लेखकों-कलाकारों का अखिल भारतीय सम्मलेन “हम देखेंगे”

नई दिल्ली। नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में रविवार को जंतर-मंतर पर अखिल भारतीय लेखक-कलाकार सम्मेलन ‘हम देखेंगे’ का आयोजन हुआ। सम्मेलन के दौरान विभिन्न लेखक, कलाकार, वैज्ञानिकों और कानूनविदों ने सीएए-एनआरसी-एनपीआर को जनविरोधी बताया। कहा कि यह कदम नागरिकता के मानदंडो के विरुद्ध व संविधान विरोधी ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के खिलाफ भी है। सम्मलेन ने उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए दंगों को जनसंहार करार दिया है।

इस मौके पर लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा कि एक ऐसा जनतंत्र जो संविधान द्वारा न चलाया जाये, और जिसकी सारी संस्थाओं को खोखला कर दिया गया हो, केवल बहुसंख्यावादी राज्य ही बन सकता है। आप पूर्णतय: संविधान के पक्ष या विपक्ष में या इसके कुछ हिस्सों से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन ऐसे व्यवहार करना जैसे उसका अस्तित्व ही नहीं है, जैसा कि यह सरकार कर रही है, जनतंत्र को पूरी तरह तोड़ने के समान होगा। शायद यही उसका लक्ष्य भी है। यह हमारा अपना कोरोना वायरस है। हम बीमार हैं।

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि आरएसएस और बीजेपी देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के दंगे इसी योजना का एक हिस्सा हैं। कई मारे गए, सैकड़ों घायल हुए। घरों और दुकानों में आग लगा दी गई। कुल मिलाकर रोजगार छिना जा रहा है। 2002 में गुजरात में जो हुआ, उसे दोहराया जा रहा है।

लेखक प्रियदर्शन ने कहा, पहली बार देश में धर्म के आधार पर कानून आया है। यहां नागरिकता नहीं, धर्म को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके लिए शाहीन बाग को मुख्य विंदु बनाया गया है। दंगों के कारण दिलों में जो दूरियां आई हैं, वो बेहद खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार व कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि नागरिकों को परेशान किया जा रहा है। डर फैला दिया गया है कि सरकार का जिसने विरोध किया, उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो सकती है। बीजेपी इस देश को लगातार तोड़ रही है। वो तो इस देश की ताकत है कि देश टूट नहीं रहा।

न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव के सुभाष गाताडे ने कहा कि आज़ादी मिलने के बाद बीते सत्तर साल में यहां की अवाम ने अपनी मेहनत और जददोजहद के बलबूते जिस मुक़ाम को हासिल किया था, वहां से उल्टी यात्रा फिर शुरू हो गयी है। यह ऐसा वक्त़ है जहाँ लड़ाई महज उससे नहीं है जो सामने से वार करता है बल्कि उससे भी है जो आप का पड़ोसी है, आप का भाई है, आप के आत्मीयों में से कोई है, हम और वे का वह फलसफा अब तमाम दिमाग़ों पर कब्जा कर चुका है।

उन्होंने कहा कि किसे गुमान था कि मनुस्मृति अब सम्मानित ग्रंथ के तौर पर पेश की जाती रहेगी, बंटवारे के वक्त़ मजहब की बुनियाद पर मुल्क के जिस फलसफे को हम लोगों ने नकारा था, जिन्ना का वह सपना हमारे हुक्मरान पूरा करने की ठानेंगे।

सम्मेलन में दलित लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संघ, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, इंडियन कल्चरल फोरम और दिल्ली विज्ञान मंच सहित 15 से अधिक संगठनों के लेखक, कलाकार और छात्र-छात्राएं शामिल हुए थे। इस दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ एक प्रस्ताव भी पारित हुआ।

सम्मेलन में अली अहमद फातमी, अशोक वाजपेयी, भंवर मेघवंशी, डी. रघुनंदन, दक्षिणध्वनि, गौहर रजा, गीता हरिहरन, हीरा लाल राजस्थानी, जगदीश पंकज, के. सच्चिदानंद, लाल रत्नाकर, एल मंगेश डबराल, मृत्युंजय, एमपी सिंह, नंदिता नारायण, नताशा बधवार, संजय काक, संजय राजौरा, शशिभूषण समद, शुभा, सुभाष गताड़े, विष्णु नागर, हिमांशु कुमार जैसी जनि-मानी हस्तियाँ शामिल थे।

इस दौरान साथ ही, अनेक संगठनों के कार्यकर्ताओं के सुर ढपली की थाप पर गूंजते रहे। ‘ये किसका लहू है, कौन मरा’, ‘वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे’ और ‘यह क्यों हो रहा है, जो ना होना था’ आदि गीतों के साथ ‘हल्लाबोल’ होता रहा।

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