वोल्टास में 8 श्रमिकों की ग़ैरकानूनी छँटनी

ले ऑफ गैरकानूनी घोषित होने पर प्रबंधन ने आंशिक बंदी का नया खेल खेला

पंतनगर, 14 फरवरी (उत्तराखंड)। वोल्टास लिमिटेड, सिडकुल,पंतनगर के प्रबंधन ने आज एक नया दांव चल दिया और उसने प्लांट के यूनिट-2 को बंद करने के फरमान के साथ यूनियन अध्यक्ष व महामंत्री सहित 8 श्रमिकों की गैरकानूनी छँटनी का फरमान जारी कर दिया।

वोल्टास प्रबंधन द्वारा जारी प्लांट 2 में उत्पादन बंद होने का नोटिस

ज्ञात हो कि कंपनी में वोल्टास इम्पलाइज यूनियन के माँग पत्र पर 10 दिसंबर 2017 से औद्योगिक विवाद कायम है। इस दौरान प्रबंधन ने मज़दूरों की तरह तरह से सुविधाएं और वेतन में कटौतियाँ कीं, जिसके खिलाफ संघर्ष जारी रहा। प्रबंधन ने एक स्थाई श्रमिक को निलंबित किया, फिर बर्खास्त कर दिया। कई ठेका मज़दूरों को नौकरी से निकाला।

25 सितंबर 2019 को यूनियन के वर्तमान व पूर्व अध्यक्ष, महामंत्री और संगठन मंत्री सहित 8 मज़दूरों की गैरकानूनी गेट बंदी कर दी थी, जिसे बाद में प्रबंधन ले ऑफ बताने लगा। यूनियन के प्रतिवाद के बाद श्रम विभाग द्वारा प्रबंधन के ले ऑफ को गैरकानूनी घोषित करना पड़ा।

प्रबंधन ने मजदूरों के वेतन को भी बंद कर दिया था, जो गैरकानूनी घोषित हुआ और श्रम विभाग ने 5 फरवरी को उसके खिलाफ आरसी जारी कर दी। प्रबंधन इसके खिलाफ उच्च न्यायालय नैनीताल चला गया।

लेकिन यूनियन की तरफ़ से कैविएट दाखिल होने के कारण 13 फरवरी को उसे स्थगनादेश (स्टे) नहीं मिला बल्कि, हाईकोर्ट ने वेतन की कटी राशि से 10 दिन के भीतर ₹3 लाख कोर्ट में जमा करने का आदेश जारी किया।

लेकिन इसके ठीक अगले ही दिन आज प्रबंधन ने एक नया दाँव चलते हुए कंपनी के यूनिट-2 में काम ना होने का हवाला देकर इन 8 मज़दूरों की गैरकानूनी छँटनी करते हुए सेवा समाप्ति का फरमान जारी कर दिया।

चूँकि वोल्टास कंपनी में केवल 38 स्थाई श्रमिक हैं, जिसमें से 9 श्रमिक बाहर हैं, ऐसे में छोटी ताकत में भी बड़ा चुनौतीपूर्ण संघर्ष रहा है। इसके बावजूद पिछले 2 साल से मज़दूरों का यह संघर्ष जारी है। गेटबन्दी के बाद पिछले साढे 4 महीने से कंपनी गेट पर श्रमिकों का धरना भी चल रहा है।

यूनियन प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रबंधन का पूरा खेल श्रम विभाग की मिलीभगत से ही चलता रहा। गैरकानूनी लेऑफ घोषित होने के बावजूद श्रमिकों की कार्यबहाली नहीं कराना, काफी दबाव और संघर्ष के बावजूद वेतन की आरसी काटने में लंबा समय लेना, बाकी और मुद्दे लटकाए रखना, माँग पत्र को श्रम न्यायालय भेजना आदि श्रम अधिकारियों द्वारा प्रबंधन को मदद देने के ही परिणाम हैं।
ऐसे में एक संघर्षपूर्ण चुनौती के साथ मज़दूर आंदोलन को नया रूप दे रहे हैं।

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