श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी सुधारों पर रोक ना लगने से की जाएगी कार्यवाही: 12 मज़दूर संगठनों ने केंद्रीय श्रम मंत्री को लिखा पत्र

कोरोना के हवाले से 12 घंटे कार्यदिवस के साथ ही सरकार ने दिया अन्य तीन श्रम संहिताओं को भी लागु करने का प्रस्ताव

13 अप्रैल 2020 को देश के 12 मज़दूर संगठनों और यूनियनों ने केंद्रीय श्रम मंत्री, भारत सरकार को चोरी छिपे तरीके से विभिन्न श्रम कानूनों में किये जा रहे संशोधन पर विरोध प्रकट करते हुए पत्र लिखा है| यह संगठन देश भर में विभिन्न उद्योगों में कार्यरत मज़दूरों का प्रतिनिधित्व करते हैं| इनमें न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव, आल इंडिया फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस(न्यू), ईसीएलटीएसएयु, इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस, इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (सर्वहारा), इंकलाबीमज़दूर केंद्र, जनसंघर्षमंच-हरियाणा, मज़दूर सहयोग केंद्र – उत्तराखंड, न्यू डेमोक्रेटिक लेबर फ्रंट, स्ट्रगलइंग वर्कर्स कोआर्डिनेशन कमेटी-पश्चिम बंगाल, ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ़ इंडिया शामिल हैं|  

अलोकतांत्रिक तरीके से किये जा रहे हैं श्रम कानूनों में परिवर्तन

कोरोना का हवाला देते हुए भारत सरकार फिलहाल अध्यादेश या कार्यकारी आदेश के माध्यम से संसद में रखी गयी तीन श्रम संहिताओं को लागू करने की प्रक्रिया में है|  इनमें औद्योगिक संबंध संहिता 2019, सामाजिक सुरक्षा 2019 पर संहिता और व्यावसायिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और कार्य शर्तें संहिता 2019 शामिल हैं। इस प्रस्ताव के साथ ही सरकार ने काम के घंटे को 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे प्रतिदिन करने का प्रस्ताव भी रखा है। अध्यादेश या कार्यकारी आदेश के माध्यम से ऐसे बड़े परिवर्तन देश की पूरी जनतांत्रिक विधायकी प्रणाली को कमज़ोर करते हैं| संगठनों के पत्र ने यह भी कहा कि इन संहिताओं को तैयार करने का तरीका पहले से ही बेहद अजनतांत्रिक रहा है — ट्रेड यूनियनों की भारी बहुमत ने उपरोक्त संहिताओं पर अपनी आपत्तियां व्यक्त की हैं। इन संहिताओं को पारित करने में ना ही समाज के विभिन्न हिस्सों से व्यापक परामर्श किया गया, और न ही मौजूदा त्रि-पक्षीय मंचों में इस पर चर्चा हुईं। सरकार द्वारा प्रयोग की जा रही वेब आधारित परामर्श प्रक्रिया पर भी पत्र में आपत्ति जताई गइ।    

मज़दूर वर्ग के लिए घातक होंगे इन संहिताओं के प्रावधान:

हो रहे परिवर्तनों के महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करते हुए संगठनों ने अपने पत्र में कहा कि:

औद्योगिक संबंध संहिता वर्तमान में हमारे संविधान में निहित संघ की स्वतंत्रता के अधिकार को पूरी तरह से खोखला करती है| यह  नियोक्ताओं के लिए अपने स्वयं के ट्रेड यूनियनों को बढ़ावा देने के लिए कानूनी रास्ता प्रशस्त करती है और सामूहिक सौदेबाजी की संभावना को समाप्त करता है। यह संहिता हड़ताल कार्रवाई की संभावना को काफी हद तक समाप्त कर देती है जो सामूहिक सौदेबाजी प्रक्रिया का एक वैध हिस्सा है। 

सामाजिक सुरक्षा संहिता, भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा के मौजूदा प्रावधानों को कमज़ोर करती है| इसमें वर्तमान में नियोक्ता का इन निधिं में योगदान सुनिश्चित करने वाली विधायी गारंटी भी शमील हैं।  यह पीएफ या ईएसआई ना पाने वाले श्रमिकों को शामिल करते हुए ‘सभी श्रमिकों’ को ‘सार्वभौमिक’ सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का दावा करति है| किन्तु, जब ताल कानूनी तौर पर सरकार वित्तीय प्रबंध के साथ विशिष्ट स्वास्थ्य देखभाल और पेंशन लाभ नहीं जारी करती तब तक यह दावे केवल नाम मात्र रहेंगे।

व्यावसायिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और कार्य की शर्तें संहिता 2019 स्वास्थ्य और सुरक्षा के विभिन्न शर्तों को कमज़ोर करती है, वो भी एक ऐसे समय में जब कार्यस्थल दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं| साथ ही यह ठेका मज़दूर संबंधी घटनाओं में प्रमुख नियुक्ता की जिम्मेदारी को खत्म करता है जिससे यह पहले से व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त  ठेका प्रणाली को वैध बनाती है। 

संगठनों का यह भी कहना है कि वेतन संहिता 2019 के साथ यह तीन प्रस्तावित संहिताएँ विभिन्न परिभाषाओं और अधिकार क्षेत्र के कारण बेहद जटिल और अंतरविरोधी हैं| इनके परिणामवश मज़दूरों के लिए एक और कानूनी निवारण पाना और भी लम्बा और कठिन बनेगा, और दूसरी बेलगाम शोषण और भी बढ़ेगा|

कोविड 19 लॉकडाउन के बहाने, मालिकों का मुनाफ़ा और मज़दूरों की बदहाली

कोविड-19 महामारी की रोकथाम की दिशा में सरकार द्वारा लागु किया गया लॉकडाउन बड़े नियोक्ताओं के लिए लाभ और मज़दूरों के लिए बर्बादी का सबब बन रहा है| यूनियन प्रतिनिधि बताते हैं कि “ देश के ठेका श्रमिकों के एक बड़े हिस्से को मार्च 2020 के महीने के लिए अगर मिली भी है तो केवल आंशिक मजदूरी मिली है। इसमें फ्रंटलाइन वर्कर्स भी शामिल हैं जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान काम करना जारी रखा है। सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र, दोनों में ही ठेकेदारों ने मज़दूरों का भुगतान नहीं किया है। लगभग आधी कामकाजी आबादी जो प्रवासी हैं और आकस्मिक और दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं, उन्हें इस पिछले एक महीने से बिल्कुल भी मजदूरी नहीं मिली है।“ यह तब जब नियोक्ता राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत भारत सरकार के आदेशों से बंधे हुए हैं। इन परिस्थितियों पर रौशनी डालते हुए पत्र इस वर्तमान समय को  हमारे देश में कानूनी प्रावधानों के ‘अनुपालन’ का प्रभावकारी मापदंड बताता है।

मज़दूर संगठनों का कहना है कि इन श्रम संहिता को आगे लाने का भारत सरकार का कोई भी कदम “देश की मेहनतकश आबादी के ख़िलाफ़ बल प्रयोग, व सीधे तौर पर नियोक्ताओं के पक्षधर एक अलोकतांत्रिक कदम माना जाएगा|” संहिताओं के लागू होने की सूरत में संगठनों ने चेतावनी दी की वे “अन्य ट्रेड यूनियनों के साथ, हमारे पास उपलब्ध सभी लोकतांत्रिक साधनों के माध्यम से इन कार्यों का विरोध” करेंगे|

1586775477536_Labour-Codes-Joint-Memorandum-13-April-2020

भूली-बिसरी ख़बरे