दिल्ली : एक सुनियोजित हिंसा की आग में

इन नापाक मंसूबों को नाकाम करने के लिए जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर जन-प्रतिरोध को और व्यापक बनाना होगा!

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली गुजरात-2002 का एक नियंत्रित-नियोजित संस्करण है। यह 1984 के दंगे की पुनरावृत्ति भी है। अंतर बस केवल इतना है कि इस बार निशाने पर सिख की जगह मुस्लिम हैं। सब कुछ पुलिस और प्रशासन के संरक्षण में हो रहा है। सुनियोजित तरीके से राजसत्ता और संघ भाजपा का गंठजोड़ का उन्माद राजकीय आतंक की एक बानगी मात्र है।

कपिल मिश्रा तो महज एक मुखौटा है। बर्बरता की इस मुहिम का संचालन-नियंत्रण केन्द्रीय सत्ता के हाथ में है। अबतक दर्ज़नों वीडियो सामने आ चुके हैं। पुलिस पूरीतरह दंगाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही थी, गोलियां और आँसू गैस के गोले चला रही थी, पत्थर फेंक रही थी, दंगाइयों को बचा रही थी और मुसलमान युवकों और स्त्रियों को चुन-चुनकर निशाना बना रही थी।

INDIA-CITIZENSHIP/PROTESTS

निशाने पर है समुदाय विशेष

दिल्ली के उत्तर-पूर्व इलाके में जो हो रहा है वह एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर किया गया एकतरफा हमला है। जिसमें पुलिस संघ-भाजपा से जुड़े दंगाइयों का खुलेआम साथ दे रही है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस एक शख्स कपिल मिश्रा ने इस हिंसक हमले की अगुआई की वह अभी भी खुलेआम घूम रहा है।

23 फरवरी को भाजपा नेता और आम आदमी पार्टी का पूर्व विधायक कपिल मिश्रा ने दिल्ली के जाफराबाद इलाके के मौजपुर चौक में नागरिकता संशोधन कानून (2019) के समर्थन में दिए भड़काऊ भाषण के बाद आसपास के इलाकों में मुस्लिम विरोधी हिंसा शुरू हो गई। जारी हिंसा में अब तक दिल्ली पुलिस के एक कॉन्सटेबल समेत दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।

इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया है कि वह भड़काऊ भाषण देने के आरोप में बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा और परवेश वर्मा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ पदाधिकारियों को हिंसा के पीड़ितों और उनके परिवारों से मुलाकात करनी चाहिए। जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि अब समय आ गया है जब आम नागरिकों को भी ‘Z श्रेणी’ जैसी सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए।

एक सुनियोजित हमला है

सब कुछ बेहद सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। यह बात अब किसी से छुपी नहीं है। दर्जनों ऐसे वीडियो वायरल हो चुके हैं जिनको देखकर पूरे हमले की कहानी समझी जा सकती है। कहीं पुलिस दंगाइयों के साथ मिलकर मुस्लिम घरों पर पथराव कर रही है।

कपिल मिश्रा के नेतृत्व में निकला जुलूस और सीएए विरोधियों को दी गयी उसकी धमकी का वीडियो पूरे देश में वायरल हो चुका है। लेकिन दिल्ली पुलिस अभी भी उससे अनजान है। ट्रैक्टरों के जरिये ईंट-पत्थर ढोकर लाने का मसला हो या फिर लोनी से बसों में भरकर दंगाइयों को ढोने की बात सारी घटनाएं इस बात को साफ कर देती हैं कि हिंसा के पीछे कौन है।

सीएए-एनआरसी-एनपीआर प्रतिरोघ के ख़िलाफ़ कुचक्र

दंगाइयों के हमलों से भड़ककर सीएए-एनआरसी-एनपीआर प्रतिरोघ को हिंसक साबित करने का कुचक्र रचा गया। वे किसी भी कीमत पर शाहीन बागों से उठी आवाज़ को फासिस्ट तरीके से खामोश कर देना चाहते हैं, खून और राख की ढेरी में दबा देना चाहते हैं।

कांग्रेस-आप-न्यायपालिका की ख़ामोशी क्या बताती है?

इस राज्य-प्रायोजित हिंसा के बाद 1984 के सिक्ख दंगे की मास्टर शातिर कांग्रेस तो मूक दर्शक है ही, केजरीवाल की ख़ामोशी और “उपवास” की नौटंकी को भी इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा न्यायपालिका की भूमिका भी कोई नयी बात नहीं है। न्यायमूर्ति बोवडे पहले ही बोल चुके हैं कि हिंसा रुकने तक हम इस मामले की कोई सुनवाई नहीं करेंगे।

वे अपने अधिकारों के लिए लड़ने से पहले नागरिकों को अपने कर्तव्य-पालन की राय देते रहेंगे और सड़कों पर फासिस्ट खूनी जोम्बी अपना “कर्तव्य-पालन” करते रहेंगे।

इस साजिश को पहचानों

मेहनतकश आवाम और इंसाफ पसंद आवाम को इस साज़िश को पहचानना होगा और इन नापाक मंसूबों को नाकाम करने के लिए जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर जन-प्रतिरोध को और गहरा और व्यापक बनाना होगा। इसका ज़वाब यह भी है कि 1 अप्रैल से शुरू होने वाले एनपीआर के देशव्यापी बहिष्कार की कोशिशों को और तेज़ कर दिया जाए।