1 मई : कोरोना/लॉकडाउन के बीच अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस

मई दिवस : फिर से करना होगा 8 घंटे काम का संघर्ष

मई दिवस ने 8 घंटे काम की माँग को बुलंद किया था, आज काम के घंटे 12 करने और 16 घंटे तक खटाने के लिए तैयारी पूरी हो चुकी है। संविधान को दरकिनार कर मज़दूर विरोधी श्रम संहिताओं को अध्यादेश से लाने की कोशिशें चल रही हैं। मज़दूरों के वेतन में तरह-तरह से कटौतियां बढ़ रही हैं। छँटनी का नया दौर गति पकड़ रहा है।

134 साल के चढ़ाव-उतार भरी एक लम्बी यात्रा से गुजरते हुए मई दिवस आज एक बेहद मुश्किल समय में उपस्थित है। मेहनतकश-मज़दूर वर्ग के सामने पहले से ही विकट समस्याओं के बीच तमाम ऐसे संकट आ खड़ा हुए हैं, जो भयावह तस्वीर उपस्थित करते हैं। भूख, बेकारी के बीच पलायन का दर्द उभरकर सड़कों पर आ गया है। यह मानवीय संकट का एक ऐसा दौर है, जहाँ आशंकाएं चौतरफा घर कर चुकी हैं। एक अनिश्चय का माहौल चारो तरफ व्यप्त है।

मई दिवस की क्रान्तिकारी विरासत

मई दिवस की परंपरा मज़दूर वर्ग के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। जब सूर्योदय से सूर्यास्त तक बेहद कठिन परिस्थितियों में खटने वाले मज़दूर एकजुट हुए और पहली बार उन्होंने इंसान होने का एहसास कराया, 8 घंटे काम की माँग को बुलंद किया और इसी को लेकर 1886 की 1 मई को मज़दूरों ने अपना दिन घोषित किया। 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन के हक़ को एक बड़े आंदोलन के रूप में उपस्थित किया।

दमन चौतरफा था, मज़दूरों को उससे लोहा लेना पड़ा। तमाम मज़दूरों को अपनी जान की कुर्बानियां देनी पड़ी। लेकिन मरते हुए मज़दूरों ने भी अपने जज्बे का प्रदर्शन किया, अपने खून से सने हुए कपड़े को लहरा कर लाल झंडा पैदा किया।

संघर्ष आगे बढ़ा। 4 मई को अमेरिका के शिकागो शहर के हे मार्केट में दमन का एक और भयावह रूप सामने आया और बेगुनाह 8 मज़दूर नेताओं को काल कोठरियों में डाल दिया गया। 4 मज़दूर नेताओं को फांसी की सजा दे दी। लेकिन फांसी की कालकोठरी से अल्बर्ट पर्सन्स और ऑगस्ट स्पाइस की आवाज जो निकली वह आज तक गुंजायमान है। 1889 से 1 मई को पूरी दुनिया में मज़दूर दिवस मनाने का ऐलान हुआ।

तब से संघर्ष का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा,  8 घंटे काम के हक़ के साथ तमाम कानूनी हक़ हासिल होते गए। संघर्षों के इस सिलसिले में मजदूरों के भीतर जो जज्बा पैदा हुआ था, उससे मज़दूर वर्ग की विचारधारा और परिपक्व हुई, मज़दूरों की पाट्रियां बनीं। मज़दूरों ने 1917 में रूस में जार शाही की सत्ता को पलट कर अपने पहले राज को स्थापित किया, और धीरे-धीरे दुनिया की एक चौथाई हिस्से पर मज़दूर वर्ग की सत्ताएं काबिज हुईं।

वर्तमान दौर के बदले हालात में पूँजीवाद फिर आक्रामक हमले बोलने लगा है। क्योंकि वक्ती तौर पर आज मज़दूर आंदोलन पीछे हटा है, बिखराव और पराजय की स्थिति में है।

कोरोना/लॉकडाउन के बीच संकटग्रस्त मज़दूर

आज जब हम मई दिवस को याद कर रहे हैं, तो हमारे सामने एक तरफ मज़दूरों के लंबे संघर्षों के दौरान हासिल अधिकारों को छीनने, बलि चढ़ाने का दौर अपने चरम पर है। तो दूसरी ओर दाग़ में खाज़ यह कि विश्वव्यापी कोविड-19 महामारी ने अपनी जकड़बंदी में पूरी दुनिया को ले लिया। दुनिया भर की पूँजीवादी निजामें इस अदृश्य वायरस से जूझने में, लड़ने में नाकाम दिखने लगी हैं। साम्राज्यवादियों का चौधरी देश अमेरिका पस्त हो गया। पूरी दुनिया में महामारी से सबसे अधिक मौतें अमेरिका में हो चुकी हैं और अभी यह सिलसिला जारी है। यूरोप और अमेरिका के केवल पाँच देश में हुई मौतें दुनिया भर में हुईं कुल मौतों से काफी अधिक हैं।

लेकिन पूँजीवाद का अपना एक निर्मम तरीका है। जब भी वह संकटग्रस्त होता है तो अपने संकटों का बोझ मज़दूर वर्ग पर डाल देता है। आज एक बार फिर वही हो रहा है।

भारत में ही देखें तो मज़दूर सिर्फ रोटी और अपने घर जाने की माँग कर रहे हैं, लेकिन बेबस हैं और यातना शिविरों जैसे राहत कैंपों में क़वालेन्टाइन कर दिए गए हैं। मज़दूर बार-बार सड़कों पर उतर रहे हैं और एक माँग कर रहे हैं- उन्हें घर जाने दिया जाए। लेकिन निर्मम और निरंकुश सत्ता के लिए मज़दूरों की भुखमरी, बेकारी चिंता का सबब कतई नहीं है। इसके विपरीत धनपतियों और उनके लाडलों के प्रति मोदी सरकार की चिंता खुलकर सामने आ चुकी है।

छिनते अधिकारों के दौर में मई दिवस

एक तरफ मोदी सरकार कोरोना संकट के नाम पर लोगों से ताली-थाली पिटवाती है, मोमबत्ती जलवाती है और दूसरी तरफ मज़दूरों को रोजगार और वेतन के भी लाले पड़ गए हैं। ऊपर से वह मज़दूरों के अधिकारों पर खुलेआम डकैती डाल रही है। संविधान को दरकिनार कर मज़दूर विरोधी श्रम संहिताओं को चोर दरवाजे से अध्यादेश से लाने की कोशिशें चल रही हैं। जिस मई दिवस की परंपरा 8 घंटे काम की माँग से आगे बढ़ी थी, आज काम के घंटे 12 करने के प्रस्ताव खुले तौर पर आ गए हैं और 16 घंटे तक खटाने के लिए तैयारी पूरी हो चुकी है। मज़दूरों के वेतन में तरह-तरह से कटौतियां बढ़ रही हैं। छँटनी का नया दौर गति पकड़ रहा है।

दमन के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक दिवस भी है मई दिवस। लेकिन आज एक बार फिर सत्ता का दमन बेलगाम हो चुका है। न्याय और हक़ की आवाज उठाने वालों पर फर्जी मुक़दमे थोपे जा रहे हैं, गिरफ्तारियां तेज हो रही है, जेल लाठी-डंडे और बंदूक से कुचलने के उसी पुराने हथियार का इस्तेमाल आज ज्यादा कुशलता से हो रहा है। आज भी संघर्षरत मारुति, प्रीकॉल, गर्जियानो के मज़दूर अन्यायपूर्ण उम्र क़ैद झेलने को विवश हैं। मुनाफ़ाखोरों और निरंकुश सत्ता का नापाक गठजोड़ हर तरीके से मज़दूरों को डराने, खौफ पैदा करने के लिए पहले से ज्यादा मुस्तैदी से उतर पड़ा है।

कुल मिलाकर आज मज़दूर जमात को संकट के एक नए दौर में ढकेल दिया गया है।

यह नये संकल्प लेने का समय है

आज मई दिवस का सामूहिक कार्यक्रम सड़कों पर नहीं हो पा रहा है, क्योंकि कोरोना/लॉकडाउन की स्थिति है। लेकिन मज़दूरों के मौजूदा हालात में जो सवाल मौजूद है, उसमें निश्चित रूप से मई दिवस पर नए संकल्प लेने का मौका पहले से ज्यादा मौजू हुआ है। आइए मज़दूर विरोधी इस संकटपूर्ण दौर में, मई दिवस के शहीदों को याद करते हुए संकल्प लें!

  • कोरोना संकट का बोझ मज़दूरों पर डालने को नहीं सहेंगे! अन्यायपूर्ण दमन का हरचंद प्रतिरोध करेंगे!
  • मज़दूरों की चाहत के अनुरूप घर वापसी या काम वापसी के जनवादी अधिकार के संघर्ष को आगे बढ़ाएंगे!
  • लंबे संघर्षों के दौरान हासिल मज़दूरों के अधिकारों की डकैती को बर्दाश्त नहीं करेंगे।
  • अध्यादेश द्वारा कानून में श्रमिक विरोधी सुधार और 3 श्रम कोड पारित करने का प्रयास नहीं सहेंगे!
  • 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन के हक़ पर हमला बर्दाश्त नहीं करेंगे!
  • कोरोना/लॉकडाउन के बहाने उद्योगों में बेगारी, वेतन व महँगाई भत्ते में कटौती, छँटनी नहीं चलेगा!
  • सरकार को श्रमिकों के लिए आवश्यक स्वास्थ्य सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी होगी।
  • अन्याय के खि़लाफ संघर्षरत माइक्रोमैक्स, वोल्टास, गुजरात अम्बुजा, शिरडी के मज़दूरों के साथ चलेंगे!
  • मज़दूरों को बांटने की हर कोशिश का विरोध करेंगे, मज़दूर एकता मज़बूत करेंगे!
  • हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाएंगे!
  • #LongLiveMayDay
  • # 8hourWorkingDay
  • #MigrantWorkersRights
  • #NoToAntiWorkersLabourReforms

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