कोरोना : स्थितियाँ गंभीर, कम्पनियाँ काम कराने पर आमादा

आईटीसी, हरिद्वार सहित कई कम्पनियाँ उत्पादन के लिए मज़दूरों को कर रही हैं मज़बूर

एक तरफ जहाँ भारत सहित दुनिया के तमाम देश कोरोना वाइरस के प्रकोप को रोकने के लिए जूझ रहे हैं, सरकारें लॉकडाउन और कर्फ्यू का सहारा ले रही हैं, वहीँ तमाम कम्पनियाँ मुनाफे की हवस में मज़दूरों की ज़िन्दगी को दांव पर लगाने पर आमादा हैं। इसी क्रम में उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित आईटीसी, सहित कई कम्पनियाँ उत्पादन के लिए मज़दूरों को मज़बूर कर रही हैं। नेस्ले व पारले जैसी फैक्ट्री के मज़दूर भी उहापोह की स्थिति में हैं।

ज्ञात हो कि काफी मशक्कत के बाद गुडगाँव-मानेसर स्थित मारुति प्लांटों में अवकाश घोषित हुआ, लेकिन अन्य कई जगहों से जो खबरें मिल रही हैं, वहाँ प्रशासन और सरकारें मालिकों के दबाव में है। उत्तराखंड में भी यही हाल है। पूरे राज्य में 31 मार्च तक लॉक डाउन की घोषणा के बावजूद कंपनियों को चलाना मालिकों की मर्जी पर छोड़ा जा रहा है।

उत्तराखंड : खाद्य सामग्री के बहाने प्लांट चलाने की कोशिशें

हरिद्वार स्थित आईटीसी में यूनियन के तमाम प्रयासों के बावजूद उत्पादन जारी है। स्थिति यह है कि कंपनियों से बैठक कर उधमसिंह नगर के डीएम द्वारा आर.एम. लॉकिंग अवधि के दौरान उद्योगों को जारी रखने की अनुमति के लिए सिडकुल को अधिकृत कर दिया गया है।

हालाँकि काफी ज़द्दोज़हद के बाद टाटा मोटर्स और महिंद्रा प्लांट 31 मार्च तक बंद हो गई, जिससे उनकी वेंडर कम्पनियाँ भी 31 मार्च तक बंद हो गई हैं। वोल्टास, ब्रिटानिया आदि में अवकाश है, जबकि नेस्ले में कभी भी कार्य के लिए बुलाने की सूचना है। खाद्य सामग्री के बहाने कई कम्पनियों में उत्पादन जारी है। पारले, पंतनगर में अभी अवकाश है, लेकिन पारले, सितारगंज में 24 मार्च से उत्पादन के लिए मज़दूरों की शिफ्ट लग गई है। कई अन्य कम्पनियाँ भी प्लांट चलने की अनुमति लेने वाली हैं।

आईटीसी हरिद्वार में उत्पादन जारी

प्रिंटिंग एवं पैकेजिंग मज़दूर संघ आईटीसी हरिद्वार ने बताया की प्रबंधन से यूनियन लगातार बात कर रही थी कि कोरोना महामारी से कंपनी में कार्य कर रहे लोगो की सुरक्षा के लिए प्रबंध किये जाये। तब कंपनी ने लोगो का टेम्परचेर चेक करना, हैण्ड सेनेटाइजार की सुविधा देने आदि कुछ क़दम उठाए।

इसी बीच पीएम मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा की। लेकिन प्रबंधन ने मज़दूरों की सुरक्षा को अनदेखा कर यह स्पस्ट कर दिया कि आईटीसी  हरिद्वार 22 मार्च को भी रोज की तरह चलेगा। यूनियन ने प्रबंधन से इसका पालन करने का दबाव बनाया तो प्रबंधन कंपनी चलाने के उपाय देखने लगा। यूनियन ने जब सख्त रुख अपनाया तो प्रबंधन ने 21 मार्च को रात 10 बजे ए व बी शिफ्ट बन्द होने की सूचना दी।

यूनियन ने बताया कि 22 मार्च को सीएम त्रिवेंद्र रावत के 31 मार्च तक उत्तराखंड लॉक डाउन की घोषणा की। लेकिन प्रबंधन मनमानी पर आमादा रहा। इसी प्रक्रिया में सी  शिफ्ट का समय हो गया। असमंजस में मज़दूर कम्पनी पहुँच गए। यूनियन नेता पीपीडी गेट पर मौजूद रहे और कहा कि जब तक स्पस्ट निर्देश के साथ लोगो की जिमेदारी प्रबंध नही लेता प्लांट में कोई नहीं जाएगा।

आईटीसी प्रबंधन का नया दांव

प्रबंधन में फोन पर यूनियन पदाधिकारियो से कहा की खाद्य सामग्री बनाने वाली कंपनियां चलाई जा सकती हैं। यूनियन ने कहा कि कम्पनी के तीन प्लांटों में से केवल एक प्लांट खाद्य सामग्री बनाती है। यह प्रिंटिंग व पैकेजिंग प्लांट है। वैसे भी यदि आवश्यकता अनुसार काम करना पड़ता है, तो सबके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी आईटीसी प्रबंधन की होगी। साथ ही लॉक डाउन में जो मज़दूर काम पर नहीं आ पा रहे हैं, उनका वेतन न काटा जाये।

इन हालत में  प्रबंधन के आश्वासन के बाद श्रमिक 22 मार्च की रात्रि पाली में कार्य पर गए। लेकिन तबसे प्रबंधन पर 31 मार्च तक लॉक डाउन के अनुपालन के लिए यूनियन द्वारा दबाव बनाया जा रहा है।

यूनियन नेताओं ने बताया कि पूरे प्रदेश में लॉक डाउन होने, सार्वजनिक परिवहन बंद होने और एक जिले से दूसरे जिले व प्रदेश में आने-जाने पर प्रतिबन्ध से रुड़की, ऋषिकेश आदि जगहों से आने में श्रमिकों के सामने दिक्कतें आ रही हैं। कई मकान मालिक मज़दूरों पर डियूटी या कहीं बाहर आने-जाने पर माकन खाली करने का भी दबाव बना रहे हैं।

मुनाफे के सामने मज़दूर के जान की कीमत नहीं

एक तरफ कोरोना का प्रकोप, दूसरी ओर कार्य पर जाने, यानी समूह में जाने से मज़दूरों में भय का माहौल बना हुआ है। यह सबकुछ तब हो रहा है, जब तमाम सरकारी आदेश मज़दूरों के हित के दावे कर रहे हैं। उत्तराखंड सरकार लॉकडाउन के बाद 25 मार्च से कर्फ्यू जैसी स्थिति की घोषणा कर चुकी है।

साफ़ है कि पूँजीवादी व्यवस्था में मुनाफे की अंधी हवस के सामने मज़दूरों के जान की कोई कीमत नहीं है।

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