मालिक के परिवार को कोरॉना से संक्रमित करने के आरोप पर बेगुनाह गार्ड पर हुआ एफआईआर

बीमारी का बहाना और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह बढ़ा रहीं हैं मजदूरों का उत्पीड़न

खबर मिली है कि ओखला में रहने वाला एक 54 वर्षीय मज़दूर दिल्ली में कोरोना मुक्त पाया गया। किन्तु टेस्ट के परिणाम संतोषजनक आने के बावजूद, उसके साथ पिछले 10 दिनों में हुए उत्पीड़न का हिसाब किया जाना अभी भी बाकी है।

दिल्ली के उच्च वर्गी रिहायशी इलाके, डिफेंस कॉलोनी में जब एक 3 सदस्यों वाले परिवार में कॉरोना संक्रमण पाया गया तो उन्होंने शक का पहला निशाना अपने मुलाजिम, सिक्योरिटी गार्ड को बनाया। अप्रैल की शुरुआत में इस परिवार ने गार्ड के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया, जिसमें ‘लापरवाह कर्मों से संक्रमण फैलाने’ जैसी संगीन धाराएं लगी थीं।

पुलिस ने भी कार्यवाही पूरी फुर्ती से चालू कर दी और गार्ड के पीछे लग गए। यहां तक कि पुलिस ने इस हाई क्लास कॉलोनी में गार्ड के बारे में लोगों को सचेत करने के लिए नोटिस लगवाया और घर घर में वॉट्सएप मेसेज भेजवाए, की यह व्यक्ति संक्रमित हो सकता है, व यह फरार है। इस पूरी कार्यवाही का आधार था कि गार्ड का फोन ट्रैक कर के पुलिस को सूचना मिली की वह निज़ामुद्दीन मरकज के इलाके में गया था।

पुलिस और मालिक दोनों ही थे पूर्वाग्रहों से ग्रसित

जहां पुलिस की सक्रियता वाजिब है, वहीं पुलिस की कार्यवाही के तरीकों पर ज़रूरत सवाल खड़े होते हैं। 3 अप्रैल तबीयत ठीक ना लगने पर गार्ड ओखला में अपने कमरे पर नजरबंद हो गया था व उसकी कॉरोना टेस्टिंग हो गई थी। 11 अप्रैल तक उसकी जांच की रिपोर्ट भी आ गई थी। लेकिन मीडिया द्वारा पूछताछ करने पर पुलिस टेस्ट रिप्रोट का कोई भी ज्ञान होने से इंकार करती रही। साथ ही उन्होंने ने व्यक्ति को फरार बता कर उसे अपराधी भी करार कर दिया। मोहल्ले में हुआ इस प्रकार का प्रचार एक ओर मुसलमानों के प्रति समाज में बनाई जा रही शंका को हवा देता है, और दूसरी ओर निशाने पर रहे मज़दूर के लिए फिर रोज़गार ढूंढ़ना भी बेहद मुश्किल बना देता है।

अगर मालिक से होता मज़दूर को संक्रमण, तो कैसी फुर्ती दिखाता प्रशासन?

विश्व भर में कोरोना संक्रमण हवाई यातायात से सबसे तेज़ी से फैला। लाज़िम है कि हवाई यातायात के उपभोक्ताओं में से अधिकतर लोग उच्च वर्ग के थे। भारत के पहले मरीज़ों में नामी कलाकार और विदेश के दौरे से लौटे लोग थे। विश्व में संक्रमण फैलने की खबर आने के लंबे समय बाद भी भारत में विदेश यात्रियों का प्रवेश जारी रहा। जैसा की ओखले के हमारे गार्ड की कहानी से भी व्यक्त है, संक्रमण मालिकों के परिवार में फैला था, ना कि गार्ड से। कहते हैं कि वायरस किसी की जात, मज़हब और वर्ग देख कर नहीं फैलती।

हर व्यक्ति की सेहत और जीवन बहुमूल्य है। किन्तु सरकार, प्रशासन और समाज द्वारा वायरस की रोकथाम में भेदभाव का असर लगातार हावी रहा है। चाहे वे मरकज के दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद मुसलमानों के साथ ही रहा भेदभाव और बहिष्कार हो, या प्रवासी मज़दूरों की लॉकडॉउन में हो रही दुर्गति हो। साथ ही, मारीज़ों और संदिग्ध मारीजों के नाम व पते के पोस्टर लगाने का जो चलन मरकज से संबंधित व्यक्तियों के साथ शुरू हुई है वह किसी भी व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार के ख़िलाफ़ है।

संक्रमण फैलाने वाली गैर ज़िम्मेदाराना हरकत की धारा के तहत एक ग़रीब मुसलमान गार्ड पर लगाए गए एफआईआर पर इतनी रफ़्तार से काम करने वाला प्रबंधन, क्या खुद गैरजिम्मेदारी के इल्जाम से अछूता है?

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