कॉमरेड मुकुल सिन्हा : मज़दूर आन्दोलन में नए प्रयोग के हस्ताक्षर

पुण्यतिथि 12 मई पर याद करते हुए

बर्तानवी गुलामी से आज़ादी के बाद भटकते मज़दूर आन्दोलन में कई अभिनव प्रयोग हुए, जिसने मज़दूर संघर्षों को नयी ऊर्जा, नयी गति दी। इनमे शंकर गुहा नियोगी, एके राय, दत्ता सामंत जैसे कई प्रयोगधर्मी शामिल हैं। इसी क्रम में एक प्रमुख नाम है कॉमरेड मुकुल सिन्हा का, जिनके प्रयासों से गुजरात का मज़दूर आन्दोलन एक छलांग लेकर नयी मंज़िल पर पहुँचा था।

एक सक्रिय ट्रेड यूनियन नेता के परिवार में 10 फ़रवरी 1951 को जन्में कामरेड मुकुल सिन्हा एक जुझारू ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, वकील और मज़दूरों व पीड़ितों के लिए अनथक योद्धा थे। उनका देहांत 63 वर्ष की आयु में, 12 मई, 2014 को हुआ था। वे एक साल से कैंसर से पीड़ित थे।

आइआइटी कानपुर से अध्ययन के बाद कॉमरेड मुकुल सिन्हा ने अहमदाबाद के फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (पी.आर.एल.) में प्लाज्मा विज्ञान में अपनी पी.एच.डी. हासिल की। मज़दूर संघर्षों के दौरान ही उन्होंने वकालत का अध्ययन किया और 1988 में वकील बने । उन्होंने ज़मीनी और क़ानूनी लड़ाई को एक साथ आगे बढाया और मज़दूर आन्दोलन का एक मॉडल विकसित किया।

मज़दूर आन्दोलन के नायक के रूप में

गुजरात में महत्वपूर्ण संघर्ष की शुरुआत 70 के दशक के अंत में कुछ घटनाओं के साथ हुई। एक तरफ फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री (पीआरएल) में एक डायरेक्टर द्वारा एक चतुर्थ श्रेणी श्रमिक को लात मारने से आंदोलन भड़क उठा। 1979-80 में वहाँ लॉकआउट घोषित हो गया। दूसरी तरफ नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) में महज 5 रुपये मज़दूरी के खिलाफ एक संघर्ष की शुरुआत हुई।

जहाँ पीआरएल में संघर्षों की अगुआई मुकुल सिन्हा ने की थी, वहीं एनडीडीबी में कॉमरेड नरेंद्र एन पटेल ने नेतृत्व दिया था। 1981 में मुकुल सिन्हा बर्खास्त हुए और दूसरी तरफ नरेंद्र पटेल निलंबित हुए। दोनो धराएं एक साथ हुईं और उसने संयुक्त संघर्ष को आगे बढ़ाया।

फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी ने कॉमरेड मुकुल समेत 133 लोगों की छंटनी कर दी। वे पहले ही कर्मचारियों को संगठित कर रहे थे। नए संघर्ष से फेडरेशन ऑफ़ एम्प्लाइज ऑफ़ ऑटोनोमस रिसर्च एंड डेवलपमेंट, एजुकेशन एंड टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स का गठन हुआ। उन्होंने झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वालों के हकों के लिए जन संघर्ष मोर्चा का गठन भी किया। यह संघर्ष मुकुल ने फिजिकल साइंस लेबोरटरी की अपनी सहकर्मी निर्झरी के साथ किया जो उनकी जीवन संगिनी बनीं।

लगातार आगे बढ़ता संघर्ष

उन्होंने गुजरात के औद्योगिक मजदूरों और अहमदाबाद के नगर-निगम मजदूरों के अधिकारों के लिए कई संघर्ष किये। हजारों झुग्गी वासियों की पुनर्स्थापना में जे.एस.एम. ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अहमदाबाद के अनेक शैक्षणिक तथा पेशेवर संस्थानों- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्सटाइल एसोसियेशन्स और बी.एम. इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ के ट्रेड यूनियनों को भी उन्होंने नेतृत्व और मार्गदर्शन दिया।

संघर्षों के क्रम में 1983 में हॉस्पिटल बिल आया, जिसके खिलाफ ज्वाइंट एक्शन काउंसिल बनी। 1984 में फेडरेशन ऑफ एम्पलाइज ऑफ रिसर्च, ट्रेनी, एजुकेशन एण्ड एलॉएड इंस्टीट्यूशन बना। 1980 में गुजरात महासभा और 1990 में गुजरात फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस अस्तित्व में आया।

1995 में टैक्सटाइल्स मिलों की बंदी और वीआरएस के खिलाफ जेसीसी के नेतृत्व में संघर्ष आगे बढ़ा। जन संघर्ष मंच, गुजरात मजदूर सभा, गुजरात फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस (जीएफटीयू) गुजरात दंगों के खिलाफ सक्रिय रहा, तो मज़दूर आंदोलनों को भी गति दी।

1998 में लूबी इलेक्ट्रिकल्स आंदोलन आगे बढ़ा। न्यूनतम वेतन के इस संघर्ष में राज्य की भाजपा सरकार की पुलिसिया दमन में एक राहगीर की मौत हुई और 20 मज़दूर घायल हुए। यह गुजरात मॉडल के खून से सने इतिहास का गवाह बना। खतरनाक पोटो कानून के खिलाफ संघर्ष चला। गुजरात दंगे की भयावह स्थिति में 1 मई 2002 को मई दिवस को पूरे हौसले के साथ मजदूरों ने मनाया और पूरे गुजरात में उस दिन रैली निकली। गुजरात में मजदूर अधिकारों पर हमलों और दमन के बीच संघर्ष लगातार आगे बढ़ता रहा है।

‘विकास परियोजनाओं’ के लिए विस्थापित किये जा रहे 2001 के गुजरात भूकंप पर मुकुल सिन्हा ने गुजरात के उच्च न्यायालय में एक वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट पेश की जिसके बल पर अदालत को आदेश देना पड़ा कि भूकंपग्रस्त इलाकों में लोगों को सही रूप से राहत दी जाये और भूकंप के बाद बनाई जाने वाली इमारतों में भूकंप-रोधी डिजाइनों को शामिल किया जाये।

नरेंद्र मोदी की प्रिय साबरमती रिवर फ्रंट योजना की चलते विस्थापित होने वाले गरीबों का मसला भी उन्होंने उठाया और उसके लिए अदालती लड़ाई लड़ी।

गुजरात दंगों में पीड़ितों के नायक बने

2002 में गुजरात दंगा और मुसलमानों के जनसंहार के बाद, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक कत्लेआम का पर्दाफाश करने तथा जनसंहार के पीड़ितों को इंसाफ, राहत और पुनर्वास दिलाने के लिए, मुकुल सिन्हा ने सक्रियता से संघर्ष किया। उन्होंने इशरत जहां और अन्य व्यक्तियों के तथाकथित “मुठभेड़ में मौत”का मामला उठाया और यह साबित किया कि ये सोच-समझकर किये गये सुनियोजित हत्याएं थीं।

मुकुल सिन्हा ने 2002 के गोधरा दंगों में राज्य स्तरीय अधिकारियों की भूमिका को उजागर करने वाले नानावती आयोग के सामने महत्वपूर्ण गवाहों के साथ जिरह की थी। मणिपुर में “मुठभेड़” में नौजवानों का कत्ल करने वाले फौजियों और अर्ध-सैनिक बलों की पुनः जांच में उन्होंने खास भूमिका निभायी और साबित किया कि वे फर्ज़ी मुठभेड़ थे।

गुजरात दंगा पीड़ितों के वकील मुकुल ...

2004 में उन्होंने अपने कामरेडों के साथ न्यू सोशलिस्ट मुवमेंट (एन.एस.एम.) की स्थापना की। ‘न्यू सोशलिस्ट मूवमेंट’ गुजरात की एक राजनीतिक पार्टी है। 2002 के गुजरात दंगों के बाद जनसंघर्ष मंच और गुजरात ट्रेड यूनियन फेडरेशन के नेतृत्व तले इसका गठन किया गया था। पार्टी को साल 2007 में भारतीय चुनाव आयोग की ओर से पंजीकृत कर लिया गया था।

संघर्ष, जो बीमारी में भी जारी रहा

2014 के चुनाव के संदर्भ में मुकुल ने ट्रुथ ऑफ़ गुजरात नाम से एक वेबसाइट आरंभ की जिसमें गुजरात को लेकर मोदी सरकार और जन संचार माध्यमों की ओर से फैलाए जा रहे मिथ को तोड़ने के लिए तथ्य जमा किए गए हैं। उनकी बीमारी की हालत में उसके उनके बेटे प्रतीक चला रहे थे।

कॉमरेड मुकुल सिन्हा ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ़ इण्डिया (टीयुसीआई) के अध्यक्ष बने थे, जिसमे गुजरात फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस शामिल हुई। बीमारी के दौर में भी उनकी सक्रियता बनी रही। उनके निधन के बाद कॉमरेड अमरीश पटेल उनकी जगह नेतृत्व दे रहे हैं।

Mukul Sinha, who fought for 2002 riot victims, succumbs to cancer ...

कॉमरेड अमरीश पटेल ने आज उन्हें याद करते हुए लिखा-

मैं अपने चाचू को नहीं भूलना चाहता क्योंकि वह लाखों लोगों को सभी प्रकार के शोषण से मुक्त समाज बनाने के लिए एक प्रेरणा श्रोत थे… मुकुल सिन्हा नाम को कभी नहीं भुलाया जा सकता है वह कभी भी मर नहीं सकता…. जब तक हम में से, लाखों लोग, जिनके जीवन पर उसका प्रभाव था, उसे याद रखें, उनके जीने के तरीके को याद रखें, उनके आदर्शों को याद रखें और उन्हें दिल से आत्मसात करें…. वह आग का गोला थे, जो सभी के दिलों के भीतर एक ज्वाला पैदा कर सकते थे और उन्हें शोषण के खिलाफ संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ने की ताकत देते थे…

उनका संघर्षमय जीवन हमारे भीतर एक प्रेरणा के रूप में कार्य करता है।

कॉमरेड मुकुल सिन्हा को श्रद्धांजलि!

एक भौतिकविज्ञानी एक ट्रेड यूनियन कर्मी, एक मज़दूर नेता, एक वकील, उत्पीडित जनता के नायक, दंगों की भयावहता के बीच न्याय के लिए सतत लड़ने वाला बन गया और फिर भी अपने विज्ञान की शिक्षा को वे हथियार बनाए रखा हैं। अहमदाबाद में अपना कार्यालय दंगाइयों द्वारा जलादेने के बावजूद उनका मनोबल नहीं टूटा और अंत तक वे हक़ के संघर्ष में सक्रिय रहने वाले कॉमरेड बने रहे।

जीवन से जूझना और खुद को बदलते रहना ताकि आप खुद उस बदल सकें, इसी को लेकर कॉमरेड मुकुल की पूरी ज़िंदगी गुजरी।

उनकी पूर्णतिथि पर ‘मेहनतकश’ की ओर से लाल सलाम!

भूली-बिसरी ख़बरे