क्यों करते हैं मज़दूर हड़ताल -लेनिन

मज़दूर वर्ग के महान नेता, शिक्षक व मित्र कॉमरेड लेनिन के जन्म दिवस (22 अप्रैल) के अवसर पर

अक्सर यह सवाल उठता है कि मज़दूर हड़ताल क्यों करते हैं? दमन का शिकार होते हैं, फिर भी संघर्ष के मोर्चे पर कैसे डटे रहते हैं? हड़ताल के दौरान कैसे शासन-प्रशासन-पुलिस मालिकों के हित में खडी हो जाती है और मज़दूरों पर फर्जी मुक़दमें थोपने से लेकर दमन का खुनी चेहरा सामने आताहै? …इन तमाम प्रश्नों का ज़वाब कॉमरेड लेनिन साफ़ तौर पर देते हैं।

व्लादीमिर इल्यीच लेनिन मज़दूर वर्ग के महान नेता, शिक्षक और दोस्त थे, जिन्होंने दुनिया की पहली सफल मज़दूर क्रान्ति को कुशल नेतृत्व दिया था। सोवियत संघ में पहले समाजवादी राज्य की स्थापना कर सारी सत्ता मेहनतकश के हाथों देने वाले अग्रणी नेता लेनिन का 22 अप्रैल को 150वां जन्म दिवस है। उन्होंने मज़दूर वर्ग द्वारा होने वाले हड़ताल पर एक लम्बा लेख लिखा था।

लेनिन के बारे में जानने के लिए पढ़ेंमज़दूर वर्ग के शिक्षक व दोस्त थे लेनिन

लेनिन के जन्मदिवस के अवसर पर उनके महत्वपूर्ण लेख ‘हड़तालों के बारे में’ का सम्पादित हिस्सा ‘मेहनतकश’ की टीम की ओर से हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

हड़तालों के बार में

पूँजीवाद नाम उस सामाजिक व्यवस्था को दिया गया है, जिसके अन्तर्गत जमीन, फैक्टरियाँ, औजार आदि पर थोड़े-से भूस्वामियों तथा पूँजीपतियों का स्वामित्व होता है, जबकि जनसमुदाय के पास कोई सम्पत्ति नहीं होती या बहुत कम होती है तथा वह उजरती मजदूर बनने के लिए बाध्‍य होता है।

भूस्वामी तथा फैक्टरी मालिक मजदूरों को उजरत पर रखते हैं और उनसे इस या उस किस्म का माल तैयार कराते हैं, जिसे वे मण्डी में बेचते हैं। इसके अलावा फैक्ट्री मालिक मजदूरों को केवल इतनी मजदूरी देते हैं, जो उनके तथा उनके परिवारों के मात्र निर्वाह की व्यवस्था करती है, जबकि इस परिमाण से ऊपर मजदूर जितना भी पैदा करता है, वह फैक्टरी मालिक की जेब में उसके मुनाफे के रूप में चला जाता है।

इस प्रकार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत जन समुदाय दूसरों का उजरती मजदूर होता है, वह अपने लिए काम नहीं करता, अपितु मजदूरी पाने के वास्ते मालिकों के लिए काम करता है। यह बात समझ में आने वाली है कि मालिक हमेशा मजदूरी घटाने का प्रयत्न करते हैं : मजदूरों को वे जितना कम देंगे, उनका मुनाफा उतना ही अधिक होगा। मजदूर अधिक से अधिक मजदूरी हासिल करने का प्रयत्न करते हैं, ताकि अपने परिवारों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन दे सकें, अच्छे घरों में रह सकें, दूसरे लोगों की तरह अच्छे कपड़े पहन सकें तथा भिखारियों की तरह न लगें।

इस प्रकार मालिकों तथा मजदूरों के बीच मजदूरी की वजह से निरन्तर संघर्ष चल रहा है; मालिक जिस किसी मजदूर को उपयुक्त समझता है, उसे उजरत पर हासिल करने के लिए स्वतन्त्र है, इसलिए वह सबसे सस्ते मजदूर की तलाश करता है। मजदूर अपनी मर्जी के मालिक को अपना श्रम उजरत पर देने के लिए स्वतन्त्र है, इस तरह वह सबसे महँगे मालिक की तलाश करता है, जो उसे सबसे ज्यादा देगा।

मजदूर चाहे देहात में काम करे या शहर में, वह अपना श्रम उजरत पर चाहे जमींदार को दे या धनी किसान को, ठेकेदार को अथवा फैक्टरी मालिक को, वह हमेशा मालिक के साथ मोल-भाव करता है, मजदूरी के लिए उससे संघर्ष करता है।

परन्तु क्या एक मजदूर के लिए अकेले संघर्ष करना सम्भव है?

…मजदूर के लिए अकेले मालिक से टक्कर लेना असम्भव हो जाता है। यदि मजदूर अच्छी मजदूरी माँगता है अथवा मजदूरी में कटौती से असहमत होने का प्रयत्न करता है, तो मालिक उसे बाहर निकल जाने के लिए कहता है, क्योंकि दरवाजे पर बहुत-से भूखे लोग खड़े होते हैं, जो कम मजदूरी पर काम करने के लिए सहर्ष तैयार हो जायेंगे।

जब लोग इस हद तक तबाह हो जाते हैं कि शहरों और गाँवों में बेरोजगारों की हमेशा बहुत बड़ी तादाद रहती है, जब फैक्ट्री मालिक अथाह मुनाफे खसोटते हैं तथा छोटे मालिकों को करोड़पति बाहर धकेल देते हैं, तब व्यक्तिगत रूप से मजदूर पूँजीपति के सामने सर्वथा असहाय हो जाता है। तब पूँजीपति के लिए मजदूर को पूरी तरह कुचलना, दास मजदूर के रूप में उसे और निस्सन्देह अकेले उसे ही नहीं, वरन उसके साथ उसकी पत्नी तथा बच्चों को भी मौत की ओर धकेलना सम्भव हो जाता है।

…दासप्रथा या भूदास प्रथा के अन्तर्गत भी मेहनतकश जनता का कभी इतना भयंकर उत्पीड़न नहीं हुआ, जितना कि पूँजीवाद के अन्तर्गत हो रहा है, जब मजदूर प्रतिरोध नहीं कर पाते या ऐसे कानूनों का संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकते, जो मालिकों की मनमानी कार्रवाइयों पर अंकुश लगाते हों।

इस तरह अपने को इस घोर दुर्दशा में पहुँचने से रोकने के लिए मजदूर व्यग्रतापूर्वक संघर्ष शुरू कर देते हैं। मजदूर यह देखकर कि उनमें से हरेक व्यक्तिश: सर्वथा असहाय है तथा पूँजी का उत्पीड़न उसे कुचल डालने का खतरा पैदा कर रहा है, संयुक्त रूप से अपने मालिकों के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर देते हैं। मजदूरों की हड़तालें शुरू हो जाती हैं।

… हड़तालों के समय वह अपनी माँगें ऊँची आवाज में पेश करता है, वह मालिकों को उनके सारे दुर्व्‍यवहारों की याद दिलाता है, वह अपने अधिकारों का दावा करता है, वह केवल अपने और अपनी मजदूरी के बारे में नहीं सोचता, वरन अपने सारे साथियों के बारे में सोचता है, जिन्होंने उसके साथ-साथ औजार नीचे रख दिये हैं और जो तकलीफों की परवाह किये बिना मजदूरों के ध्‍येय के लिए उठ खड़े हुए हैं।

मेहनतकश जनों के लिए प्रत्येक हड़ताल का अर्थ है बहुत सारी तकलीफें, भयंकर तकलीफें, जिनकी तुलना केवल युद्ध द्वारा प्रस्तुत विपदाओं से की जा सकती है – भूखे परिवार, मजदूरी से हाथ धो बैठना, अक्सर गिरफ्तारियाँ, शहरों से भगा दिया जाना, जहाँ उनके घरबार होते हैं तथा वे रोजगार पर लगे होते हैं।

इन तमाम तकलीफों के बावजूद मजदूर उनसे घृणा करते हैं, जो अपने साथियों को छोड़कर भाग जाते हैं तथा मालिकों के साथ सौदेबाजी करते हैं। हड़तालों द्वारा प्रस्तुत इन सारी तकलीफों के बावजूद पड़ोस की फैक्ट्रियों के मजदूर उस समय नया साहस प्राप्त करते हैं, जब वे देखते हैं कि उनके साथी संघर्ष में जुट गये हैं।

अंग्रेज मजदूरों की हड़तालों के बारे में समाजवाद के महान शिक्षक एंगेल्स ने कहा था : ”जो लोग एक बुर्जुआ को झुकाने के लिए इतना कुछ सहते हैं, वे पूरे बुर्जुआ वर्ग की शक्ति को चकनाचूर करने में समर्थ होंगे।”

…प्रत्येक हड़ताल समाजवाद के विचार को, पूँजी के उत्पीड़न से मुक्ति के लिए पूरे मजदूर वर्ग के संघर्ष के विचार को बहुत सशक्त ढंग से मजदूर के दिमाग़ में लाती है। प्राय: होता यह है कि किसी फैक्ट्री या किसी उद्योग की शाखा या शहर के मजदूरों को हड़ताल के शुरू होने से पहले समाजवाद के बारे में पता ही नहीं होता और उन्होंने उसकी बात कभी सोची ही नहीं होती। परन्तु हड़ताल के बाद अध्‍ययन मण्डलियाँ तथा संस्थाएँ उनके बीच अधिक व्यापक होती जाती हैं तथा अधिकाधिक मजदूर समाजवादी बनते जाते हैं।

हड़ताल मजदूरों को सिखाती है कि मालिकों की शक्ति तथा मजदूरों की शक्ति किसमें निहित होती है; वह उन्हें केवल अपने मालिक और केवल अपने साथियों के बारे में ही नहीं, वरन तमाम मालिकों, पूँजीपतियों के पूरे वर्ग, मजदूरों के पूरे वर्ग के बारे में सोचना सिखाती है।…

‘हड़तालों के बारे में’ – लेनिन (लेखा का सम्पादित हिस्सा)