कोरोना संकट: मोदी सरकार नहीं बच सकती इन सवालों से ?

जल्दीबाजी में लिया गया निर्णय, संसाधनों और टेस्टिंग का अभाव

पिछले दिनों ‘मन की बात’ में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन की वजह से लोगों को हो रही परेशानी के लिए माफ़ी मांगी. उन्होंने कहा, “मैं सभी देशवासियों से दिल से माफ़ी मांगता हूं. मुझे लगता है कि आप मुझे माफ़ कर देंगे.”

उन्होंने कहा, “चूंकि कुछ फ़ैसले लेने पड़े जिससे आपके सामने तमाम मुश्किलें आ पड़ी हैं. जब मेरे ग़रीब भाइयों और बहनों की बात आती है तो वे सोचते होंगे कि उन्हें कैसा पीएम मिला है, जिसने उन्हें मुश्किलों में झोंक दिया है. मैं दिल की गहराई से उनसे माफ़ी मांगता हूं.”

क्या प्रधानमंत्री का माफ़ी मांगना काफ़ी है?

माफ़ी के बावजूद कई ऐसे सवाल अब भी हैं, जिनके जवाब ज़रूरी हैं. सरकार प्रवासी मज़दूरों को लेकर इस क़दर बेपरवाह क्यों थी? बड़े शहरों से गाँव और कस्बों की ओर पलायन तभी शुरू हो गया था जब प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए 24 मार्च की रात 8 बजे पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान किया था. लॉकडाउन के ऐलान में कहा गया कि यह रात 12 बजे से प्रभावी हो जाएगा. ऐसे में लोगों को खाने-पीने की चीज़ें और दवाएं लेने के लिए बमुश्किल कुछ घंटों का ही समय मिल पाया.

प्रवासी मज़दूर काम ठप्प हो जाने और बुनियादी चीज़ें नहीं मिलने की दिक्क़तों से जूझ रहे थे. लेकिन पीएम के भाषण में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं था कि कंस्ट्रक्शन और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर इससे कैसे निपटेंगे. कई मीडिया रिपोर्ट्स में ये बात सामने आई है कि भूख, बीमारी, ज़्यादा पैदल चलने की वजह से और सड़क हादसों में कई मज़दूरों की मौत हुई है. भारत में कोरोना वायरस संक्रमण से अब तक 35 लोगों की मौत हो चुकी है.

यह नामुमकिन है कि सरकार के पास बड़े शहरों में मौजूद प्रवासी मज़दूरों की आबादी के बारे में आँकड़े नहीं रहे होंगे. सरकार ने महामारी से लड़ने के लिए पश्चिमी देशों की देखादेखी यहां भी अचानक लॉकडाउन को लागू कर दिया. दूसरे देशों से तुलना करें तो भले ही वहां मेडिकल सुविधाओं, टेस्टिंग किट्स की कमी या दूसरी दिक्क़तें होंगी लेकिन उनके यहां भारत जैसी प्रवासी मज़दूरों की बड़ी तादाद नहीं है.

हमारे शहरों में ऐसा एक बड़ा तबका है जो रोज़ाना की मज़दूरी पर जीवनयापन करता है. 2017 के इकॉनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि 2011 से 2016 के बीच क़रीब 90 लाख लोग एक राज्य से दूसरे राज्य पैसे कमाने के लिए गए.

2011 की जनगणना के मुताबिक़, देश के अंदर एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले प्रवासी मज़दूरों की संख्या क़रीब 1.39 करोड़ है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन आने वाले स्वायत्त संस्थान इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पॉप्युलेशन साइंसेज़ के मुताबिक़, प्रवासी मज़दूरों को सबसे ज़्यादा रोज़गार कंस्ट्रक्शन सेक्टर देता है. इसमें क़रीब चार करोड़ मज़दूर लगे हुए हैं.

इसके बाद घरेलू कामकाज में क़रीब दो करोड़ मज़दूर (आदमी-औरतें) काम करते हैं. टेक्सटाइल में यह आंकड़ा 1.1 करोड़ है जबकि ईंट-भट्ठे के काम से एक करोड़ लोगों को नौकरी मिलती है. इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन, खनन और खेतीबाड़ी में भी बड़ी तादाद में प्रवासी मज़दूर लगे हुए हैं. प्रवासी मज़दूरों के मुताबिक़, लॉकडाउन के बाद उनकी नौकरियां छूट गई थीं. कंस्ट्रक्शन और दूसरी इंडस्ट्रीज में काम बंद हो जाने की वजह से उन्हें वहां से निकलना पड़ा.

सरकार इस मानवीय संकट का अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई?

सरकार ने ग़रीब तबके के लिए कैश ट्रांसफ़र और राशन वितरण जैसे उपायों का ऐलान किया है लेकिन कई मज़दूरों के पास न तो बैंक खाते हैं न ही राशन कार्ड. सरकार ने ऐलान किया कि मकान मालिक लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों से इस महीने का किराया नहीं मांगेंगे. इन आदेशों का पालन नहीं करने वालों के लिए आईपीसी की धारा 188 के तहत छह महीने की जेल या जुर्माने की बात कही गई है. प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को जब 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की तो उन्होंने ये सारी बातें नहीं कही थीं. उन्हें लोगों को आश्वस्त करना चाहिए था कि सरकार रहने और खाने-पीने की समस्या नहीं होने देगी.

जब हालात बिगड़े तब सरकार को इसकी याद आई. पीएम मोदी की इस घोषणा की तुलना 2016 की नोटबंदी से की जा रही है. अचानक से प्रधानमंत्री ने देश की 80 फ़ीसदी करेंसी को अमान्य बना दिया था. इसके बाद देश भर में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई थी. पीएम मोदी बाद में लोगों से अपील करते दिखे थे कि बस कुछ दिन का वक़्त दे दीजिए सब ठीक हो जाएगा नहीं तो जिस चौराहे पर बोलेंगे मैं खड़ा रहूंगा. किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर और द पैंडेमिक परहैप्स (2015) के लेखक कार्लो काडफ़ फ़िलहाल भारत में ही रहते हैं.

काडफ़ कहते हैं, “भारत में ग़रीब, हाशिये पर मौजूद लोग और जोखिम में आने वाले तबकों पर सबसे बुरा असर हुआ है. पहले से असमानता झेल रहे ये लोग इससे और बुरी तरह से प्रभावित होंगे.”

वो पूछते हैं कि इस तरह के कड़े उपायों को लागू करने से पहले इनके परिणामों और इनकी क़ीमत पर चर्चा क्यों नहीं की गई. इकनॉमिस्ट ज्यां द्रेज ने एक लेख में लिखा है “वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ऐलान किए गए राहत पैकेज में प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना (पीएमजीकेवाई) में 16,000 करोड़ रुपए पहले से प्रतिबद्धता वाले प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) और महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) के 5,600 करोड़ रुपए की मज़दूरी में बढ़ोतरी भी शामिल हैं जिन्हें रूरल डिवेलपमेंट मिनिस्ट्री 23 को नोटिफाई भी कर चुकी थी.”

द्रेज के मुताबिक़, राशन और कैश ट्रांसफर के लिहाज़ से यह राहत पैकेज ठीक है. लेकिन, तमाम ग़रीब अभी भी पीडीएस कवरेज से बाहर हैं जिसमें नेशनल फूड सिक्यॉरिटी एक्ट के तहत 2011 के आबादी के आँकड़ों को शामिल किया गया है. वो लिखते हैं कि पीएमजीकेवाई आवंटन के तहत कैश ट्रांसफर के लिए आवंटित 31,000 करोड़ रुपए की रक़म जो प्रधानमंत्री जनधन योजना वाले खातों में जाएगी, उससे हर ग़रीब के खाते में हर महीने 500 रुपए आएंगे. यह शुरुआती तीन महीने चलेगा. किसी भी औसत परिवार के लिए 500 रुपए महीने में घर चलाना नामुमकिन है. जो ग़रीब लोग पीडीएस या पीएमजीकेवाई में कवर नहीं हो पा रहे हैं उनके लिए क्या प्रावधान हैं. इन खामियों को दूर क्यों नहीं किया गया?

क्या लॉकडाउन के अलावा भी कोई विकल्प था?

24 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सरकार यह देख रही है कि किस तरह से इस महामारी ने दुनिया के विकसित देशों को भी घुटनों पर ला खड़ा किया है. उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि इन देशों ने इससे निपटने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए या इनके पास संसाधनों का अभाव था. हक़ीक़त यह है कि कोरोना वायरस का फैलाव इतनी तेज़ी से हुआ है कि सारी तैयारियों और कोशिशों के बावजूद दुनिया के देश इससे निपटने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग ही फ़िलहाल इससे प्रभावी तौर पर जीतने का एकमात्र ज़रिया है. उन्होंने कहा कि सरकार अलग-अलग देशों के इससे निपटने के तरीक़ों के विश्लेषण से इस नतीजे पर पहुंची है. लेकिन, दक्षिण कोरिया अपने यहां इस बीमारी की चपेट में आने वालों की संख्या को कम करने में सफल रहा है और उसकी वजह ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग करना रही है.

यहां तक कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) लगातार इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि इस महामारी को रोकने में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ ही सबसे अहम टेस्टिंग है. लेकिन, पीएम मोदी की स्पीच सुनकर यही समझ आता है कि भारत ने इससे सिर्फ़ यही सबक लिया है कि सामाजिक दूरी और लॉकडाउन के ज़रिए ही वायरस की चेन को तोड़ा जा सकता है.

लॉकडाउन का उद्देश्य था कि लोगों को समूहों में जमा होने से रोका जा सके लेकिन ये प्रवासी पैदल समूहों में जाते दिखे. सरकार और सिस्टम की आलोचना शुरू हुई तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दिल्ली में बसें भेज दीं और ये बसों में एक साथ बैठकर गए. ऐसे में लॉकडाउन को लेकर सोशल डिस्टेंस बनाए रखने का मामला भी ध्वस्त होता दिखा.ये अपने गाँव गए लेकिन गृह राज्य की सरकारों ने इनके साथ क्या सुलूक किया वो भी जगज़ाहिर है. इन्हें क्वॉरंटीन में भेजने की बात कही गई लेकिन वहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं.

दक्षिण कोरिया से भारत ने सबक़ क्यों नहीं लिया?

मार्च 2020 की शुरुआत में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने ऐलान किया कि कोरोना वायरस एक वैश्विक महामारी है. इसके लिए सोशल डिस्टेंसिंग और सेल्फ-आइसोलेशन को अपनाने की बात कही गई ताकि इसे फैलने से रोका जा सके. हालांकि, इस मामले में दक्षिण कोरिया एक अपवाद रहा जिसने बड़े पैमाने पर टेस्टिंग का सहारा लिया और कोरोना की चेन को तोड़ने में सफल रहा. दक्षिण कोरिया ने लॉकडाउन जैसे कड़े उपायों को नहीं अपनाया. भारत सरकार के एजेंडे में बड़े पैमाने पर टेस्टिंग करना शामिल नहीं है. सरकार ने कहा है कि वह रैंडम सैंपलिंग करेगी. सिस्टेमेटिक टेस्टिंग की ग़ैर-मौजूदगी में यह नहीं पता चल पा रहा है कि यह महामारी कहां तक फैली है.

प्रोफ़ेसर काडफ़ रीफ्रेमिंग द कोरोना कन्वर्सेशन में लिखते हैं, “जहां मेडिकल केयर आसानी से उपलब्ध है, पर्याप्त संख्या और अच्छी तरह से ट्रेंड स्टाफ हैं और क्षमताएं लचीली हैं, वहां पर मरीज़ों के ज़िंदा बचे रहने की ज्यादा उम्मीद है. स्पेन में हर 1000 लोगों पर तीन बेड हैं, इटली में यह आँकड़ा 3.2 का है, फ्रांस में यह 6, जर्मनी में 8 और साउथ कोरिया में यह आंकड़ा 12.3 है.”

निजी लैब्स को टेस्टिंग किट्स बनाने की मंज़ूरी में देरी क्यों?

भारत में किट्स की कमी से यह पता चल रहा है कि यहां पर्याप्त टेस्टिंग नहीं हो रही है. शुरुआत में आईसीएमआर ने यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) और यूरोपियन सीई सर्टिफिकेशंस वाली टेस्टिंग किट्स को मंज़ूरी दी. इसमें चेन्नई बेस्ड ट्राइविट्रोन हेल्थकेयर जैसी भारतीय कंपनियों को छोड़ दिया गया. ट्राइविट्रोन चीन को पाँच लाख किट्स भेज चुकी है. हालांकि, कंपनी ऐसी किट्स को विकसित कर रही है जिनके ज़रिए एक दिन में हज़ारों सैंपल्स को टेस्ट किया जा सके, लेकिन सरकार ने शुरुआत में तकरीबन दोगुनी क़ीमत पर किट्स का आयात किया.

ट्राइविट्रोन और मायलैब डिस्कवरी अब भी आईसीएमआर और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन से अपनी टेस्टिंग किट्स की मंज़ूरी मिलने का इंतज़ार कर रही हैं.

दूसरी ओर, स्विस कंपनी की सब्सिडियरी रोशे डायग्नोस्टिक्स इंडिया को टेस्ट लाइसेंस मिल गया. 2019 में मायलैब को एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी की टेस्टिंग किट्स के लिए भारत की पहली एफडीए अप्रूव्ड मॉलीक्यूलर डायग्नोस्टिक कंपनी के तौर पर मान्यता मिल गई.

ट्राइविट्रोन की संयुक्त उद्यम में पार्टनर चीन में लैबसिस्टम्स डायग्नोस्टिक्स चीन में किट्स बेच रही थी. कंपनी ने कहा है कि वह हर दिन 7.5 लाख टेस्टिंग किट्स बना रही है.  आईसीएमआर के नेटवर्क में मौजूद लैब्स के कराए जाने वाले कोविड-19 टेस्ट का ख़र्च क़रीब 4,500 रुपए बैठता है जो ग़रीबों के लिए एक बड़ी रक़म है.

अमरीकी फर्म थर्मो फिशर साइंटिफिक और स्विस कंपनी रोशे डायग्नोस्टिक्स की किट्स का इस्तेमाल आईसीएमआर कर रही है. एक और विवाद कोसारा को लेकर पैदा हुआ, यह अमरीकी और भारतीय फर्मों का संयुक्त उद्यम है. यूएस एफडीए सर्टिफिकेशन को लेकर स्पष्टता के बगैर ही इसे टेस्टिंग किट्स बनाने का शुरुआती लाइसेंस मिल गया.रिपोर्ट्स के मुताबिक़, काफ़ी बाद में पॉलिसी में बदलाव किया गया कि ऐसे स्वदेशी मैन्युफैक्चरर्स को भी इजाज़त दी जाए जिन्हें पुणे के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से टेस्ट की मंज़ूरी मिल चुकी है.

दुनिया में सबसे कम टेस्टिंग वाले देशों में भारत क्यों?

27 मार्च तक भारत ने केवल 26,798 टेस्ट किए थे, जो दुनिया भर में देशों के किए जा रहे सबसे कम टेस्ट्स में हैं. इस बात का कोई स्पष्ट डेटा नहीं है कि भारत में कितने टेस्ट उपलब्ध हैं और टेस्टिंग किट्स की कमी की वजह से टेस्टिंग का क्राइटेरिया सख्त है. केवल उन लोगों की टेस्टिंग की जा रही है जो कि या तो इस महामारी से प्रभावित देशों की यात्रा करके लौटे हैं या कोविड-19 के मरीजों के संपर्क में आए हैं.

20 मार्च को आईसीएमआर ने कहा कि टेस्टिंग क्राइटेरिया में लक्षणों के आधार पर हेल्थकेयर वर्कर्स और हाई-रिस्क लोगों को भी शामिल किया जा सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़, डब्ल्यूएचओ की हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर की सिफ़ारिश के उलट भारत में हर 10,000 लोगों पर एक डॉक्टर है. भारत को इन सवालों से भी जूझना पड़ रहा है कि उसने समय रहते किट्स और पीपीई का उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया. साथ ही वेंटिलेटर्स के लिए भी गंभीरता से कोशिशें क्यों नहीं हुई.

सरकार ने 28 मार्च को केवल यह संकेत दिया कि देश स्टेज 3 में पहुंच गया है. अपनी दूसरी स्पीच में प्रधानमंत्री ने कहा था कि केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों और देश में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत बनाने के इलाज के लिए 15,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है. पीएम ने कहा था, ‘इससे कोरोना टेस्टिंग इकाइयों, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई), आइसोलेशन बेड्स, आईसीयू बेड, वेंटिलेटर्स और दूसरे ज़रूरी इक्विपमेंट्स की संख्या तेज़ी से बढ़ाने में मदद मिलेगी.’

वेंटिलेटर्स की कमी कैसे पूरी होगी?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़, भारत के पब्लिक सेक्टर के पास केवल 8,432 वेंटिलेटर हैं जबकि प्राइवेट सेक्टर के पास 40,000 वेंटिलेटर हैं. टाटा मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, हुंदई मोटर इंडिया, होंडा कार्स इंडिया और मारुति सुज़ुकी इंडिया से सरकार ने वेंटिलेटर बनाने की संभावनाएं तलाशने के लिए कहा है. वेंटिलेटरों की ज़रूरत कोविड-19 से गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों को लाइफ सपोर्ट देने में पड़ती है. एक्सपर्ट्स कह चुके हैं कि भारत को देश में वेंटिलेटरों की मौजूदा संख्या के मुक़ाबले 8-10 गुना ज्यादा तक वेंटिलेटरों की ज़रूरत पड़ेगी.

हालांकि, कार कंपनियां भी अब इनके उत्पादन से जुड़ चुकी हैं, फिर भी देश में वेंटिलेटरों की तेज रफ्तार मैन्युफैक्चरिंग करना एक बड़ी चुनौती है. दूसरे देश वेंटिलेटरों को हासिल करने में तेजी दिखा रहे थे. साथ ही मीडिया की रिपोर्ट्स से पता चल रहा था कि केवल सामाजिक दूरी बनाने के आयातित कॉन्सेप्ट से ज्यादा मेडिकल तैयारियां करने की ज़रूरत है. कोविड-19 की महामारी से लड़ने के लिए भारत सरकार के उपायों को लेकर कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब नहीं मिल पा रहे हैं.

बीबीसी न्यूज से साभार, चिंकी सिन्हा, बीबीसी संवाददाता

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