गया के अस्पताल में डॉक्टर द्वारा क्वारंटाइन में मरीज़ का बलात्कार

अस्पातल से घर लौटने के कुछ दिनों में पीड़िता की हुई मौत

गया जिले में हुई एक दिल दहला देने वाली घटना में, अस्पताल में डॉक्टर द्वारा हुए दुष्कर्म के बाद गर्भपात से गुज़र रही एक महिला की अत्याधिक ख़ून बहने से मौत हो गयी है| अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल अस्पताल के आपातकाल में 27 मार्च को भर्ती हुई यह महिला कोरोना के कुछ लक्षण दिखा रहीं थीं, जिसके हवाले उन्हें क्वारंटाइन में डाल दिया गया था| मृत पीड़िता की सास का कहना है की क्वारंटाइन की स्थिति में एक डॉक्टर उनकी बहु के साथ गलत बर्ताव करता था, जिसकी शिकायत उनकी बहु ने उनसे बतायी थी| सास ने बहु का बयान दोहराते हुए बताया की अस्पताल में मिलने पर बहु ने उन्हें कहा था कि, “मां मुझे यहा से निकाल दीजिये नहीं तो मै मर जाऊंगी”| किन्तु कोरोना का टेस्ट ना होने तक यह गुहार किसी के द्वारा नहीं सुनी गयी| महिला ने अस्पताल के गार्ड से भी इस बात की शिकायत की थी, जिसके जवाब में गार्ड ने “इज्ज़त” का हवाला देते हुए मामले को रफ़ादफ़ा कर दिया| कोरोनो टेस्ट नेगेटिव आने पर घर लौटने के बाद भी महिला बेहद डरी सहमी रह रही थी और उसने फिर से अपनी सास को बताया की अस्पताल में टीका लगाने वाले डॉक्टर ने उसके साथ दुष्कर्म किया है| अस्पताल से निकलने के अगले दिन ही अत्यधिक खून बहने से उसकी मौत हो गयी| महिला हाल ही में अपने पति के साथ लुधियाना से वापस गया लौटी थीं|

पुलिस की चल रही है कार्यवाही

प्रकरण में मृत पीड़िता की सास का बयान आने के बाद पुलिस ने कार्यवाही शुरू कर दी है और ऍफ़आईआर दर्ज किया है| अस्पताल प्रबंधन ने बताया है की उनकी आंतरिक जांच प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जिसका नतीजा आने पर आरोपी पर कार्यवाही होगी| अस्पतालों, जेलों इत्यादि संदर्भों में जहां महिला एक प्रकार की हिरासत या पाबंदी में है, वहां की किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति द्वारा उसके साथ बलात्कार, सामान्य बलात्कार से ज्यादा कड़ी सज़ा का पात्र होता है| किन्तु देश में न्याय व्यवस्था की कमजोरी के कारण सज़ा का दर मात्र 27% है|     

लॉकडाउन/क्वारंटाइन में बढ़ रही है यौन हिंसा की घटनाएं

साथ ही क्वारंटाइन जैसी परिस्थितियों में देश भर में महिलाओं और बच्चों के साथ यौन हिंसा के प्रकरण की संख्या बढ़ी है| ऐसे में यह घटनाएं कोरोना से निपटने हेतु लिए गए आपातकालीन सुरक्षा प्रावधानों के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं| क्या जनता की सुरक्षा के लिए क्वारंटाइन का कदम पर्याप्त है, या सरकार को इसके साथ ही ख़ास सामाजिक परिस्थिति को देखते हुए समाज के अलग अलग हिस्सों के लिए कुछ ख़ास सावधानी बरतने की ज़रुरत है?

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