लॉकडाउन : श्रमिकों के वेतन के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब माँगा, 7 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल एक जनहित याचिका में कहा गया है कि देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से रोज़गार गंवाने वाले लाखों कामगारों के लिए जीने के अधिकार लागू कराने की आवश्यकता है. सरकार के 25 मार्च से 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद ये कामगार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने कोरोना वायरस महामारी की वजह से 21 दिन के लॉकडाउन के दौरान पलायन करने वाले कामगारों के जीने के मौलिक अधिकार को लागू कराने और उनके पारिश्रमिक के भुगतान के लिए दायर याचिकाओं पर शुक्रवार को केंद्र को नोटिस जारी किया.

जस्टिस एल. नागेश्वर राव और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने दो नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की याचिकाओं पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के दौरान केंद्र को नोटिस जारी किया. इस मामले में न्यायालय अब सात अप्रैल को आगे सुनवाई करेगा.

जनहित याचिका दायर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और अंजलि भारद्वाज की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यह जानकारी दी.

इन याचिकाओं में कहा गया है कि देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से रोज़गार गंवाने वाले लाखों कामगारों के लिए जीने के अधिकार लागू कराने की आवश्यकता है. सरकार के 25 मार्च से 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद ये कामगार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

इन कार्यकर्ताओं ने दलील दी है कि लॉकडाउन की वजह से इन कामगारों के सामने उत्पन्न अप्रत्याशित मानवीय संकट को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को आपदा प्रबंधन कानून, 2005 के प्रावधानों के अनुरूप पर्याप्त उपाय करने होंगे.

याचिका के अनुसार, सरकार की इस अचानक घोषणा की वजह से कामगारों के पास कोई काम नहीं बचा, ऐसी स्थिति में पलायन करने वाले इन कामगारों को संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकार की रक्षा करने की आवश्यकता है.

याचिका में कहा गया है कि इस आदेश के बारे में कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी. इस वजह से देश भर में दहशत पैदा हो गई और तमाम प्रतिष्ठानों में काम करने वाले अथवा स्व-रोजगार से अपनी आजीविका कमाने वाले लाखों कामगार बेरोजगार हो गए. इस वजह से शहरों से बड़ी संख्या में कामगार अपने पैतृक शहरों की ओर पलायन कर गए.

याचिका में कहा गया है कि अचानक हुई इस घोषणा की वजह से बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, अंतरराज्यीय सीमाओं पर हजारों की संख्या में श्रमिक अपने-अपने घर जाने के लिए एकत्र हो गए. इतनी बड़ी संख्या में कामगारों के एकत्र होने की वजह से कोरोना वायरस के प्रसार होने का खतरा बढ़ गया.

याचिका के अनुसार, बड़ी संख्या में कामगारों के पलायन की वजह से महामारी फैलाने वाले इस संक्रमण से बचाव के लिए परस्पर दूरी बनाकर रखने के उपाय अस्त-व्यस्त हो गए और इसके बाद ही गृह मंत्रालय ने 29 मार्च को कामगारों के आवागमन पर प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए.

याचिका में कहा गया है कि गृह मंत्रालय के आदेश में नियोक्ताओं को पलायन करने वाले कामगारों को लॉकडाउन की अवधि का पारिश्रमिक देने और मकान मालिकों को इस अवधि का किराया नहीं लेने का निर्देश दिया गया है. इस आदेश में राज्य सरकारों को इन कामगारों के रहने और खाने-पीने का बंदोबस्त करने के लिए भी कहा गया है.

याचिका में यह भी कहा गया है कि गृह मंत्रालय के आदेश में दिए गए निर्देश के अनुरूप छोटे प्रतिष्ठानों या कारोबारियों से अपने ऐसे कामगारों को उनके ही कार्यस्थल पर पारिश्रमिक का भुगतान करने के लिए कहना व्यावहारिक नहीं है.

याचिका में कहा गया है कि लॉकडाउन की वजह से ये कामगार अपने कार्यस्थल तक नहीं जा सकते हैं और अनेक छोटे तथा मझोले कारोबारी अपना काम बंद करने के लिए मजबूर हो गए. इस वजह से ये नियोक्ता इन कामगारों को पारिश्रमिक देने की स्थिति में नहीं है. यही नहीं, इनमें से अधिकांश कामगार स्वरोजगार करते थे.

याचिका में दलील दी गई है कि इस लॉकडाउन ने दैनिक मजदूरों के सामने पैसे की गंभीर समस्या पैदा कर दी है. इसमें आगे कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास यह अधिकार है और उनका कर्तव्य है कि वे सभी दैनिक मजदूरों को वहीं पर पारिश्रमिक देने का निर्देश दें जहाँ इस समय वे रह रहे हैं.

द वायर से साभार

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