1857 : सांप्रदायिक एकता और अन्याय के ख़िलाफ़ बग़ावत का प्रतीक दिवस

10 मई : देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 को याद करते हुए

आज़ादी के इतिहास में “साझी शहादत-साझी विरासत” की अमिट निशानी- 1857 के महा-संग्राम की 163 वीं सालगिरह है। 10 मई 1857 को देश में बरतानवी गुलामी के खिलाफ संगठित तौर पर बड़े मुक्ति संग्राम की शुरूआत हुई थी। इस संग्राम में मौलवी, पंडित, ग्रंथी, ज़मींदार, किसान, व्यापारी, वकील, नौकर, महिलाएं, छात्र और सभी जाति-धर्मों के लोग शामिल हुए और कुर्बानियां दीं।

अंतिम प्रतिरोध युद्ध, पहला स्वतंत्रता संग्राम

यह महासंग्राम देश के राजे-रजवाड़ों का पूरे पराक्रम से लड़ा गया आख़िरी युद्ध था, इसलिए उनका यह अंतिम प्रतिरोध युद्ध था। इसी के साथ देश की आम मेहनतकश जनता द्वारा इस क्रांति में जो संग्रामी पहल दिखी, उसने जो मशाल जलाई, वहा आगे बढ़ती गई, 90 साल में उसने अंग्रेजी शासन का सूर्यास्त किया और आज भी वह मुक्ति संग्राम जारी है। इसलिए यह देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम भी है।

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प्रतिरोध संघर्ष पहले से जारी था

कंपनी राज के दमनकारी और अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ प्लासी युद्ध के बाद से ही असंतोष भड़कने लगा था। 1857 के संग्राम से पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में कई विद्रोह हो चुके थे। जिनमे 19वीं सदी के मध्य में कई किसान आंदोलन भी हुए। कई असंतोष छोटे-मोटे किसान विद्रोह के रूप में सामने आए। सरकारी आंकड़ों में 1770 से लेकर 1857 तक पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ 235 बगावतें दर्ज हैं। 

18वीं सदी के पहले 5 दशकों में कई जनजातियों की स्थानीय क्रांतियां भी हुईं, जिनमें मध्य प्रदेश में भीलों का, बिहार में संथालों और ओडिशा में गोंड्स एवं खोंड्स जनजातियों के आंदोलन अहम थे।

18वीं सदी के अंत में उत्तरी बंगाल में संन्यासी आंदोलन और बिहार एवं बंगाल में चुनार आंदोलन प्रमुख हैं। 1770 में बंगाल के संन्यासी आन्दोलन को दबाने में अंग्रेजों को तीस बरस लग गये। इसमें 150 संन्यासियों को अंग्रेजों की सेना गोली मार दी थी।

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31 मई को बजना था बिगुल

31 मई 1857 को एक साथ एक समय देशव्यापी स्तर पर क्रांति का बिगुल बजाना था। इसकी योजना का निर्माण और समय का निर्धारण पहले ही कर लिया गया था। इस क्रांति की तैयारियां 1856 की गर्मियों से ही होनी शुरू हो गयीं थीं। एकता व सन्देश प्रसारण के लिए योजना के तहत देशभर में एक गांव से दूसरे गांव को फूल और रोटियां भेजने का क्रम शरू हुआ था।

1857 की इस क्रांति की संरचना में नाना साहब के प्रधान सलाहकार अजीमुल्ला खाँ की प्रमुख भूमिका थी। उन्होंने विदेश दौरा करके परिस्थिति के अनुरूप रणनीति बनाने में मदद की और 31 मई रविवार का दिन विशेष मक़सद से चुना था।

इस विद्रोह का प्रयाण गीता,”हम हैं इसके मालिक हिंदोस्तां हमारा” अज़ीमुल्ला खां ने लिखा था…

यूँ शुरू हुआ महासंग्राम

10 मई 1857 को हिंदुस्तानी सिपाहियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया। कुछ मेरठ की, कुछ बाह्य परिस्थितियों तथा मंगल पाण्डेय की बग़ावत की तात्कालिक घटना ने पूर्व निर्धारित तिथि से पहले इस विद्रोह का श्रीगणेश कर दिया।

विद्रोही सैनिक मेरठ से दिल्ली की ओर कूच कर गए। 11 मई, 1857 को इस क्रांतिकारी सेना ने बहादुर शाह ज़फ़र को भारत का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। दिल्ली पर भारतीय सिपाही मुगलिया सल्तनत के अंतिम सम्राट बहादुरशाह जफर को ‘शंहशाहे हिन्दोस्तान’ घोषित कर उनकी अगुवाई में ‘आजाद हिंदुस्तान’ का झंडा फहरा दिया। इस प्रकार बहादुरशाह जफर राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गए।

क्रान्ति की यह ज्वाला धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों से होती हुई पूरे देश में फैल गई और इसने जनक्रांति का रूप ले लिया।

नतीजा यह हुआ कि समय से पूर्व किया गया यह विस्फोट जो बाद मे सशस़्त्र क्रांति-जनक्रांति में तब्दील हो गया, स्थायी शक्ल नहीं ले पाया। लेकिन इस जनक्रांति ने महारानी विक्टोरिया की ब्रिटिश हुकूमत के पायों को हिलाकर रख दिया।

ना धर्म, ना जाति, सबका एक मक़सद

1857 के संग्राम से संबंधित समकालीन दस्तावेज़ देश के चप्पे-चप्पे पर घटी ऐसी दास्तानों से भरे पड़े हैं, जहां मुसलमान, हिंदू और सिख इस बात की परवाह किए बिना, एक होकर लड़े और 1857 की जंगे-आज़ादी मे एक साथ प्राणों की आहुति दी।

पूरे देश में अग्रेजों के खिलाफ हर वर्ग, हर जाति व मज़हब के लोग उतर आए। राजाओं-सामंतों-नवाबों के साथ सैनिक, किसान, मज़दूर, दलित, महिला सभी वर्ग के लोग लड़े थे। मुख्यतः हिंदुस्तान के उत्तर एवं उत्तर पश्चिम के सम्पूर्ण भूभाग की जनता द्वारा विद्रोह का बिगुल फूंका गया था।

1857 की जनक्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसने सबसे पहले देशज तबकों को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एकता के सूत्र में बांधने का काम किया। इसमें बड़े पैमाने पर क़ौमी एकता कायम करने में कामयाबी मिली थी। इस समय लोग धर्म, जाति,, संप्रदाय तथा वर्गभेद को भुलाकर अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ एकजुट होकर खडे थे। यह काल वास्तव में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के उद्भव और विकास का काल था।

इतिहासकार के एम पणिक्कर लिखाते हैं कि “सिपाहियों के विद्रोह ने ग्रामीणों को कुछ हद तक सरकारी भय से मुक्ति दिलायी और संगठित विद्रोह सड़क पर आ गया। सरकारी इमारतें फूक दी गईं, खजाना सरेआम लूटा गया, बैरकों को तोड़ा गया, हथियार लूटे गए और जेलों के फाटक खोल दिए गए। ग्रामीणों के बीच जनता में, समाज के हर तबके पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का डंका बजाने वाले नेताओं का बड़े पैमाने पर गहरा असर पड़ा। किसान-दस्तकार-धर्मगुरू-नौकरीपेशा-दुकानदार हर कोई इसमें शामिल हो गया। नतीजा यह हुआ कि शुरूआत में सिपाहियों द्वारा किये गए विद्रोह ने कुछ समय बाद आम जनता के विद्रोह की शक्ल अख्तियार कर ली।”

भयावह दमन के बावजूद अमिट छाप

बहादुरशाह जफर को 20 सितम्बर 1857 को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके सामने उनके पांचों शहजादों के सर कलम करके लाए गए। लेकिन जफर ने उसके बाद भी अंग्रेजों के आगे झुकना मंजूर नहीं किया। जफर की गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने भीषण दमन चक्र चलाया। लेकिन उसके बाद भी मुक्ति संग्राम को दबाया नहीं जा सका।

संग्राम जगदीशपुर, बिहार के कुंवर सिंह, बरेली के सिपाही बख्त खान, खान बहादुर खान, फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला, लखनऊ की बेगम हजरत महल, बिठूर के नाना साहब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, रानी अवंती बाई, झलकारी बाई से लेकर गंगू मेहतर तक की जीवटता से लगातार दो वर्षों तक जारी रहा।

17 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई कालपी के पास अंग्रेजों से लडते-लड़ते वीरगति को प्रात हुई।

कानपुर व बिठूर में नाना साहब ने अंग्रेजों के बराबर छक्के छुड़ाए लेकिन वह अंततः हार गए। हार के बावजूद नाना ने समर्पण करने से साफ इंकार कर दिया। युद्ध जारी रखने की उम्मीद के साथ 1859 में गुप्त रास्ते से नेपाल चले गए। नाना साहब के बहादुर सेनापति तात्या टोपे ने अंग्रेजों के खिलाफ अप्रैल 1859 तक गुरिल्ला युद्ध जारी रखा लेकिन एक गद्दार जमींदार ने धोखे से उन्हें मरवा दिया।

80 साल की उम्र में बिहार के जगदीशपुर के कुंवर सिंह अदम्य सहस, क्षमता, देशभक्ति, जोश और रणसंचालन की मिसाल कायम की थी। छापामार युद्ध लड़ते हुए जब वे वीर गति को प्राप्त हुए तो उनके भाई अमर सिंह ने मोर्चा संभाला।

इस मुक्ति संग्राम की विशालता का परिचय इसी से मिलता है कि अकेले अवध में डेढ़ लाख और बिहार में एक लाख लोग देश की खातिर शहीद हो गए।

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गद्दारियों के बीच पराजय में भी जीत की अनुगूंज

2 वर्ष से ज्यादा समय तक चले इस महा संग्राम में हिन्दुस्तानी जनता को पराजय ज़रूर मिली, लेकिन इसने अंग्रेजों की चूलें हिला दीं। कम्पनी राज की जगह ब्रिटिस महारानी के हाथों में सीधे सत्ता आ गई।

1859 के अंत में अंग्रेजों ने हालांकि इस मुक्ति संग्राम को कुचल दिया और देश में बर्बर दमन चक्र बरपा कर दिया था, लेकिन क्रांति की चिंगारी बुझी नहीं, वह निरंतर सुलगती रही। इस पहले स्वतंत्रता संग्राम की हजारों-लाखों कुर्बानियों ने आजादी का मार्ग प्रशस्त किया।

यह भी गौरतलब है कि इस संग्राम में जहाँ हिन्दुस्तानी जंगबाज पुरानी ज़मीन पर पुराने हथियारों से लड़ रहे थे, वहीँ अंग्रेज हुक्मरानों के पास आधुनिक अस्त्र-शास्त्र थे। भारतियों में एक सर्व स्वीकृत नेतृत्व व संगठित ताक़त की कमी थी, ऊपर से निर्धारित तारीख़ से 3 सप्ताह पहले शुरू होने से एक साथ युद्ध की तैयारी भी कमज़ोर हो गई थी।

दूसरी ओर सिंधिया, भोसले, गायकवाड से लेकर नीचे तक पर्याप्त गद्दरियों ने भी क्षति पहुँचाई थी। फिर भी बेमिसाल जज्बे और क़ुर्बानियों के कारण यह इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है।

जन-एकजुटता की मिसाल

आज जब पूरा मुल्क भयावह जातीय, धार्मिक, वर्गीय व सांप्रदायिक फसाद में उलझा हुआ है और देश कई ईस्ट इण्डिया कंपनियों की गुलामी में क़ैद है, तब बहादुरी, जाम्बाज़ी और हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक 1857 का यह पहला स्वतंत्रता संग्राम एक नयी मशाल बनाकर खड़ा है।

यह गौरतलब है कि दिल्ली से अंग्रेजों को भगाने के बाद राज चलाने के लिए एक साझी, सेक्युलर, मेहनतकश लोगों की परिषद बनाई गयी थी। इसमें धर्म-मज़हब से ऊपर उठाकर हिन्दू मुसलमानों, सिपाहियों और किसानों का भी बराबरी का प्रतिनिधित्व रखा गया था। यही काउंसिल थी जो सारे फ़ैसले लेती थी और बहादुर शाह ज़फ़र से उन्हीं पर अपनी सील मोहर लगाने के लिए कहती थी।

कार्ल मार्क्स ने बताया था भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम

जब 1857 की जंग जारी थी, उसी वक़्त लंदन से अमेरिकी अख़बारों के लिए लिखे लेखों में कार्ल मार्क्स ने इसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया था। जुलाई 1857 और अक्टूबर 1858 के बीच कार्ल मार्क्स ने ‘न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून’ को भेजे अपने 37 और इस बगावत को कुचल दिये जाने के बाद के 5 लेख में इस महासमर का शानदार विवरण और मूल्यांकन प्रस्तुत किया था।  

मार्क्स ने 31 जुलाई 1857 के अपने लेख में कहा कि “सरकारी प्रवक्ता इसे अराजकता वाला ग़दर ग़लत कहते हैं, यह सिपहिओं का ग़दर नहीं है, सच यह है कि यह एक राष्ट्रिय क्रांति, नेशनल रिवोल्ट है।”

संग्राम शुरू होने के एक महीने बाद जून 1857 मे अपने लेख मे मार्क्स की टिप्पणी थी कि “सिपाहियों के जरिए अंग्रेजों की भारतीय सेना ही क्रांति का जरिया बनने जा रही है।“  इसमें उन्होंने किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका का भी उल्लेख किया है।

30 जून 1857 की अपनी टिप्पणी मे मार्क्स कहते हैं कि “इस बग़ावत की ख़ास बात यह है कि इसने हिन्दू और मुसलमानों के बीच के वैमनस्य को ख़त्म कर दूरी को पात दिया है।“

क्रांति को कुचल दिये जाने के बाद वे लिखते हैं “क्रांति भले विफल हो गई है, भारत को अब ज्यादा दिन गुलाम बनाना असंभव काम है।”

1857 के महा-संग्राम की 163 वीं सालगिरह पर 10 मई, 2020 को प्रकाशित

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