लॉकडाउन: मिलों चलने के बाद घर पहुँचाने से पहले हुई मौत

अख़बारनामा : संकटग्रस्त प्रवासी मज़दूरों के पलायन की दास्तान

कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के बाद से ही प्रवासी मज़दूरों के पलायन की ख़बरें सामने आती रही हैं. कई लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर या साइकिल से भी अपने घरों तक पहुंच रहे हैं. हालांकि शहरों से गांव लौट रहे लोगों की मुश्किलें कम नहीं हैं. द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन में पैदल ही अपने घर का रुख करने वाली 12 साल की एक लड़की की मौत घर पहुंचने से पहले ही हो गई.

रिपोर्ट के मुताबिक, 12 साल की जमालो मडकाम करीब दो महीने पहले तेलंगाना में मिर्च की खेती में काम करने के लिए अपने रिश्तेदारों के साथ पहली बार घर से बाहर निकली थी. लेकिन ज़िंदा वापस नहीं लौटी. करीब 100 किमी. पैदल चलने के बाद उसकी मौत गई.

अख़बार ने अधिकारियों के हवाले ले लिखा कि उसके साथ 13 अन्य लोग भी थे. 12 साल की लड़की लगातार तीन दिन तक पैदल चली और 18 अप्रैल को इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और थकान की वजह से उसकी मौत हो गई. छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले में स्थित अपने घर से 11 किमी दूर उसकी मौत हुई.जरोम अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी. राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये देने की घोषणा की है.

केंद्र व राज्य सरकारों में तकरार

कोरोना वायरस संक्रमण के मामले भारत में लगातार बढ़ रहे हैं और संक्रमित लोगों की कुल संख्या 18 हज़ार के करीब है.देशभर में तीन मई तक के लिए लागू किए गए लॉकडाउन के बीच केरल सरकार ने कुछ रियायतें दीं जिस पर सवाल खड़े होने लगे.

अमर उजाला में छपी एक ख़बर के मुताबिक, केरल सरकार ने छोटी दूरी की बसें चलाने, सैलून, रेस्तरां और किताब की दुकाने खोलने की छूट दी थी जिस पर केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने आपत्ति जताई. जिसके बाद केरल सरकार बैकफ़ुट पर आ गई और फ़ैसला वापस ले लिया. केरल के बाद पश्चिम बंगाल ने केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला.

अख़बार ने लिखा है कि केंद्र ने ख़राब स्थिति वाले इलाकों में विशेषज्ञों की टीम भेजी है. पश्चिम बंगाल में टीम भेजे जाने पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खफ़ा हो गईं. उन्होंने सवाल किया कि आखिर किस आधार पर केंद्र से टीम वहां भेजी गई है. उन्होंने ट्वीट करके कहा कि बिना किसी ठोस वजह के वो केंद्र से भेजी गई टीम को संक्रमित क्षेत्रों में जाने की अनुमति नहीं देंगी.कोरोना वायरस का इलाज तलाशने में दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक जुटे हुए हैं. कोरोना का अब तक कोई इलाज नहीं है.हालांकि दुनियाभर में अबूझ पहेली बने कोरोना वायरस के इलाज में प्लाज़्मा थेरेपी ने उम्मीद की किरण दिखाई है.

प्लाज्मा थेरेपी का असर

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना के गंभीर संक्रमण से जूझ रहे एक शख़्स के इलाज में प्लाज़्मा थेरेपी को अपनाया गया और पहली बार इस थेरेपी से सफलता पूर्वक इलाज किया गया है. मरीज के चार दिन में ठीक होने पर डॉक्टर काफ़ी उत्साहित हैं.अख़बार लिखता है, दिल्ली के मैक्स अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि डिफ़ेंस कॉलोनी निवासी 49 वर्षीय मरीज़ को चार अप्रैल को भर्ती किया गया था और उसी दिन कोरोना की पुष्टि हुई थी. एक-दो दिन में उन्हें निमोनिया भी हो गया.

ऐसे में आठ अप्रैल को वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा.मरीज़ के परिजनों ने प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज का आग्रह किया था और डोनर भी ले आए जो तीन सप्ताह पहले ही ठीक हुए थे.

कंपनियों में उत्पादन शुरू

कोरोना लॉकडाउन के बीच एक ओर जहां अधिकतर कारोबार ठप पड़े हैं, वहीं कुछ क्षेत्रों में काम थोड़ा-थोड़ा शुरू हो रहा है.द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सीमेंट उत्पादकों ने सोमवार से काम शुरू कर दिया है. वहीं स्टील निर्माता अपने उत्पादन को धीरे-धीरे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं. हालांकि निर्माण कार्य अब भी पूरी तरह ठप हैं. अख़बार लिखता है कि कुछ लोग अभी हालात और सुधरने का इंतज़ार कर रहे हैं तो कुछ को सरकार से अनुमति मिलने का इंतज़ार है. जबकि कुछ लोग हॉटस्पॉट होने की वजह से काम शुरू नहीं कर पा रहे.

अख़बार के मुताबिक, भारत की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनी अल्ट्राटेक सीमेंट ने स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी है कि उसने कुछ जगहों पर प्रोडक्शन का काम शुरू कर दिया है.स्टील निर्माता कंपनियों ने अलग-अलग चरणों में काम शुरू किया है.

कोरोना लक्षण ना दिखें तो…

कोरोना संक्रमण के लक्षण नज़र आने पर विशेषज्ञ टेस्ट कराने की सलाह दे रहे हैं. लेकिन अगर वायरस से संक्रमित होने के लक्षण दिखें ही न तो कोई क्या करेगा? दरअसल बीते दिनों देश में कोरोना संक्रमण के ऐसे कई पॉजिटिव मामले सामने आए हैं जिनमें वायरस के लक्षण नहीं दिख रहे थे.

नवभारत टाइम्स की एक ख़बर के मुताबिक, करीब 80 फ़ीसदी मामले ऐसे हैं जिनमें पीड़ित व्यक्ति पर कोई लक्षण नहीं दिखता या फिर बेहद मामूली हैं. बाकी बचे 20 फ़ीसदी मरीज़ों में गंभीर लक्षण दिख रहे हैं. हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें लोगों में एक भी लक्षण नहीं थे लेकिन टेस्ट में वो कोरोना संक्रमण पॉजिटिव पाए गए.

अख़बार ने डॉक्टरों के हवाले से लिखा है कि ऐसे लोगों को इलाज की ज़रूरत नहीं होती. उन्हें सिर्फ़ अलग रहना होगा और वो ठीक हो सकते हैं.ये आंकड़े तब सामने आए हैं जब सरकार का कहना है कि देश में कोरोना के मामले दोगुने होने की रफ़्तार में कमी आई है. देश में कोरोना के कुल पॉजिटिव मामले 18 हज़ार के करीब हैं.

बीबीसी से साभार

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