यमुना तट पर फंसे 9000 प्रवासी मज़दूर

भीड़ हटाने के लिए सरकार ने किया अन्य केन्द्रों में इंतज़ाम

राजधानी में फंसे मज़दूरों की बड़ी तादात ने यमुना के किनारों पर आश्रय लिया है| उत्तरी दिल्ली और पुरानी दिल्ली के अलग अलग इलाकों में दिहाड़ी करने वाले इन मज़दूरों में से कुछ पहले से ही यमुना के तट पर रहते थे, लेकिन अब यह तादात 200-250 से कई गुणा बढ़ गयी है| घरों और नौकरियों से निकाले गए, और गाँव लौटने में असमर्थ मज़दूरों की यह बड़ी आबादी पूरी तरह दिल्ली सरकार द्वारा दिए जा रहे खाने पर आश्रित है| ऐसे में तीन दिनों तक इन मज़दूरों को दिल्ली सरकार द्वारा खाना नहीं दिए जाना सरकार की बेपरवाही का प्रतीक है|

शनिवार को हुई आगजनी की मिली सज़ा   

मंगलवार को मीडिया से बात करते हुए मज़दूरों ने बताया कि खाना ना दे कर सरकार उन्हें शनिवार की घटना के लिए सबक सिखाना चाहती थी| 11 अप्रैल को यमुना तट पर दिल्ली सरकार के तीन रैन बसेरे भीड़ द्वारा जला दिए गए थे| चश्मदीद गवाहों का कहना है की लोगों का गुस्सा तब भड़का जब यमुना से एक मज़दूर की लाश बरामद हुई| कुछ अन्य नौजवान मज़दूरों द्वारा तथाकथित मज़दूर सूरज के नाम से पहचाना गया, और उनहोंने बताया कि शुक्रवार रात खाना कम पड़ने पर किसी ने सेंटर वालों पर एक पत्थर फेंका जिसके बात पुलिस वहां रह रहे लोगों को पीटने लगी| इससे डर कर एक लड़का मार से बचने के लिए नदी में कूद गया| अन्य लड़कों द्वारा उसको बचाने की कोशिश के बावजूद डूब कर उसकी मौत हो गयी थी| जब उसकी लाश बरामद हुई तो बाकी मज़दूरों के अन्दर भरा गुस्सा भी उबल गया और स्थिति हाँथ से बाहर चली गयी| अब तक 7 लोगों को इस संबंध में गिरफ्तार किया जा चूका है|

बगल से गुज़रती हुई पाइप से पीने का पानी जुटाते हुए मज़दूर

आगजनी में जिन तीन रैन बसेरों को जलाया गया उनमें कुल 104 लोगों के रहने का इंतज़ाम था| इसके अतिरिक्त उनके आँगन में चल रही सामूहिक रसोई में 3,500 लोगों का खाना तैयार हो रहा था| रैनबसेरे के कर्मियों का आंकलन है की यहाँ कुल 9000 लोग फंसे हुए हैं| अब सामूहिक रसोई बंद हो जाने के बाद यहाँ डीएम के दफ्तर से पका हुआ खाना आ रहा है| लेकिन, शनिवार के बाद मंगलवार को ही पहली बार खाना पहुंचा| खाने के अतिरिक्त अन्य सुविधाओं के अभाव से भी मज़दूरों की बदहाली बढ़ रही है| यहाँ रुके हजारों लोग नदी के गंदे पानी में नहा रहे हैं| छाँव के लिए मात्र यौन नदी पर बना एक पुल है, जिसके नीचे सटी हुए चादरों पर मज़दूर बसेरा कर रहे हैं| पीने के पानी के लिए वहां से गुज़र रही एक पाइप की सुराग से बह रहे पानी से ही गुज़ारा चल रहा है| पास ही में कचड़े और मलबे के ढेरपड़े हैं| स्वास्थ्य और सफाई की देखभाल के कोई ज़रिए मौजूद नहीं है|

दिल्ली सरकार ने कुछ अन्य मज़दूरों के ठहरने का किया इंतज़ाम: कहा खाने और आश्रय की कोई कमी नहीं है

बुधवार को दिल्ली मुख्य मंत्री ने घोषणा की कि सरकार यमुना घाट पर फंसे सभी मज़दूरों के लिए वैकल्पिक आश्रय का इंतज़ाम करेंगे| इनमें से 80 लोगों को कश्मीरी गेट के चाबी गंज ले जाया गया, व अन्य 535 लोगों की पहचान कर के 20 बसों में रोहिणी, भलस्वा, घेवरा व विभिन्न अन्य जगाहों पर स्कूलों में रोकने का इंतज़ाम किया गया है| इसके बावजूद भी यह तादात वहां उपस्थित हज़ारों मज़दूरों के मुकाबले कुछ भी नहीं है|

वाराणसी से आंध्रा, केरल, तमिल नाडू और कर्नाटका जाने के लिए निकल रहे तीर्थ यात्री

गांव वापस लौटने का नहीं हुआ है इंतेज़ाम – असमर्थता या राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव

महानगरों में फंसे मज़दूरों की हताशा लॉकडाउ की अवधी बढ़ाने पर और भी बढ़ गयी है और विघिन्न जगाहों पर मज़दूर विस्फोटक, असंगठित प्रदर्शनों में सड़कों पर उतरें हैं| किन्तु इसका जवाब सरकार द्वारा कोई सकारात्मक कदम से नहीं बल्कि पुलिस की लाठियों से दिया जा रहा है| किन्तु, दूसरी और वाराणसी में दक्षिण भारत से आये तीर्थ यात्रीयों को वापस घर पहुंचाने के लिए फसे तीर्थ यात्रियों के लिए बसों का इंतज़ाम कराया गया है, व उन्हें प्रशासनिक अनुमति और सहयोग भी मिला है| हालांकि, तीर्थ यात्रियों के आवागमन के लिए भी उनसे 4000 की मोटी रकम वसूली जा रही है और बसों में चढ़ने वालों की कोई थर्मल चेकिंग या उनके बीच दूरी बनाए रखने का कोई इंतज़ाम नहीं किया गया है| बदहाल जनता की अलग अलग श्रेणी के लिए सरकार की अलग अलग नीतियों का यह बहुमूल्य उदहारण है|

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