एक बेहतरीन ब्लैक कॉमेडी फिल्म : न्यूटन

सिनेमा : आइए बेहतरीन फिल्मों को जानें-4

गंभीर विषय पर बनी हल्की फुल्की फिल्म “न्यूटन” मध्यमवर्गीय संवेदनाओं के साथ खेलती हुई काफी हद तक डेमोक्रेसी की बुनियादी समझ पर कुछ प्रश्न खड़े कर देती है… एक संवेदनशील दर्शक के लिए कुछ सवाल जेहन में आ जाते हैं…! …आइए जानें साथी अजीत श्रीवास्तव के साथ…!

न्यूटन

2017 में आई फ़िल्म “न्यूटन”  भारतीय सिनेमा को एक नए स्तर पर ले जाती है। ये गंभीर विषय पर बनी हल्की फुल्की फिल्म है, जो शुरू से अन्त तक आपको बांधे रखती है।

अनिल मसूरकर द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी मुख्य भूमिकाओं में हैं।

नूतन कुमार उर्फ न्यूटन (राजकुमार राव) एक क्लर्क है। आदर्शवादी और ईमानदार, जिसको मध्यमवर्गीय व्यवहारिकता से ज्यादा नियमों का पालन करने और अपनी ईमानदारी से लगाव है। यह किरदार खुद का आदर्श खुद है। माँ बाप का दिया नाम नूतन बदल कर न्यूटन कर लेता है और अपनी शादी के लिए लड़की देखने जाता है तो शादी से मना कर देता है, क्योंकि लड़की 18 साल की नही हुई है। 

न्यूटन की चुनाव में ड्यूटी लगती है और उसका बूथ होता है नक्सल प्रभावित इलाके मे, जो अब पैरा मिलिट्री के अधिकार में है। असिस्टेंट कमांडेंट आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) की ड्यूटी उसकी टीम को सुरक्षा देने की है।

यहीं से फ़िल्म भारतीय डेमोक्रेसी की परतें एक एक कर खोलने लग जाती है। असल मे न्यूटन किसी सवाल का जवाब देने की कोशिश नही करती वरन सवाल पैदा करती है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाला देश किस तरह डेमोक्रेसी का आवरण ओढ़े खड़ा है और लोकतंत्र के नाम पर किस कदर क्रूरतापूर्ण मजाक चल रहा है, यह फिल्म के दोनों मुख्य किरदारों की बातचीत में उभरता जाता है।

पूरी फिल्म एक सटायर है और इसके सधे हुए संवादों पर ठहाका लगाते दर्शक अंत में बहुत सारे सवालों के साथ सिनेमा हाल से बाहर निकलते हैं।

फिल्म का सबसे खूबसूरत दृश्य वह लगता है जब फ्रेम दर फ्रेम आदिवासी बुजुर्ग स्याही लगी उंगली दिखाते हुए परदे पर फ्लैश करते हैं और अनायास ही चुनावों में ठीक इसी अंदाज में अपनी सेल्फी लगाते लोगों की तस्वीर जेहन में आती है और और आपके दिमाग में सवाल कौंधता है कि क्या यह स्याही वाली ऊँगली ही लोकतंत्र है? या फिर लोकतंत्र के दायरे में न्यूटन की वह जिद भी आती है जब वह कहता है कि आप आदिवासियों से इज्जत के साथ बात करिए।

76 वोटरों वाले जिस गाँव में न्यूटन की ड्यूटी लगी है, वहाँ का स्कूल खँडहर पड़ा है, घर पैरा मिलिट्री ने जला दिए हैं और उसके बाशिंदों को “सुरक्षित” शहर की सीमा पर स्थित कैम्पों में भेज दिया है। वहाँ बच्चों से सैनिक “इंट्रोगेशन” कर रहे होते हैं, “लोकल बीएलओ” को पोलिंग पार्टी के साथ वे नहीं जाने देना चाहते क्योंकि “लोकल लोगों” पर उन्हें भरोसा नहीं। गाँव के लोगों को जब न्यूटन वोट देने के लिए समझा रहा होता है तो कहता है कि उनके वोट देने से जो आदमी चुना जायेगा वह दिल्ली जायेगा और उनके लिए बिजली पानी, सामाजिक सुरक्षा आदि का प्रबंध करेगा। गाँव वाले मुंह ताक रहे हैं और उनका सवाल था कि क्या वोट देने का पैसा मिलेगा?

यहाँ आत्मा सिंह मोर्चा संभालता है और बताता है कि वोटिंग मशीन खिलौने के जैसी है, बहुत सारे बटन हैं, जिस पर मन करे बटन दबा दो। भारतीय लोकतंत्र यहाँ अकबका कर रह जाता है और डंडे के जोर से 76 में से 39 लोगों के वोट मशीन में कैद हो जाते हैं।

पैरा मिलिट्री से घिरी पोलिंग पार्टी के साथ आया लोकतंत्र, आदिवासी महिला को धमका कर हासिल किया गया मुर्गा खाने लगता है, और उसकी हिफाजत कर रहा कमान्डेंट “लाल सलाद” “लाल सलाद” बोलता हुआ खाना परोस रहे अवयस्क लड़कों को भी महान लोकतन्त्र का भागीदार बनाने के लिए वोट डालने का हुक्म दे डालता है।

फिल्म का नायक हर बहस में हारता है, उसकी ईमानदारी की जिद पर ठहाके लगते हैं, नियमों का पालन करता हुआ वह बेवकूफ लगता है। यही कटाक्ष इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

विदेशी पत्रकार के साथ आया पुलिस का बड़ा अधिकारी हांक कर लाये गए आदिवासियों के जरिये सबसे बड़े लोकतान्त्रिक अधिकार की नुमाइश कर देता है। यही वे तस्वीरें हैं जिन्हें देखकर मध्यवर्गीय आदमी लोकतंत्र के भरम को बिछा ओढ़ लेता है, और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक बड़ी आबादी के सवाल और समस्याएं और जरूरतें और उनके अधिकार इन तस्वीरों के पीछे ढँक दिए जाते हैं।

मार पीट कर आदिवासी लाइन में खड़े कर दिए जाते हैं, उनका वोट ऐसे लोगों के लिए हासिल कर लिया जाता है जिनका नाम भी वे पहली बार सुन रहे होते हैं और इस तरह लोकतंत्र या लोकतंत्र के भ्रम की हिफाजत कर ली जाती है।

आदिवासियों को मारपीट कर वोट देने को हांकते सैनिक भी अपनी ड्यूटी कर रहे होते हैं  और उनसे इंसानों जैसे पेश आने के लिए लड़ता न्यूटन भी अपनी ड्यूटी कर रहा होता है। आदिवासियों का मजाक उड़ाता लोकनाथ भी अपनी ड्यूटी कर रहा है और आदिवासी शिक्षिका  मलको भी अपनी ड्यूटी कर रही है जिसकी आस्था सब कुछ के बावजूद इस कागजी लोकतंत्र से डिगी नहीं है।

और इन सबका मजा लेता दर्शक महान लोकतंत्र का अंग होने का भ्रम पाले हुए आत्ममुग्ध होकर ठहाके लगा रहा है। 

Actor Pankaj Tripathi National film awards on Special Mention ...

यह फिल्म मध्यमवर्गीय संवेदनाओं के साथ खेलती हुई काफी हद तक डेमोक्रेसी की आपकी बुनियादी समझ पर कुछ प्रश्न खड़े कर देती है और बिना किसी जवाब के थोड़ी एब्नार्मल से अंत के साथ समाप्त हो जाती है। एक संवेदनशील दर्शक के लिए कुछ सवाल जेहन में आ जाते हैं और बहुतायत में मौजूद आम दर्शक फिल्म की कसी हुई ब्लैक कामेडी पर अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से तर्क करते या तर्क गढ़ते विदा हो लेते हैं।

फिल्म को एक बार अवश्य देखा जाना चाहिए। राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, रघुवीर यादव और अंजलि पाटिल की बेहतरीन अदाकारी के लिए, अमित मसूरकर के साढ़े हुए निर्देशन और स्क्रीन प्ले लेखन के लिए और सबसे बढ़कर भारतीय लोकतंत्र की चुनावी नौटंकी पर सधी हुई टिप्पणी के लिए।

इसे देखने के बाद संभवतः आप लोकतंत्र के बारे में, अपने अधिकारों के बारे में, ईमानदारी और भ्रष्टाचार के बारे में, व्यावहारिकता बनाम नियम अनुपालन के बारे में थोडा बेहतर तरीके से सोचना शुरू कर देंगे। बाकी ये एक पैसा वसूल और दिलचस्प ब्लैक कामेडी तो है ही।

-अजीत श्रीवास्तव

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