फ्रांस: तीखे दमन के बावजूद उग्र होता जन आंदोलन!

फ्रांस से जो तस्वीरें लगातार आ रही है वो दिन प्रतिदिन खतरनाक होती जा रही है। फ्रांस में राष्ट्रपति एमन्नुल मैंक्रा की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ चाहे वो सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के सेक्टरगत पेंशन स्कीम को बदलने का मामला हो, आय पर टैक्स वृद्धि, पर्यावरण के हित में पैट्रोल के मूल्य में वृद्धि का मामला हो, अप्रवासी मज़दूरों के दमन का मामला हो, ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले का मामला हो, जनता के अलग अलग हिस्से का विद्रोह अब संगठित होता जा रहा है। एक बाद एक विद्रोह नया स्वरूप ले रहा है और ट्रेड यूनियनों की भूमिका अब ज्यादा स्पष्ट है।

पिछले 5 दिसंबर से ट्रांसपोर्ट कर्मचारियों की हड़ताल लगातार 6 सप्ताह तक चली, जिसका एक हिस्सा अभी वापस काम पर लौट गया। पेरिस में 4.52 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। मेट्रो की 14 में से 12 रेल लाइनें बंद करनी पड़ीं। यह फ्रांस में 200 साल की सबसे बड़ी हड़ताल है।

सरकार 42 पेंशन योजनाओं को मिलाकर एक योजना बनाने तथा अन्य सुधार करने पर गौर कर रही है। इसे लेकर सरकार और रेलवे कर्मचारियों के बीच टकराव की स्थिति बन गयी है। इसके कारण फ्रांस में खासकर पेरिस तथा इसके बाहरी इलाकों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था चरमरा गयी है। क्षेत्रीय तथा लंबी दूरी की ट्रेनों पर भी इसका व्यापक असर हुआ है।

हड़ताल के राष्ट्रीय आहवान पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे। मेट्रो, बस, रेल, हवाई यातायात, बिजली विभाग, शिक्षा विभाग, खनन विभाग और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारी इसमें शामिल रहे। महीने भर से फ्रांस उबाल पर है।

फ्रांस की सरकारी रेलवे कंपनी एसएनसीएफ में इससे पहले 1986-87 के दौरान वेतन तथा कार्य परिस्थितियों को लेकर सबसे लंबी हड़ताल हुई थी जो 28 दिन चली थी।

कर्मचारियों और जनता का संघर्ष अब सरकार की आर्थिक नीतियों और पुलिस की दमनकारी भूमिका के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ अख़्तियार कर रहा है। पिछले दिनों अग्निशमन विभाग के कर्मचारी भी इस विरोध में शामिल हुए। फ्रांस से आ रही तस्वीरों में वर्दी पहने दमकल कर्मियों की सीधी भिडंत पुलिस के साथ देखी जा सकती है। फ्रांस में पुलिसिया दमन अब तीखा हो चुका है। हालांकि दो पुलिस यूनियनों ने हड़ताल के समर्थन में ड्यूटी पर सांकेतिक रूप से भाग लिया।

फ्रांस में पेरिस और बड़े शहरों के आसपास के छोटे शहरों से अल्पसंख्यकों समूहों के, जहां माना जा रहा था कि इस्लामिक स्टेट का प्रभाव हो सकता है, युवा और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर लगातार बढ़ती बेरोजगारी और सामाजिक अलगाव और इन सब का कोई समाधान देने में विफल सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे है।

हाल ही में फ्रांस सरकार ने अप्रवासियों से संबंधित कानूनी प्रावधान सख़्त कर दिए थे। तमाम विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर फ्रांस की सरकार को प्रस्तावित सुधारों को लागू करने में सोचना पड़ रहा है मगर राष्ट्रपति मैंक्रो इसे वापस लेने के लिए तैयार नहीं है।

कहा जा रहा है कि सभ्यता, कला और संस्कृति के केंद्र फ्रांस के सार्वजनिक जीवन का सबसे बुरा दौर है।

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