लॉकडाउन : बांद्रा में हजारों प्रवासी मज़दूरों का दर्द उभरा

बांद्रा स्टेशन पर इकट्ठा हुए हजारों प्रवासी, कहा- हमें घर जाना है

कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच बगैर तैयारी हुए लॉकडाउन से प्रवासी मज़दूरों का संकट लगातार गहराता जा रहा है। आज 21 दिन बाद लॉकडाउन खुलने की उम्मीद के बीच मुंबई में बांद्रा रेलवे स्टेशन पर हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों की भीड़ इकट्ठा हो गई। वे अपने-अपने घर जाने देने की माँग कर रहे थे। एकबार फिर पुलिस ने बर्बर लाठी चार्ज का सहारा लिया।

दरअसल, कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए पिछले 25 मार्च से अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लागू होने के बाद से दिहाड़ी मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। रोजी-रोजगार छिनने और भुखमरी की स्थिति के बीच उन्हें तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में वे अपने मूल स्थानों को वापस जाना चाहते हैं।

मिडिया का ख़तरनाक सांप्रदायिक एजेंडा

इस संकटपूर्ण स्थिति में भी देश की मिडिया एकबार फिर सांप्रदायिक एजेंडा उछालती नजर आई। भीड़ बांद्रा रेलवे स्टेशन पर जुटी थी, और मिडिया नजदीक की एक मस्जिद को दिखलाती रही। यही नहीं, कई तो जानबूझकर कुछ मुस्लिम नाम उछाल कर शातिराना हरकतें करने से बाज नहीं आईं। मानवीय त्रासदी के बीच मिडिया का यह घिनौना खेल समाज के ऊपर लगातार एक बदनुमा दाग बना हुआ है।

ट्रेनों के संचालन की अफवाह उड़ी

ख़बर के मुताबिक मंगलवार को फिर से ट्रेनों का संचालन शुरू होने की अफवाह के बाद आसपास के इलाकों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों का हुजूम महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में बांद्रा स्टेशन की तरफ पहुँच गया। जहाँ पता चला कि अब तीन मई तक रेलवे संचालन बंद रहेगा। इस बात से उनमें दुख, क्षोभ और आक्रोश पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि वे भूखे पेट रह रहे हैं, उन्हें उनके घर जाने दिया जाए।

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फिर हुआ बर्बर दमन

ख़बर के मुताबिक करीब 1000 दिहाड़ी मजदूर अपराह्न करीब तीन बजे रेलवे स्टेशन के पास मुंबई उपनगरीय क्षेत्र बांद्रा (पश्चिम) बस डिपो पर एकत्रित हो गए और सड़क पर बैठ गए। भीड़ हटाने के बहाने पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज का सहारा लिया। जिससे काफी लोग घायल हुए हैं।

ये अधिकतर प्रवासी मज़दूर थे, जो पास के पटेल नगरी इलाके में झुग्गी बस्तियों में किराए पर रहते हैं। वे परिवहन सुविधा की व्यवस्था की माँग कर रहे हैं ताकि वे अपने मूल नगरों और गांवों को वापस जा सकें। वे मूल रूप से पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के रहने वाले हैं।

भीड़ एकत्रित कैसे हुई?

सवाल यह है कि जब लॉकडाउन से लगभग सारा जनजीवन ठप्प है, चप्पे-चप्पे पर पुलिस मौजूद है, तो फिर अचानक इतनी बड़ी संख्या एकत्रित कैसे हो गई? हमेशा यही होता है कि अपनी नाकामी को छुपाने के लिए प्रशासन मज़दूरों को निशाना बनता है।

लॉकडाउन बढ़ा, लेकिन प्रवासी मज़दूरों के लिए कुछ नहीं

उल्लेखनीय है कि 14 अप्रैल 2020 को 21 दिन का लॉकडाउन पूरा होने के बाद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आने वाले 3 मई तक दोबारा लॉक डाउन की घोषणा कर दी। इससे बेरोजगार-बेघरबार प्रवासी मज़दूरों की समस्याएँ और बढ़ गईं हैं। जहाँ पीएम की चिंता उद्योगपतियो के प्रति साफ़ है, वहीं मज़दूर, विशेष रूप से संकटग्रस्त प्रवासी मज़दूरों के लिए किसी योजना की बात तो दूर, शब्दों में भी कोई चिंता नहीं दिखी।

ध्यान तलब रहे कि लॉकडाउन के पहले चरण की घोषणा के बाद दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर भी हज़ारों की संख्या में प्रवासी एकत्रित हो गए थे। हजारों मेहनतकश महिलाओं-बच्चों व सामानों के साथ यातनाएं झेलते पैदल ही विकट यात्राओं पर निकाल पड़े थे। लेकिन सरकार ने कोई बंदोबस्त नहीं किया। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी उन्हें राहत देने से मना कर चुकी है।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री का बयान

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री आदित्य ठाकरे ने ट्वीट कर बताया कि बांद्रा स्टेशन के बाहर फिलहाल हालात सामान्य हैं और भीड़ को हटा दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि बांद्रा में जुटी भीड़ हो या सूरत में भड़की हिंसा, इसके लिए केंद्र सरकार ज़िम्मेदार है जो प्रवासी मज़दूरों के घर वापस लौटने की व्यवस्था नहीं कर पा रही है। प्रवासी मज़दूर शेल्टर या खाना नहीं चाहते, वो अपने घर जाना चाहते हैं।

संक्रमण में महाराष्ट्र अव्वल

कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण के कुल 2337 मामले हैं। यहाँ कोरोना की वजह से अब तक 160 लोगों की मौत हो चुकी है।

देशभर में कोरोना संक्रमण के मामले कुल 10815 हैं और मरने वालों का आंकड़ा 353 पहुँच गया है।

इस संकट के बीच मज़दूर आबादी के लिए भूखमरी का संकट ज्यादा गहरा है।

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