सप्ताह की कविताएँ : गणतंत्र दिवस पर

देशगान / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।
बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है।

आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है।
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

हैं सभी माहिर उगाने
में हथेली पर फसल
औ हथेली डोलती दर-दर बनी दरवेश है।
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

पेड़ हो या आदमी
कोई फरक पड़ता नहीं
लाख काटे जाइए जंगल हमेशा शेष हैं।
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

प्रश्न जितने बढ़ रहे
घट रहे उतने जवाब
होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है।
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

खूँटियों पर ही टँगा
रह जाएगा क्या आदमी ?
सोचता, उसका नहीं यह खूँटियों का दोष है।
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।


गणतंत्र दिवस / गोरख पांडे

जन गण मन अधिनायक जय हे !
जय हे हरित क्रांति निर्माता
जय गेहूँ हथियार प्रदाता
जय हे भारत भाग्य विधाता
अंग्रेजी के गायक जय हे !

जन गण मन अधिनायक जय हे !
जय समाजवादी रंग वाली
जय हे शांतिसंधि विकराली
जय हे टैंक महाबलशाली
प्रभुता के परिचायक जय हे !

जन गण मन अधिनायक जय हे !
जय हे जमींदार पूंजीपति
जय दलाल शोषण में सन्मति
जय हे लोकतन्त्र की दुर्गति
भ्रष्टाचार विधायक जय हे !

जन गण मन अधिनायक जय हे !
जय पाखंड और बर्बरता
जय तानाशाही सुन्दरता
जय हे दमन भूख निर्भरता
सकल अमंगलदायक जय हे !
जन गण मन अधिनायक जय हे !

(रचनाकाल: 1982)


भारत-भाग्य-विधाता / रघुवीर सहाय

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चँवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।

पूरब-पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।


आए दिन बहार के / नागार्जुन

स्वेत-स्याम-रतनार अँखिया निहार के
सिण्डकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार के
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के
खिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार के
आए दिन बहार के !

बन गया निजी काम-
दिलाएंगे और अन्न दान के, उधार के
टल गये संकट यू.पी.-बिहार के
लौटे टिकट मार के
आए दिन बहार के !

सपने दिखे कार के
गगन-विहार के
सीखेंगे नखरे, समुन्दर-पार के
लौटे टिकट मार के
आए दिन बहार के !

(रचनाकाल: 1966)


कौन आज़ाद हुवा ? / अली सरदार जाफरी

कौन आज़ाद हुवा ?
किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी ?
मेरे सीने मे दर्द है महकूमी का
मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही
कौन आज़ाद हुआ ?

खंजर आज़ाद है सीने मे उतरने के लिए
वर्दी आज़ाद है बेगुनाहों पर जुल्मो सितम के लिए
मौत आज़ाद है लाशों पर गुजरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

काले बाज़ार मे बदशक्ल चुड़ैलों की तरह
क़ीमतें काली दुकानों पर खड़ी रहती है
हर खरीदार की जेबों को कतरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

कारखानों मे लगा रहता है
साँस लेती हुयी लाशों का हुजूम
बीच मे उनके फिरा करती है बेकारी भी
अपने खूंखार दहन खोले हुए
कौन आज़ाद हुआ ?

रोटियाँ चकलो की कहवाएँ हैं
जिनको सरमाये के दल्लालों ने
नफाखोरी के झरोखों मे सजा रखा है
बालियाँ धान की गेंहूँ के सुनहरे ख़ोशे
मिस्र ओ यूनान के मजबूर गुलामों की तरह
अजबनी देश के बाजारों मे बिक जाते हैं
और बदबख्त किसानों की तडपती हुयी रूह
अपने अल्फाज मे मुंह ढांप के सो जाती है

कौन आजाद हुआ ?


गणतंत्र / हूबनाथ

तंत्र फंस गया है
बुरी तरह
गणों के बीच
गण हांक रहे चहुं ओर से
किसी गण के हाथ सोंटा
तो किसी के हाथ संटी
तो कुछ तालियां बजा बजा
सुस्कारी मार
टिटकारी देते दुलराते
हांके जा रहे
भीषण जाड़े में
मुंह से भाप फेंकता
ठिठुरता जकड़ता
जाड़े में अकड़ता तंत्र
अड़ गया है चौराहे पर
टस से मस नहीं हो रहा
दाईं ओर से ज़ोर अधिक
तो बाएं की ज़िद जबर
अगवाड़े पंडा
तो पिछवाड़े डंडा
ठंडा पड़ा तंत्र
जम रहा है सड़क पर
लहू मिले बरफ की तरह
और गण और तंत्र से बाहर
बुझे अलाव के गिर्द
एक चिनगारी की आस में
जुटी हताश भीड़
कुरेदे जा रही श्मशानी राख
अतीत वर्तमान और भविष्य की
सभी के मुंह काले
हाथ राख भरे
सारी चिताएं बरफ की नदी में
दूर दूर तक सिर्फ धूसर सन्नाटा
तीनों चारों रंग दम तोड़ चुके
बारी तंत्र की है
कब तक सहेगा बोझ गणों का
कोई कोंच रहा
कोई खदेड़ रहा
कोई लोहकार रहा
तो कोई सिर्फ पुकार रहा
पूरी करुणा से
पूरी याचना से
भारी यातना से
पर आखिर सुने कौन
सब तो व्यस्त हैं
पस्त हैं
मस्त हैं



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