बजट : मेहनतकश के लिए ठन-ठन गोपाल

बजट प्रस्ताव 2020-21 में भी मुनाफे की बलिबेदी पर खड़ा है मज़दूर वर्ग

मोदी सरकार का वित्त वर्ष (2020-21) का बजट सामने है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के 2 घंटे 42 मिनट के भाषण में मेहनतकश जनता के लिए क्या था, देश के मेहनतकश के लिए उसे समझना बेहद मुश्किल है। कार्पोरेट की फिर बल्ले-बल्ले हुई और मज़दूर-मेहनतकश जनता की बढ़ती तबाही, बेरोजगारी, महँगाई को और तेज गति से बढ़ाने वाला होने के साथ माध्यम वर्ग के लिए भी झुनझुना साबित हुआ।

यह बजट छंटनी-बंदी की गति और बढ़ाने वाला है, मज़दूरों के क़ानूनी अधिकारों को और काम करने वाला है। मज़दूरों के रोज़गार सुरक्षा दो दूर, नए रोजगार को पैदा करने पर भी खामोश है। इसके विपरीत कंपनियों को टैक्स में कई रियायतें देने, पूँजीपतियो के लाभ के लिए कम्पनी क़ानून में बदलाव की घोषणा हुई।

’देश नही बिकने दूँगा’ का फिर सच यही साबित हुआ कि ‘देश की जितनी भी मूल्यवान संपति है वो सब बेच दूँगा’। वर्तमान बजट में यह स्पष्ट रूप से सामने आया। एलआईसी और आईडीबीआई में अपनी हिस्सेदारी बेचने का ऐलान हुआ, रेलवे के निजीकरण की गति और तेज हुई, रिटायर्ड रेलवे कर्मचारियों की पेंशन तक खतरे में पड़ी, पीपीपी के बहाने आम जनता की बुनियादी स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी सुविधाएँ निजी हाथों में देने का बंदोबस्त और पुख्ता हुआ।

बजट में मज़दूरों के वेतन में इजाफे पर कोई चर्चा तक नहीं हुई।

6 लाख से ज्यादा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 10 करोड़ घरों की महिलाओं तक पहुंचने के लिए स्मार्टफोन दिए जाएँगे। लेकिन सालों से उनके स्थाईकरण व निउनतम वेतन की माँग पर चर्चा भी नहीं।

गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, किसानों की दुर्दशा सुधारने के लिए बजट में कुछ नहीं है। यह बजट उस 1 प्रतिशत का ही लाभ सुनिश्चित करता है, जिनके पास देश के 70 प्रतिशत लोगों से चार गुना ज्यादा संपत्ति है।

वैसे यह ध्यान देने की बात है कि मोदी सरकार ने एक तरीके से बजट की पुरानी अहमियत ही ख़त्म कर दी है। सारा काम बजट प्रस्तुत होने के पहले या बाद होता रहता है। बजट महज औपचारिकता रह गई है। लेकिन इसकी दिशा देश को पूरी तरह से देशी-विदेशी मुनाफाखोरों को सौपने की ओर ‘खुला खेल फर्रुखाबादी’ है।

पूर्ण बहुमत वाले मोदी-2 सरकार के इस बजट की खास बातें-

निजीकरण की गति तेज

बजट में वित्त मंत्री ने एलआईसी और आईडीबीआई में अपनी हिस्सेदारी बेचने का ऐलान किया है। एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम, कंटेनर कारपोरेशन, टीएचडीसी आदि बेचने का फैसला इस बजट से पहले ही सरकार ले चुकी है, रेलवे के निजीकरण की दिशा में भी सरकार तेजी से बढ़ रही है,1000 रेलवे ट्रैक के निजीकरण की सरकार की योजना है।

एलआईसी जाएगा निजी हाथों में

एलआईसी पर मुनाफाखोरों की कब से नज़र गड़ी थी। अथाह संपदा है एलआईसी के पास। ढेर सारा पैसा, बेशकीमती जमीनें और बिल्डिंगें हैं। बाज़ार के खिलाड़ी जाने कब से लार टपका रहे थे। रिजर्व बैंक का रिजर्व लूट लेने से जैसे मोदी सरकार का इस साल का दिवाला दूर न हुआ, एलआईसी पर टिक गया।

इस बजट में सरकार ने अपने विनिवेश कार्यक्रम के तहत देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में अपनी कुछ हिस्सेदारी आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के जरिए बेचने की घोषणा की है। एलआईसी को शेयर बाजारों में सूचीबद्ध कराया जाएगा।

साथ ही सरकार ने आईडीबीआई में अपनी हिस्सेदारी बेचने का भी ऐलान किया है।

रेलवे के निजी कारण की गति और तेज

पिछले साल मोदी-2 सरकार ने बजट में रेलवे के निजीकरण को जो गति दी थी, इस बजट में उसे और तेज दौड़ा दिया। भारतीय रेलवे अब किसान रेल की स्थापना करेगी। इसे पीपीपी (सार्वजानिक-निजी भागेदारी) मॉडल पर विकसित होगा। पीपीपी मॉडल के आधार पर 150 और ट्रेनें चलेंगी, निजी क्षेत्र की मदद से 4 स्टेशनों का री-डेवलपमेंट होगा। निज क्षेत्र की शुरू तेजस ट्रेनें और चलेंगी। अब ये पर्यटन और धार्मिक यात्राओं के नाम पर भी होंगी।

वैसे मोदी सरकार द्वारा रेल बजट को मुख्य बजट का हिस्सा 2014 में ही बनाकर इसकी अहमियत को काम कर दिया गया था। जाहिर है कि रेलवे का निजीकरण आसन हुआ है।

बिजली जाएगी निजी हाथों में

बजट प्रस्ताव में ऐलान हुआ कि देशभर में प्री पेड मीटर लगाए जाएंगे। इन स्मार्ट मीटरों में रेट चुनने और बिजली कंपनी को चुनने का विकल्प होगा। यानी बिजली के निजीकरण की मुक़म्मल व्यवस्था।

पीपीपी के बहाने निजीकरण की ओर बढ़ता क़दम

पीपीपी मॉडल वाले मेडिकल कॉलेज बनाने के नाम पर सारे जिला अस्पतालों का निजीकरण होगा।

सरकार का प्रस्ताव मेडिकल कॉलेजों को जिला अस्पतालों के साथ पीपीपी (सार्वजनिक निजी साझेदारी) मॉडल पर जोड़ने का भी है सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के जरिए हर जिला अस्पताल के साथ मेडिकल कॉलेज अटैच करने का प्रस्ताव किया गया है। यानी सार्वजनिक संपत्ति और पूँजी से बने अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज को निजी पूँजी के मालिकाने में दिया जायेगा जो उससे मुनाफा लूटेंगे।

पीपीपी मॉडल के तहत पांच नए स्मार्ट सिटी बनाएंगे। पिछले सौ स्मार्ट सिटी का ज़िक्र तक नहीं!

खाद्य सब्सिडी में कटौती

इस बार खाद्य सबसिडी पर बजट प्रावधान ही घटाकर 1.15 लाख करोड़ रु कर दिया गया है। इतनी बड़ी कटौती से खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ध्वंस सुनिश्चित है।

ज़ाहिर है कि पूँजीपतियों को कॉर्पोरेट टैक्स में दी गई डेढ़ लाख करोड़ रु की छूट का आधा हिस्सा गरीब लोगों के मुँह का निवाला छीनकर ही आया है। यह उस देश में जो पहले ही भूख सूचकांक में 117 देशों में 102वां हैं।

आयकर का नया फरमान नौकरीपेशा मध्यवर्ग से धोखा

वित्तमंत्री ने इनकम टैक्स ढांचे को सरल ने व मिडिल क्लास को राहत देने का दावा किया है। लेकिन असलियत यह है कि यह राहत सिर्फ उन लोगों को मिल पाएगी, जो 70 सुविधाएँ त्यागेंगे। जो किसी भी तरह की बचत नहीं कर पाते, जो किराये के मकान में नहीं रहते, या जिन्होंने होम लोन नहीं लिया है। नहीं तो पुरानी दरों के हिसाब से ही आयकर अदा करना होगा। यह गैस सिलिंडर पर सबसिडी लेने न लेने के चुनाव की तरह!

संगठित क्षेत्र की औपचारिक नौकरियों वाला मध्य वर्ग ही वह मुख्य तबका है जिसके सीमित सामाजिक सुरक्षा का आधार आयकर छूटें हैं। इनके खत्म होने का मतलब है पीएफ़/पीपीएफ़, जीवन बीमा, डाक घर बचत योजनाओं, म्यूचुअल फंड, आदि पर टैक्स छूट आंशिक/पूर्णतः समाप्त होना। इसके बाद धीरे-धीरे इस छूट की व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर इन स्कीमों को बंद करने की तरफ बढ़ा जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि इन योजनाओं को भी बंद करना भारत के पूँजीपति वर्ग की पुरानी माँग है।

. . .लेकिन कार्पोरेट को फायदा

पिछले बजट में पूँजीपतियो को आयकर में राहत दी गई थी, उसे बरकरार रखने के ऐलान से 15 लाख से अधिक करयोग्य आय पर महज 30 प्रतिशत इनकम टैक्स देना होगा।

निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए फाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट्स से जुड़ा कानून लाएंगे।

कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, कारोबार आसान बनाने के लिए उपाय किए गए। कॉर्पोरेट कर दर को 15 फीसदी के स्तर पर लाने का निर्णय लिया। इसके आलावा कारोबार सरल बनाने के नाम पर कंपनी कानून में कार्पोरेट के हित में बदलाव किया जाएगा। वित्त मंत्री ने साफ़ कहा कि करदाताओं को तंग नहीं किया जा सकेगा। यानी पूँजीपतियो को पूरी सुरक्षा की गारंटी दी है।

बेरोजगारी दूर करने की कोई योजना नहीं

युवाओं के लिए सरकार ने बजट में कोई राहत तो नहीं दी है, लेकिन एक रिक्रूटमेंट एजेंसी की स्थापना का शिगूफा छोड़ा है। निजीकरण-छंटनी-बंदी के इस दौर में रोजगार कहाँ से आएगा, इसकी कोई बात नहीं।

कृषि के अलावा देश के चार सेक्टर सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र हैं- रियल इस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग , टेक्सटाइल ओर ऑटोमोबाइल। इस बजट में किसी भी इंडस्ट्री के लिए कोई भी नया प्रावधान नहीं किया गया है। तो फिर रोजगार कहाँ से मिलेगा?

बेरोजगार इंजिनियरों के प्रशिक्षण का फंडा

बजट में इंजीनियरिंग पास करने वालों के प्रशिक्षण का ऐलान हुआ है। सरकार ने स्थानीय निकायों एवं अन्य एजेंसियों के साथ ट्रेनिंग और इंटर्नशिप दिलाने का ऐलान किया।

इसका एक अर्थ यह है कि बेरोजगार युवा इसमें उलझे रहें।

दूसरे, देश की दिग्गज कंपनियों को इन इंजीनियरों की ट्रेनिंग पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। अब वह काम सरकारी खर्च पर हो जाएगा। फिर कम्पनियाँ इनमे से फिक्स्ड टर्म में खटने के लिए भर्ती करेंगी। पूँजीपतियो की यह माँग भी पूरी हो गई।

बजट में मज़दूरों के वेतन में इजाफे पर कोई चर्चा तक नहीं हुई।

शिक्षा निजीकरण की ओर

मोदी सरकार नई शिक्षा नीति लेकर आएगी, जिसमे शिक्षा क्षेत्र में बाह्य वाणिज्यिक उधारी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। यानी शिक्षा पूरी तरह निजी व विदेशी कंपनियों के हवाले होगा। यानी शिक्षा वंचितों और निम्न मध्यम वर्ग की पहुँच से बाहर हो जाएगा। साथ ही इसका भगवाकरण की प्रक्रिया भी जारी है।

खुद सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण ने यह बात मानी कि निजीकरण व्यवसायीकरण से शिक्षा महँगी होकर समाज के वंचित समुदायों की पहुँच से बाहर हो रही है, खास तौर पर उच्च शिक्षा। लेकिन बजट में निजीकरण की ओर! यह और खर्चीली भी होगी और कूपमंडूक भी बनाएगी।

ज़ाहिर है कि शिक्षा महँगी होकर आम मेहनतकश जनता व वंचित समुदायों की पहुँच से बाहर हो जायेगी। समाधान के नाम पर 100 बड़े संस्थान ऑनलाइन कोर्स शुरू करेंगे, वंचित और गरीब लोग उससे पढ़ लें, उन्हें कॉलेज जाकर क्या करना है, मजदूर हैं मजदूर रहना है! असल में यह अधिसंख्य मेहनतकश जनता को शिक्षा से वंचित करने की शासक पूंजीपति वर्ग की सोची समझी सर्वसम्मत नीति है।  

किसानो को बनाया बेवकूफ

पिछली बार के 1.01 लाख करोड़ के मुकाबले इस बार किसानों के लिए 1.34 लाख करोड़ रुपए का बजट अलॉट किया गया। लेकिन, खाद सब्सिडी में इस बार 11 फीसदी की कटौती की गई है।

ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार मुहैया कराने वाली मनरेगा योजना के बजट में इस बार 9502 करोड़ रूपये की कटौती की है। इस साल के खेती किसानी से जुड़े क्षेत्र, सिंचाई, ग्रामीण विकास से जुड़े सरकारी खर्चों में तकरीबन 0.31 फीसदी की कमी की गयी है।

किसानों की आय दुगनी करने और ग्रामीण इनफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर असल में कृषि आधारित उद्योगों को बड़ी सुविधायें और रियायतें देने की घोषणा की गई है। किसान रेल, कृषि उड़ान, रेफ्रीजरेटेड ट्रक, वेयरहाउस, आदि के लिए खर्च कृषि उद्यमी और व्यापारी बन चुके अमीर पूँजीवादी फार्मरों और कृषि आधारित उद्योग चलाने वाले पूँजीपतियों के लाभ के लिए है।

निजता पर एक और हमला

बजट सरकारी डाटा के लिए नयी राष्ट्रीय नीति बनाने की बात करता है। यह गौरतलब है कि इस सरकार ने अब तक सरकारी आँकड़ों के साथ अभूतपूर्व छेड़-छाड़ की है। डाटा पार्क बनाने का प्रस्ताव सिर्फ़ आँकड़ा साम्राज्यवाद को मुहय्या करने का जरिया बनेगा, जबकि अमेरिका के दबाव में पहले ही निजता विधेयक के जरिये आँकड़ों के स्थानीयकरण को कमजोर किया जा चुका है।

कुलमिलाकर यह बजट उसी पूँजीपति जमात के हित को और कुशलता से साधने वाला है, जिसने अथाह रुपए झोंककर मोदी के प्रचंड बहुमत की सरकार बनवाने में भूमिका अदा की थी। इसीलिए बजट प्रस्ताव में मेहनतकश वर्ग कुछ पाने के नाम पर बहुत कुछ लुटाकर हसिए पर खड़ा है।

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