लॉकडाउन के नाम पर पुलिस बर्बरता में हुई एक और मौत

फाइल फोटो: कोरोना लॉकडाउन के तहत चल रह पुलिस दमन

स्थानीय संगठनों ने उठाई आवाज़: मध्यप्रदेश सरकार और पुलिस कर रही है कानूनों का उल्लंघन

मध्यप्रदेश के धार जिले में कोरोनो लॉकडाउन में की जा रही पुलिस बर्बरता ने एक औ जान ली| टीबू मेडा, गुजारी ग्राम के आदिवासी परिवार से आते हैं| शनिवार 4 अप्रैल को सुबह 7 बजे से 9 बजे के समय में मिली छूट के दौरान ज़रूरी राशन की खरीदारी करने वे बाज़ार गए| किन्तु, अचानक और बिन वजह ही मध्यप्रदेश पुलिस नें बाज़ार में इक्कट्ठा लोगों पर बर्बर लाठी चार्ज किया| उनके परिवार वालों के सामें टीबू को दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया जिसमें थाना प्रभारी राज कुमार यादव सबसे आगे रहे| पुलिस की इस पिटाई में टीबू के सर पर आई गहरी चोट के कारण उनकी मौत हो गयी| टीबू के परिवार द्वारा पुलिस अधीक्षक से एफ.आई.आर दर्ज करने की आवेदन के बावजूद, पुलिस द्वारा कोई कदम नहीं लिया गया है| स्थानीय संगठन जागृत आदिवासी दलित संगठन ने भी विषय पर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है|

टीबू मेडा के बेटे राजू द्वारा लिखी गयी राज्यपाल को याचिका

जागृत आदिवासी दलित संगठन द्वारा दी गयी विज्ञप्ति के अनुसार:

“प्रशासन ने मामले से हाथ साफ़ करने की कोशिश में टीबू की मौत की वजह को हार्ट अटैक बताया था| मौके पर टीबू के शरीर के चोटों को देखकर धरमपुरी के विधायक श्री पांचीलाल मेडा ने स्वयं स्वीकार किया है कि चोटों को देख कर सांफ है कि वे ही मौत का कारण कार्यवाही के दौरान लगी चोंटे है|”

संगठन ने तुरंत एफ.आई.आर दर्ज करने, दोषी पुलिसकर्मियों को भारतीय दंड सहिता के धाराओं के साथ गिरफ्तार कर निलंबित करने, तथा अत्याचार अधिनियम के प्रावधानों के धाराओं के अनुसार तत्कालीन कार्यवाही की मांग की है| संगठन द्वारा टीबू के परिवार को एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उचित मुआवज़ा भी दिए जाने की मांग गई है| महेश्वर की विधायक डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ एवं धरमपुरी विधायक श्री पंचीलाल मेडा ने भी इस विषय पर पृथक रूप से मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर मध्य प्रदेश सरकार से दोषी पुलिसकर्मियों पर कठोर कार्यवाही करने की मांग की है|

पुलिस खुद कर रही है कानूनों का उलंघन: सम्मानजनक जीवन है हर नागरिक का मौलिक अधिकार

पुलिस बर्बरता पर रोक के लिए देश में कुछ कानून व नियमावली तो उपस्थित हैं, किन्तु जनता में लाचारी व जानकारी के अभाव और पुलिस, न्याय और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के कारण कम ही मौकों में पुलिस दमन पर कोई कार्यवाही होती है| पुलिस द्वारा मामले को दबाने की कोशिश में ऍफ़आईआर ना दर्ज करना साफ़ तौर से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उलंघन है जिनके तहत किसी भी अपराध की सूचना मिलने पर ऍफ़आईआर दर्ज करना पुलिस कर्मी के लिए अनिवार्य है| कानूनी प्रावधान के मुताबिक़, ऐसा ना करने पर खुद पुलिस कर्मी के ऊपर कर्र्यवाही की जानी चाहिए| वहीँ, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की गाइडलाइन के मुताबिक़ “हर ऐसे घटना जिस में पुलिस पर किसी संज्ञान योग्य अपराध का आरोप है, उसमें एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य है” । 2010 में इसे संशोधित करके जोड़ा गया कि पुलिस कार्यवाही में हर मौत की सूचना 48 घंटे के अंदर आयोग को दी जानी चाहिए|

पुलिस बर्बरता पर लगानी होगी लगाम

जानलेवा हमलों के अतिरिक्त भी कोविड लॉकडाउन के तहत पुलिस विभिन्न प्रकार के दमन चला रही है| लाठीचार्ज और पिटाई से ले कर मज़दूरों को मुर्गा बनवाना, सड़क पर घुटनों के बल चलना इत्यादि की ख़बरें लगातार आती रही हैं| लॉकडाउन लागु करने के लिए सरकार ने धारा 144 जारी किया है जिसके तहत 4 से अधिक लोगों के सार्वजनिक स्थान में इक्कठा होने अपर रोक है, विभिन्न महामारी कानूनों के तहत भी सड़क पर आ रहे लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा गिरफ्तार करने की कानूनी इजाज़त है| लेकिन यह साफ है की पुलिस खुद किसी कानून के प्रतिबद्ध नहीं है|

पुलिस बर्बरता के कारन हुई मौतों की संख्या लॉकडाउन के हर बीतते दिन के साथ बढ़ रही है| पुणे में एम्बुलेंस चालक, उत्तरप्रदेश में गांव वापस लौटा प्रवासी मज़दूर, बंगाल में दूध लेने निकला ग्रामीण, यह इस कड़ी में मात्र कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी खबर मीडिया सुर्ख़ियों में आई है|

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