13 अप्रैल : संघर्ष और दमन का प्रतीक दिन

जलियाँवाला बाग काण्ड (1919) – पंतनगर गोली काण्ड (1978)

13 अप्रैल को बैसाखी का पर्व होता है। लेकिन भारत की गुलामी और आजादी, दोनो दौर के लिए यह भयावह दमन का प्रतीक दिन है। यह ऐसी तारीख है, जिसे अंग्रेज व देशी दोनो हुक्मरानों ने भयावह खूनी तारीख में तब्दील कर दिया था। एक गोरे अंग्रेजों द्वारा निहत्थी जनता के कत्लेआम का उदाहरण है, तो दूसरा गोरों की काली औलादों द्वारा मज़दूरों की नृशंस हत्या का मामला है।

जहाँ गुलाम भारत में सन 1919 में पंजाब के जलियाँवाला बाग में आम जनता दमन का शिकार हुई थी, वहीँ आज़ाद भारत की ज़ालिम सत्ता द्वारा सन 1978 में मज़दूरों को खून की दरिया में डुबो दिया गया था।

जलियाँवाला बाग – 1919 का वह काला दिन

देश की आजादी की लड़ाई में 13 अप्रैल 1919 को क्रूर हत्यारे जनरल डायर ने वह हत्याकांड रचा, जिसे इतिहास में जलियांवाला बाग काण्ड के नाम से जाना जाता है। डायर ने 15 मिनट में निहत्थी भीड़ पर 1650 राउंड गोलियां चलवाई, जिसमे सैकड़ों जनता मारी गयी और हजारों जख्मी हुए।

बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई थी। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहाँ जा पहुँचे थे। जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे तभी डायर ने बाग से निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिए। बाग में जाने का जो एक रास्ता खुला था जनरल डायर ने उस रास्ते पर हथियारबंद गाड़ियां खड़ी करवा दी थीं।

बिना किसी चेतावनी के उसने गोलियां चलवानी शुरु कर दी। गोलीबारी से डरे मासूम बाग में स्थित एक कुएं में कूदने लगे। गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे।

बेशर्म डायर का बयान-

बेशर्म डायर ने हंटर कमिशन के सामने कहा कि “मैंने कोई चेतावनी नहीं दी, सीधे गोली चलवाई। शहर में मार्शल लॉ लगा था। मुझे लगा कि मेरे आदेशों का उल्लंघन हुआ है। अगर मेरे आदेशों का अनुपालन नहीं होगा तो मैं तुरंत ही गोली चलाउंगा।”

शहीद उधमसिंह ने लिया बदला

इस घटना के प्रतिघात स्वरूप सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ ड्वायर को गोली मारकर बदला लिया। उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

पन्तनगर – मज़दूरों के कत्लेआम का भयावह दिन

आजाद भारत में, 13 अप्रैल 1978 काले अंग्रेजों के दमन का प्रतीक दिन है। तब उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखण्ड) के पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय में मज़दूरों के जुलूस पर भयानक गोलीकाण्ड हुआ था। यह आपात काल के काले अंधेरे दौर (1975-77), जिसे दूसरी आजादी कहते हैं, के बाद का दौर था।

मामला यूनियन बनाने और हक़ के लिए शान्तिपूर्ण जुलूस निकालने का था। यह फार्म मज़दूरों की पहली यूनियन थी, जो इलाके के फॉर्मरों के लिए अपाच्य थी, और मज़दूरों को सबक सिखाना था।

तांडव का नंगा खेल

गोलीबारी और संगीनों से गोदकर बेगुनाहो को मारने का यह ताण्डव तब तक चलता रहा, जब तक तमाशा देख रहे विश्वविद्यालय के छात्र अपने हॉस्टलों से बाहर निकलकर बेगुनाह मज़दूरों के पक्ष में खड़े होकर इसके खि़लाफ मोर्चा नहीं संभाल लिया। इसके बावजूद निकट स्थित ‘के’ फार्म के गन्ने की खेत में न जाने कितने मज़दूरों को डालकर आग के हवाले कर दिया गया और फिर उसे हैरो से जोत दिया गया।

उसी बीच लोग ‘के’ फार्म की ओर भागे, ताकि आग रोकी जा सके, लोगों को बचाया जा सके। इधर रास्ता साफ देख कर चौराहे पर पर बिखरे जिंदा व मुर्दा मज़दूरों को एक साथ ट्रकों में भर कर पीएसी की फायरिंग स्क्वैड ठिकाने लगाने चली गई। सड़कों पर मौत का सन्नाटा छा गया। सैकड़ों लोग मारे गये और न जाने कितने लापता हो गये।

गोलीकाण्ड की वह जगह शहीद स्थल बन गई और मज़दूर हर साल उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।

यह है चीखती सच्चाई!

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