“थप्पड़” : जो हर औरत के जीवन की खामोश तहों का गवाह है

फिल्म “थप्पड़” को क्यों देखाना चाहिए. . . वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मों के सटीक विश्लेषक साथी दिनेश श्रीनेत की समीक्षा

‘थप्पड़’ का सच भी सिर्फ घरेलू हिंसा तक सीमित नहीं है। यह सच हर औरत के जीवन की खामोश तहों में खुलता है। फिल्म की पटकथा में थप्पड़ एक शांत पानी में फेंका गया कंकड़ है। जिसके बाद केंद्र से लहरें उठती हैं और किनारों तक जाती हैं. . .

‘थप्पड़’ घरेलू हिंसा पर बनी फिल्म नहीं है। घरेलू हिंसा से जुड़ी जिरह सुनने जाएंगे तो निराशा होगी। यह भीतर से रीत गई, खाली हो गई औरतों की कथा है। थोड़ी सपाट लग सकती है। लग सकता है कि कई बार अलग-अलग तरीके से कही जा चुकी है। लेकिन अनुभव सिन्हा ने सिनेमा के जरिए बात कहने की अपनी जो खास शैली विकसित की है, उसे आप नजरअंदाज़ नहीं कर सकते। ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’ और अब ‘थप्पड़’ के जरिए वे जटिल और परतदार समझी जानी वाली सामाजिक सच्चाइयों को उस आखिरी व्यक्ति तक ले जाना चाहते हैं जो उसे परत-दर-परत खोलने की बजाय सरलीकरण में समझता है।

इसीलिए मुझे अनुभव की फिल्में अच्छी लगती हैं। इस दौर में जब सच्चाइयों को बाइनरी में बदला जा रहा है, ऐसी फिल्मों और ऐसी कहानियों की जरूरत है जो लोगों को यह सिखाए कि जो ऊपर से दिखता है, सच उतना नहीं होता। सच्चाई की परतें होती हैं और हर परत को खोलने की कोशिश में आप खुद भी खुलते चलते जाते हैं। ‘थप्पड़’ का सच भी सिर्फ घरेलू हिंसा तक सीमित नहीं है। यह सच हर औरत के जीवन की खामोश तहों में खुलता है।

फिल्म की पटकथा में थप्पड़ एक शांत पानी में फेंका गया कंकड़ है। जिसके बाद केंद्र से लहरें उठती हैं और किनारों तक जाती हैं। थप्पड़ अमृता (तापसी पन्नू) को लगता है मगर ये लहरें उसकी पड़ोसी शिवानी (दिया मिर्जा), उसकी मां संध्या (रत्ना पाठक शाह), उसकी सास सुलक्षणा (तन्वी आज़मी), उसकी वकील नेत्रा (माया), उसकी हाउस हेल्पर (गीतिका विद्या) के जीवन में भी उठती हैं। इन औरतों के शांत जीवन में किनारों की हलचल मानों कब की गुम हो चुकी थीं।

फिल्म के आरंभ में रंगीन आइसकैंडी इन सभी स्त्रियों के सपनों को जो़ड़ती हुई चलती है। अमृता अपने वजूद के खालीपन को भरने का प्रयास करती दिखती है। यह उसके मामूली होते चले जाने की कहानी है। इस नाटकीयता विहीन फिल्म में हम अगर थप्पड़ खाने को फिल्म का सबसे चरम बिंदु मानें तो उसके पहले की दृश्य श्रृंखलाओं में वह एक ही काम बार-बार करती नजर आती है। ये दृश्य श्रृंखलायें सायास रची गई हैं। ऐसे टाइम जोन में जीना कि मानो बालकनी से अपने मोबाइल की एक क्लिक ही अपने लिए चुराया गया पल हो।

फिल्म में एक जगह वह कहती है, “पता है उस थप्पड़ से क्या हुआ? उस एक थप्पड़ से ना मुझे वो सारी अनफेयर चीजें साफ-साफ दिखने लग गईं जिसको मैं अनदेखा करके मूवऑन करती जा रही थी।” अमृता को प्रतिशोध नहीं लेना है। उसे अपने खालीपन को भरना है। वह बहुत साफ-साफ कहती है, “उसने मुझे मारा; पहली बार। नहीं मार सकता। बस इतनी सी बात है। और मेरी पिटिशन भी इतनी सी है।”

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अनुभव सिन्हा बतौर निर्देशक अपने विषय को धीमी आंच पर पकने देते हैं। फिल्म में एक किस्म का ठहराव है। फिल्म चाहती तो और गहरे उतर सकती थी, लेकिन निर्देशक बहुत गहरे जाने से बचे हैं। शायद इसके पीछे नई सिनेमा भाषा भी है जो बहुत भावुकता में गए बिना बात को कहना चाहती है। सही जगह पर सटीक चोट करना चाहती है। जब अमृता को रिश्तों को जोड़कर रखने की नसीहत दी जाती है तो उसका सवाल होता है, “जोड़के रखनी पड़े कोई चीज तो मतलब टूटी हुई है न?”

 तापसी ने अपने किरदार को भीतर से जिया है। उसने बिना लाउड हुए अपने किरदार की जर्नी तय की है। उसकी सरलता, एक परफेक्ट हाउसवाइफ बनने की कोशिश में लगे रहना, थप्पड़ खाकर शॉक्ड होना, अपने भीतर आए खालीपन से लड़ना और अंत में खुद के लिए फैसले लेना सीखना। यह एक पूरी यात्रा है इस फिल्म में।

फिल्म की बुनावट में बहुत योगदान इसकी लेखिका मृणमयी लागू का है, जो हिन्दी सिनेमा की आधुनिक मां रीमा लागू की बेटी हैं। जैसा कि मैंने जिक्र किया था फिल्म की संरचना केंद्र से उठती हलचल को किनारों तक फैलाना है। हर किरदार धीरे-धीरे खुलता जाता है। किसी औरत को पति के कुंडी बंद कर देने का डर होता है, तो किसी को रसूख पर टिकी अपनी प्रोफेशनल लाइफ खो देने का डर है। एक औरत एक बेहद समझदार पति का साथ पाने के बावजूद अनजाने अपनी खुशियों से दूर होती चली जाती है तो एक औरत उम्र के अंतिम पड़ाव में संवादहीनता का शिकार है। औरतें अपने दुःख की पोटली घर में ऐसी जगह छिपा देती हैं, जहां से वह किसी को न मिले। पटकथा लेखक मृणमयी और लेखक-निर्देशक अनुभव कुछ जगहों पर बड़ी खूबसूरती से उस पोटली को टटोलते हैं।

मुझे निजी तौर पर इस फिल्म का एक दृश्य बहुत पसंद आया जब अनुभव एक ही फ्रेम के भीतर दो फ्रेम बनाते हैं और दोनों में दो अवाक स्त्रियां हैं- एक अमृता और दूसरी उसकी हाउस हेल्पर। अमृता के अलावा जो एक किरदार आपको याद रह जाता है वह है उसकी दोस्त और पड़ोसी शिवानी। एक सिंगल मदर के रूप में दिया मिर्जा ने बहुत ही संतुलित अभिनय किया है। अमृता के पति बने पावेल गुलाटी ठीक-ठाक अभिनय कर लेते हैं मगर कुल मिलाकर सपाट लगते हैं। अमृता के पिता कुमुद मिश्रा तीसरे ऐसे किरदार हैं जो फिल्म ख़त्म होने के बाद तक याद रहते हैं। एक बहुत कलात्मक तरीके से घटनाएँ और चरित्र बिखरते हैं और अपने सघनित रूप की जगह वे खुल जाते हैं, बिखर जाते हैं, जैसे किसी डब्बे में बंद सामान फर्श पर फैल जाए और उनकी असली शक्ल सामने आ जाती है।

फिल्म एक खुले अंत की तरफ जाती है। बहुत सी बातों को छोड़ दिया गया है। इसीलिए मुझे इस फिल्म का थप्पड़ खाती तापसी का पोस्टर पसंद नहीं है। मैंने जो तस्वीर चुनी है वो इस फिल्म के मिजाज को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्त कर पाती है।

…थोड़ी सी नर्वस और थोड़े से आत्मविश्वास के साथ पूरे फ्रेम में अकेली तापसी।

जिन्होंने उदय प्रकाश की कविता ‘औरतें’ पढ़ी होगी वे अगर इस फिल्म को देखेंगे तो उन्हें लगेगा कि शायद यह फिल्म भी उस अंधेरे में उतर सकती थी, जहां तक उदय प्रकाश की कविता जाती है। कविता की कुछ पंक्तियां हैं-

एक औरत फोन पकड़ कर रोती है

एक अपने आप से बोलती है और किसी हिस्टीरिया में बाहर सड़क पर निकल जाती है

कुछ औरतें बिना बाल काढ़े, बिना किन्हीं कपड़ों के

बस अड्डे या रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर खड़ी हैं यह पूछती हुई कि

उन्हें किस गाड़ी में बैठना है और जाना कहां है इस संसार में

एक औरत हार कर कहती है -तुम जो जी आये, कर लो मेरे साथ

बस मुझे किसी तरह जी लेने दो

मगर इतने अंधेरे में उतरने के बाद संवाद की गुंजाइश नहीं बचती है। अनुभव सिन्हा इस फिल्म में संवाद की संभावनाओं को खत्म नहीं करते। फिल्म किसी को खलनायक नहीं बनाती। अमृता को थप्पड़ मारने वाले उसके पति को भी नहीं। कहानी में खलनायक दिखा देना आसान है मगर कहानी के साथ गुजरते हुए खुद के भीतर छिपे नायक और खलनायक को टटोल पाना कठिन होता है। अंत में छोटे-छोटे दृश्यों के जरिए हर कोई अपने जीवन में सुख की छाया को छू भर जाता है। चाहे वो घर में आया हारमोनियम को स्पर्श करना हो या किशोर बेटी के जीवन में पल्लवित होते प्रेम को देखना- ये औरतें अपनी खुशी तलाश ही लेती हैं। अमृता के पिता एक जगह फिल्म का सबसे यादगार संवाद बोलते हैं, “हम तो हमेशा सही ही सोच के करते हैं, पर कई बार सही करने का रिजल्ट हैप्पी नहीं होता।”

….

मैंने यह फिल्म रात के शो में अकेले देखी। करीब 40 प्रतिशत सीटें भरी हुई थीं। महिलाएं और पुरुष दोनों थे। छोटे बच्चों के साथ आए कपल, अधेड़ वय के दंपती, नवविवाहित और युवा लड़के-लड़कियां। एक खास मूड की इस गंभीर फिल्म के खत्म होने के बाद रात करीब 12 बजे जब हम मॉल के गलियारों से गुजर रहे थे वहां सन्नाटा था। हॉल में हमारे कदमों की आवाज़ें और बातचीत के स्वर गूंज रहे थे। मैंने गौर किया कि हर कोई एक-दूसरे से बातचीत कर रहा था।

हर कोई बातचीत कर रहा था… और यह देखना एक सुखद एहसास था।

-दिनेश श्रीनेत की पोस्ट