कोरोना लॉकडॉउन के दौरान एक गाय का भारतीय नागरिकों के नाम खुला पत्र

प्रिय भारतीय जनता,

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मैंने सुना है कि सरकार हमसे बेहद प्यार करती है। वह यह नहीं चाहती है कि गायों का क़त्ल किया जाए, इसलिए उन्होंने बूचड़खाने बंद करवा दिए।

लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार को लोगों का क़त्ल करना अच्छा लगता है। इसलिए उन्होंने कई लोगों को मार डाला – उन्हें गौ-हत्यारे का नाम देकर, जिसमें से ज्यादातर झूठे इलज़ाम थे

खैर हम गायें ये सब हत्या-वत्या नहीं समझते हैं। हालांकि हम भी पेड़ पौधे खाते हैं। पौधों में भी जीवन है।

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शायद गायें सरकार की तरह बुद्धिमान नहीं हैं। पर हम उनके जैसे भुलक्कड़ भी नहीं हैं।

हमें यकीन हो गया है कि सरकार अक्सर खुदकी बातो का ही विरोध करती रहती है।

जैसे देखिये सरकार कहती है कि वह हम से उतना ही प्रेम करती है जितना विष्णु इंद्र वरुण आदि देवताओं से, लेकिन गायों की याददाश्त सरकार से बेहतर है। हमें अच्छी तरह से याद है कि वेदों के समय से, ये सभी देवता हमें काफ़ी प्रेम के साथ भोजन रूप में ग्रहण करते आए हैं। पूषन देव यानी कि सूर्य देव को छोड़कर।

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मुझे लगता है, शायद इस सरकार को वास्तव में नहीं पता कि वेदों में क्या लिखा हैं। या हो सकता है उन्हें पता हो। शायद यही कारण है कि सरकार को समंदर पार के देवताओं के लिए बीफ एक्सपोर्ट कारोबार से कोई ऐतराज़ नहीं हैं न ही उस कारोबार से मुनाफा कमाने में

शायद सरकार पैसे को गायों से ज्यादा प्यार करती है!

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जो भी हो इस बीच सरकार ने अपने कुछ नागरिकों को मार कर या डरा कर हम गायों के लिए अपना प्यार जताया।

समस्या यह पैदा हो गई कि इनमें से कई मनुष्य हमें खिलाते पिलाते थे। चलो ठीक है, हमें मारना तो बंद कर दिया। लेकिन उन्हें डरके मारे हमें खिलाना भी बंद करना पड़ा। सरकार भी हमें नहीं खिलाती।

कुछ समय के लिए, हमने गरीब लोगों के खेतों से फसलें खाईं। लोगों को यह पसंद नहीं आया। लेकिन शायद सरकार को यह अच्छा लग रहा था

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इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार गरीब लोगों को पसंद नहीं करती है, ज़ाहिर है।

पर शायद सरकार हम गायोंको गरीब लोगोंसे ज्यादा प्यार करती है!

जो भी हो इस बीच इसने लॉकडाउन लागू करके गरीब लोगों से अपना प्यार जताया

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इस बात पर और एकबार हम्बा और सलाम!

तो दोस्तों मैंने सुना है कि सरकार गरीब लोगों से बेहद प्यार करती है। सरकार यह नहीं चाहती है कि गरीब लोग मारे जाएंइसलिए उन्होंने सभी व्यवसाय पूरी तरह से बंद कर दिए।

यह गरीबों को बचाने के लिए इतनी उत्सुक है कि कोई गरीब अगर उनके जान बचाने वाले सलाह को न माने तो यह उनका क़त्ल करने के लिए भी तैयार है

क्योंकि याद है ना?

सरकार अक्सर अपनी बातों का ही विरोध करती रहती है।

उस दिन मैंने काग़ज़ का एक टुकड़ा खाया, जिसमें लिखा था कि, अब तक लॉकडाउन में भुखमरी, थकावट, घबराहट, आत्महत्या, लिंचिंग और पुलिस द्वारा पिटाई के जरिये 300 से अधिक गरीब मारे गए हैं

इस वक्त मेरे जैसे लाखों पवित्र और अपवित्र पशु भूख से मर रहे हैं। हमें खिलाने वाले भी भूखे मर रहे हैं।

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उल्टा वह सुप्रीम कोर्ट में यह बताने में लगी थी कि गरीब मजदूरों को घर लौटने की ज़रूरत ही नहीं हैं। वह लॉकडाउन में जहाँ भी फसें हैं उनको काम पर लगा दिया जाये। क्योंकि उनको प्यार करनेवाली सरकार उनकी भलाई उनसे बेहतर समझती है ना!

फ़िर मज़दूर जब मरते मरते हद होकर मिलके आवाज़ उठाये : “हमें घर जाना हैं!” तब जाके सरकार को कुछ करना पड़ा!

दोस्तों, मैं तो सोचरही हूंये सरकार हमें प्यार न करे बस, इसी में हमारी भलाई हैं।

यदि सरकार कहती है कि, यह आप से प्यार करती है और यह आपके कल्याण के बारे में सोच रही है, आप तुरंत अपने पेट और जान के बारे में सोचना शुरू कर दीजिये।

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सरकार की तरह भुलक्कड़ न बनें। याद रखें, अगर यह आपको बताती है कि हमें खाना नहीं चाहिए, यह वास्तव में आपको कोविद-19 लॉकडाउन नाम पर टुकड़े टुकड़े करके खा रही है।

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आपकी सुखदुख की साथी,

भारतीय गाय

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