निराशा के दौर में उम्मीद देती फिल्म- “मैं आज़ाद हूँ”

फिल्म आम आदमी की बात करती है और बताती है कि इस दुनिया की हर चीज के पीछे मेहनतकश का पसीना है!

रुपहले पर्दे की फ़िल्में मनोरंजन का साधन मात्र नहीं होतीं, बल्कि ज़िन्दगी के फलसफे को भी उजागर करती हैं। कुछ फ़िल्में रूमानियत पैदा कराती हैं, कुछ कल्पनालोक का विचरण कराती हैं, तो कुछ भद्देपन का प्रदर्शन मात्र होती हैं। लेकिन कुछ फ़िल्में कला की ख़ूबसूरती के साथ ज़िन्दगी की हकीक़त को बयां करती हैं, उससे जूझने का जज्बा पैदा करती हैं…। मेहनतकश साथीयों के लिए हम ऐसी कुछ फिल्मों से परिचित कराने का एक विनम्र प्रयास कर रहे हैं। साथी अजीत श्रीवास्तव हमारे इस प्रयास को साकार कर रहे हैं- “मैं आज़ाद हूँ” फिल्म के साथ…

मैं आज़ाद हूँ

90 के दशक में भारत में बनी लगभग हर फिल्म में नायक/नायिका रूमानियत से लबरेज सेट अप के भीतर काल्पनिक दुश्मनों से फिल्मी अंदाज में लड़ रहे थे। रुपहले परदे के बाहर असली ज़िंदगी में मौजूद समस्याओं, तकलीफ़ों, गुस्से और ज़िंदगी की जद्दोजहद को रुपहले परदे पर तीन घंटे के अंदर हीरो अपनी ढिशुम-ढिशुम के सहारे हरा दिया करता था और दर्शक अपने गुस्से और फ्रस्टेशन से कुछ समय के लिए मुक्त हो जाता था।

लेकिन 1989 में आई टीनू आनंद की फिल्म “मैं आज़ाद हूँ” इस लीक से थोड़ा हट कर थी। उस समय की दूसरी फिल्मों से अलग इस फिल्म की सामाजिक और राजनीतिक चेतना काफी स्पष्ट है। फिल्म का मूलभूत संदेश है कि जनता अपनी समस्याओं को लेकर एकजुट होकर विद्रोह कर सकती है, और इसको फिल्म बड़ी बारीकी से भविष्य के आंदोलनों का एक रूमानी खाका बुनती और पर्दे पर प्रस्तुत करती है।

फिल्म की कहानी एक अखबार से शुरू होती है, जिसे एक सेठ ने खरीद लिया है और अब उसे अपने अखबार में सनसनी चाहिए ताकि अखबार भी उसके दूसरे धंधों की तरह मुनाफा दे सके। अखबार में कालम लिखने वाली एक लेखिका अंतिम बार अपना कालम लिखते हुए एक काल्पनिक किरदार “आज़ाद” की रचना करती है, जो कि समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और दूसरी समस्याओं का भंडाफोड़ करते हुए घोषणा करता है कि इनके विरोध में वह 26 जनवरी को एक हास्पिटल की अधूरी बिल्डिंग से कूद कर आत्महत्या कर लेगा।

इस बिल्डिंग को वह प्रदेश में भ्रष्टाचार की सबसे ऊंची मीनार का नाम देता है। अब जैसा कि होना तय था, सरकार, प्रशासन और दूसरे अखबार किसी आज़ाद नाम के शख्स के अस्तित्व पर सवाल उठाने लगते हैं। पर अखबार का मालिक जिसे आज़ाद के जरिये मुनाफे के साथ-साथ अपने दूसरे हित भी सधते दिखाई देने लगते हैं, वह योजना बनाता है कि किसी गुमनाम शख्स को आज़ाद बना कर एक जलसे में पेश कर दिया जाये।

अमिताभ बच्चन ने इसी गुमनाम शख्स की भूमिका निभाई है। यह गुमनाम शख्स एक शहर से दूसरी शहर भटकता हुआ फिल्म में दिखाये गए “राजनगर” नाम के शहर में पहुंचता है और “आज़ाद” की भूमिका निभाने को तैयार हो जाता है। जलसे में इसकी हूटिंग होती है तो वह लिखा हुआ भाषण छोड़ कर आम आदमी की भाषा में आम आदमी के दुख और तकलीफ़ों की बात करता है। लोगों को इसकी बात बेहद पसंद आती है, और जनता के विभिन्न तबकों के परेशान लोगों की उम्मीदें आज़ाद से जुड़ जाती हैं।

हालांकि जलसे के बाद “आज़ाद” को शहर छोड़ कर चले जाना होता है, पर जिनकी उम्मीदें आज़ाद से जुड़ चुकी होती हैं, उन्हें छोड़ कर वह जा नहीं पाता और बाद में छात्रों, मजदूरों, किसानों के आंदोलनों में शिरकत करने लगता है। धीरे-धीरे उसका अपना व्यक्तित्व पीछे छूट जाता है और वह पूरी तरह “आज़ाद” के व्यक्तित्व में ही ढल जाता है।

फिल्म की खूबसूरती इसकी कहानी और संवादों में सतत बहती आम आदमी की पीड़ा, उसकी ज़िंदादिली और उसके संघर्षों की धारा में है। फिल्म आम आदमी की बात करती है कि कैसे इस दुनिया की हर इमारत, हर कारख़ाना और हर एक चीज के पीछे मेहनतकश का पसीना है और यह भी कि कैसे मेहनतकश ही उन चीजों से वंचित है और कोई भी मुसीबत या महामारी का पहला शिकार यही मेहनतकश होता है। कहानी काल्पनिक है, इसका सेटअप रूमानी है, पर प्रस्तुतीकरण और संदेश पूरी तरह वास्तविक हैं।

फिल्म में जब हड़ताल होती है, तो मज़दूरों के साथ किसान और छात्र जिस तरह जुड़ते हैं और जब आंदोलन के आगे बढ्ने पर लोगों में निराशा फैलने लगती है, तो किस तरह एक दूसरे के साथ जुड़ कर लोग एक दूसरे के दुखों को बांटते हैं और निराशा के दौर को झेलते हैं, पर्दे पर यह देखना उम्मीद देता है।

फिल्म यू-ट्यूब और Sony-Liv पर मौजूद है, और अगर आपने अब तक न देखी हो तो देख डालिए।

-अजीत श्रीवास्तव

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