ट?




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