इंसानी जज़्बे और जीवटता की मिसाल है “मांझी : द माउंटेन मैन”

सार्थक सिनेमा : आइए, बेहतरीन फिल्मों से अपने को जोड़ें…

सकारात्मक फ़िल्में वे होतीं हैं, जो शुष्क जीवन में रस घोल सकें, ज़िन्दगी की सच्चाईयों से रू-बा-रू करा सकें और मनोरंजन के साथ आशा, उम्मीद और मानवता के प्रति विश्वास पैदा कर सकें। …सार्थक फिल्मों से परिचय कराने की इस कड़ी में प्रस्तुत है- फिल्म “मांझी : द माउंटेन मैन” के बारे में… साथी अजीत श्रीवास्तव के साथ…

मांझी : द माउंटेन मैन

एक गाँव जहाँ आज भी लोगों को बुनियादी जरूरतों के लिए मशक्कत करना पड़ रहा है, एक समाज जिसमें सबसे निचले पायदान पर खड़ा आदमी जानलेवा हालत में खुद को महज़ ज़िंदा रखने की जद्दोजहद में ज़िंदगी गुज़ार रहा है, एक सिस्टम जो आज भी उतना ही संवेदनहीन और उदासीन है, एक पहाड़ जो एक गाँव और उसकी बुनियादी जरूरतों के बीच बाधा बनकर सीना ताने खड़ा है और एक अकेला आदमी जो सिर्फ अपने अदम्य साहस के बल पर एक छेनी हथौड़े के सहारे इस पहाड़ से 22 साल लगातार जूझता है और अंततः पहाड़ को तोड़, उसमें से रास्ता निकाल देता है।

इंसानी जज़्बे और जीवटता की मिसाल दशरथ मांझी के जीवन पर बनी बेहद खूबसूरत फिल्म “मांझी : द माउंटेन मैन” सिस्टम से लड़कर अपनी राह बनाने वाले इसी जुझारू इंसान की कहानी है।

यकीन नहीं होता कि सचमुच में एक आदमी था जिसने सच में एक पहाड़ को काट कर रास्ता बना दिया था। पर दशरथ मांझी का गाँव और उनके अदम्य साहस का गवाह वह पहाड़ आज भी उनकी कहानी कहने के लिए मौजूद है। 2015 में आई यह फिल्म उनके जीवन से प्रेरित है।

दशरथ मांझी मुसहर जाति से थे, जो कि आज भी देश के सबसे वंचित और उत्पीड़ित तबकों में से एक है। गया के पास स्थित उनके गाँव के लोग इलाज और दूसरी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वजीरगंज नामक कस्बे पर आश्रित थे और वजीरगंज जाने के लिए उन्हें या तो पहाड़ पर चढ़कर उसे पार करना पड़ता था, या फिर पहाड़ का लंबा चक्कर काटकर जाना पड़ता था। दशरथ की पत्नी, जो कि गर्भवती थीं, इस पहाड़ को पार करने के दौरान दुर्घटना में चोटिल हुईं और उनकी मृत्यु हो गई।

इस घटना से उपजे गुस्से और क्षोभ में दशरथ उस पहाड़ को तोड़ने में जुट जाते हैं। 1960 से लेकर 1982 तक का 22 साल का अरसा बिना रुके निरंतर उस पहाड़ से जूझने में गुजरता है और अंततः दशरथ 360 फीट लंबा, 25 फीट गहरा और 30 फीट चौड़ा रास्ता बना देते हैं।

जब एक इंसान अकेला पहाड़ तोड़ने निकल पड़ता है तो ये समाज की, सिस्टम की और सरकार की विफलता का भी शिखर होता है। फिल्म इसी मूल थीम के इर्द गिर्द घूमती है।

दशरथ मांझी की भूमिका निभा रहे नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी जब पहाड़ से बातें करते हैं, जब पानी खोज लेने के बाद पहाड़ से स्नेह जताते हैं, जब वे रात को आसमान को देख खुदा को ललकारते हैं, तो यह फिल्म उन अमानवीय हालात के साथ-साथ इंसानी जिजीविषा और साहस का भी दस्तावेज़ बन जाती है।

फिल्म का नायक निराश होता है, घायल होता है, उसे पागल समझा जाता है और उसका मज़ाक बनाया जाता है, पर वह हार नहीं मानता। हार न मानने का यह जज़्बा ही इस कहानी के केंद्र में है और निर्देशक ने इसके साथ न्याय किया है। सबसे बढ़कर नवाज़ की अदाकारी है, जिसने इस दृश्यों को सजीव और विश्वसनीय बनाया है।

कोई भी फिल्म या रचना बिलकुल परफेक्ट नहीं होती, यह फिल्म भी परफेक्ट नहीं है, पर इसे देखते हुए आपकी सोच का विस्तार होता है। आप इंसान के अंदर की उस जिजीविषा के दर्शन करते हैं जिसने इंसान को गुफाओं से निकाल कर यहाँ तक पहुंचाया। और साथ ही आप उस निर्मम और उदासीन सिस्टम को भी देखते हैं, जिसके लिए इंसानी जान और उसकी तकलीफ़ों की कोई कीमत नहीं।

एक लड़ता हुआ इंसान किस तरह खूबसूरत लगता है और किस तरह निर्जीव चीजों में जान डाल कर उन्हें भी खूबसूरत बना देता है, ये महसूस करने के लिए एक बार इस फिल्म को जरूर देखा जाना चाहिए।

-अजीत श्रीवास्तव

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