सोशल डिस्टेंसिंग क्यों ?


( ‘संघर्षरत मेहनतकश’ अंक-43 के सम्पादकीय से . . . )

चीन से शुरू हुई कोविड-19 की विश्वव्यापी महामारी पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले चुकी है। वैश्विक पूँजी का चौधरी महाबली अमेरिका आज इस संकट के सामने बौना साबित हो चुका है। अभी तक इससे निजात पाने की कोई दवा विकसित नहीं हो सकी है। तमाम वैश्विक कंपनियां विशेष रुप से दवा उद्योग की कंपनियां अपनी गिद्ध निगाहें लगाए बैठी हैं। वैश्विक चौधरियों में इससे छुटकारे के बहाने मुनाफे की होड़ लगी हुई है। किस गिद्ध को मानव मांस का टुकड़ा कितना मुनाफा देगा, यह खेल जारी है।

बहरहाल, इस संकट से निपटने के लिए लॉकडाउन के साथ सोशल डिस्टेंसिग का फार्मूला आजमाया गया। सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी। सामाजिक दूरी बनाने का यह शब्द जितने व्यापक रूप से फैला है, उतना ही व्यापक इसका अर्थ भी है।

वायरस फैलने का संकट दो व्यक्तियों की नजदीकी मुलाकात से जुड़ा हुआ है। यह बात तो समझ में आती है की दो व्यक्तियों के बीच शारीरिक दूरी होनी चाहिए। वायरस के चेन को तोड़ने के लिए यह जरूरी है। अभी तो मानवता इस संकट से जहाँ जूझ रही है, वहाँ पर सामाजिकता ही इससे निपटने का सबसे बड़ा हथियार बना है।

यह सामाजिकता ही है जिसने अचानक बगैर तैयारी लॉकडाउन की घोषणा के बाद अफरा-तफरी के बीच पूरे देश भर में फंसे प्रवासी मज़दूरों के संकट के समय खड़ा होने का ज़ज्बा दिया। आज मज़दूर-मेहनतकश आबादी जिस भयावह संकट को झेल रही है, वह कोरोना महामारी से भी बड़ा संकट है- भुखमरी का संकट। इससे निपटने में सरकारें नकारा साबित हुईं। ऐसे में हाथ बटाने का काम सामाजिक संस्थाएं ही कर रही हैं।

दरअसल पूँजीवाद के आने के साथ सारे मानवीय व काव्यात्मक सम्बन्ध आने-पाई के ठण्डे समुद्र में डूबो दिये गये। पूँजीवाद ने मानवीय अलगाव को पैदा किया और बढ़ाया। यह गौरतलब है कि मौजूदा उत्पादन की प्रणाली सामूहिक उत्पादन के तरीके पर टिकी हुई है। लेकिन पूँजीवाद मेहनतकश की समूहिक एकता का विरोधी है। वह नहीं चाहता है कि किसी प्रकार की ऐसी सामाजिकता, ऐसा भाईचारा बने, लोग एक दूसरे से एकता बनाएं, एक दूसरे के साथ आगे बढ़ें। वह परिवारों को तोड़ता है, इंसान-इंसान में भेद पैदा करता है; जाति के, धर्म के, मज़हब के, नस्ल के नाम पर बाँटता है।

ऐसे में यह एक सोची-समझी रणनीति लगती है। इस मानवीय संकट के बहाने पूँजी के बादशाह सामाजिक दूरी बनाने का शब्द लोगों के दिमाग में इस कदर बैठा देना चाहते हैं कि जनता इस शब्द के अलावा कुछ और ना सोच सके। साफ दिख रहा है कि लोगों में एक-दूसरे के प्रति एक संदेह, एक भय का माहौल बना है। इसके बावजूद सामाजिक संस्थाएं आगे बढ़कर मानवता की सेवा में पूरी तरीके से तल्लीन हैं। यह सोशल डिस्टेंसिंग का नहीं, सामाजिक दूरी का नहीं, सामाजिक नजदीकी का सवाल है। लेकिन शब्द निकला सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी! यह शब्द ही मानव द्रोही है।

इस संकट से निपटने के लिए जो आवश्यक है- शारीरिक दूरी यानी फिजिकल डिस्टेंसिंग, उसको बढ़ाने पर जोर देना चाहिए! हमें सामाजिक रूप से एकता बनानी है क्योंकि सामाजिकता के बगैर कुछ नहीं है। यदि मनुष्य सामाजिक नहीं है तो पशु समान है- ऐसा बचपन से ही हम सुनते आए हैं। इसलिए सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी बनाने के खेल का विरोध किया जाना चाहिए। शारिरिक दूरी के साथ सामाजिक नजदीकी बेहद ज़रूरी है। आइए, इसका पालन करें!


(‘संघर्षरत मेहनतकश’ अंक-43 का सम्पादकीय)

इस अंक की अन्य महत्वपूर्ण सागग्री

आवरण कथा
-कोविड-19 : बेरोजगारी, भुखमरी विकराल; नस्ली भेद चरम पर
-मज़दूरों की क़यामत का नया दौर
-मज़दूरों का वेतन काटने की तैयारी
-काम के घंटे बढ़ाने का फरमान
-अध्यादेश से छिनेंगे श्रम क़ानून
-प्रवासी मज़दूरों के दर्द का विस्फोट


दमन
-बढ़ते दमन का एक ख़तरनाक दौर


विशेष
-कोरोना/लॉकडाउन के बीच मई दिवस


विशेष/साहित्य
-ऐसी अन्तेष्टि देखी नही


मज़दूरनामा
-मज़दूरों के गहराते संकट
-लॉकडाउन : डाइकिन मज़दूरों का भत्ता बंद
-कोरोना-कर्फ्यू आफ़त के खिलाफ प्रदर्शन


विश्व पटल
-अमेरिकी मज़दूरों ने की वेंटीलेटर बनाने की माँग
-फ्रांस : मज़दूरों ने मैकडोनाल्ड होटल को कब्जे में लेकर बनाया जन भोजनालय


सामयकी
-आरोग्य सेतु : निजता पर बढ़ता खतरा


प्रतिरोध ज्ञापन
-महिला प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्यवाई के खिलाफ


चित्र कथा
-मई दिवस : तब और अब
-प्रवासी मज़दूर


कविता
-कार्ल मार्क्स की 202वीं जयन्ती (5 मई) पर उनकी कविता ‘जीवद लक्ष्य’


साथ में अन्य विविध सामग्री

संघर्षरत मेहनतकश पत्रिका  

अप्रैल-जून, 2020

(संकटों के बीच इस द्वैमासिक पत्रिका का लगातार दूसरा अंक त्रैमासिक निकलना पड़ा।

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