जेयर बोल्सोनारो और नरेंद्र मोदी अपने देश के नागरिकों के दुश्मन हैं।

एक व्यक्ति जिसने बार-बार तानाशाही से प्यार दिखाया है और यातना का उपयोग करने की वकालत की है, वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में संविधान के वार्षिक उत्सव में सम्मानित अतिथि के लिए एक भद्दा चुनाव है। ब्राजील के कुख्यात राष्ट्रपति, जेयर बोल्सोनारो को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत के गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित किया गया क्योंकि दोनों एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।

दुनिया भर में तानाशाही राष्ट्रवाद अपने पांव पसार रहा है और लोकतंत्र विरोधी नेता अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों के शीर्ष पर हैं, जिसमें भारत और ब्राजील भी शामिल हैं, साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका भी। यह सभी के लिए बुरी खबर है, लेकिन अल्पसंख्यकों के विशेष रूप खतरा है क्योंकि इन लोकतंत्रों का दावा है कि राष्ट्र की भलाई यानी राष्ट्रहित में “उनके” अधिकारों का बलिदान किया जाना चाहिए। बोलसनारो और मोदी पहले ही इस खतरनाक इरादे को लेकर कई महत्वपूर्ण कदम उठा चुके हैं।

जबकि ब्राज़ील के मूलनिवासियों/आदिवासियों के खिलाफ बोल्सोनारो द्वारा छेड़े गए युद्ध को अंतर्राष्ट्रीय प्रेस द्वारा बड़े पैमाने पर कवर किया गया है और सोशल मीडिया पर भी इसकी बहुत चर्चा की गई है, मगर भारत में आदिवासियों या जंगल में रहने वाले लोगों के साथ क्या बीत रही है इसके बारे में बहुत कम पढ़ा सुना गया है। भारत पृथ्वी पर किसी भी अन्य देश की तुलना में ज्यादा आदिवासी निवास करते हैं: दुनिया भर में अनुमानित 370 मिलियन मूलनिवासियों और आदिवासी लोगों में से 100 मिलियन से अधिक भारत में रहते हैं।

भारत के नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के मुसलमानों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं व्यक्त की जारही है, लेकिन यह कानून आदिवासी समुदायों के लिए भी उतना ही विनाशकारी है।

आदिवासी कार्यकर्ता और लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग के अनुसार:
“आदिवासियों [जनजातीय लोगों] को उनकी नागरिकता से वंचित कर दिया जाएगा, बंदी शिविरों में हिरासत में रखा जाएगा और घुसपैठियों को उनकी ज़मीन और इलाकों में पुनर्वासित किया जाएगा। यह मंज़ूर नहीं है। आदिवासी देश के पहले निवासी हैं, उन्हें सीएए / एनआरसी से बाहर रखा जाना चाहिए और उनकी ज़मीन, इलाकों और संसाधनों को संरक्षित किया जाना चाहिए। ”

भूमि की चोरी, दुनिया भर में प्रभावशाली तबकों या सभ्य समाज़ की वजह से मूलनिवासी और आदिवासी लोगों के सामने मौजूद अस्तित्व के खतरे की एक मुख्य वजह है। हाल के वर्षों में, भारत और ब्राजील दोनों देश के आदिवासियों के सामने यह खतरा बढ़ गया है क्योंकि मोदी और बोल्सनारो की सरकार लोकलुभावने, उन प्रमुख एजेंडा को आगे बढ़ाते हैं, जो “देश की भलाई के लिए आदिवासियों की जमीन और संसाधनों” कब्जा करने की बात करते हैं।

पिछले सप्ताह, ब्राजील में कायापो की प्रमुख और ऐक्टिविस्ट रौनी मेटुकटायर ने ब्राजील के आदिवासी लोगों की एक बैठक बुलाई थी, ” एकजुट होने के लक्ष्य के साथ यह घोषणा की गई कि ब्राजील में नरसंहार, जातीय नरसंहार और पर्यावरण के संहार की एक राजनीतिक परियोजना चल रही है।” बोलसनारो का ताजा हमला: प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की छूट देने के लिए जैसे कि सोने और तेल के लिए खनन, और आदिवासी इलाकों में कृषि और पर्यटन जैसी आर्थिक गतिविधियां शूरू करने के लिए नए कानून के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया स्वरूप यह बैठक बुलाई गई थी। यदि बिल पास हो जाता है, तो जनजातीय समूहों और आदिवासी समुदायों के पास ऐसी परियोजनाओं को नकारने का अधिकार छिन जाएगा।

भारत में भी सत्ता के संरक्षण में भूमि की चोरी बड़े पैमाने पर हो रही है। वर्तमान में करीब एक करोड़ आदिवासी (न्यूयॉर्क की आबादी के बराबर संख्या) अपनी जमीन से बेदखल हो जाने के खतरे का सामना कर रहे हैं। यह सरकार द्वारा वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) को चुनौती देने वाले एक अदालती मामले को लापरवाही या जानबूझकर नजरअंदाज करने का परिणाम है, यह कानून भारत में वनों में रहने वाले लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस कानून के खत्म हो जाने से प्रभावित होने वाले अपने नागरिकों को नजरअंदाज करते हुए भारत सरकार की जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने अपने स्वयं के कानून के रक्षा के लिए अदालत में सुनवाई के दौरान उपस्थित होना भी जरूरी नहीं समझा। अदालत ने अपने फैसले में आदिवासियों और जंगल के निवासियों की बेदखली का आदेश सुना दिया।
इस तथ्यात्मक रूप से गलत अदालती फैसले के खिलाफ उपजी नाराजगी और विरोध के कारण फिलहाल बेदखली के इस आदेश को स्थगित कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट मामले की अगली सुनवाई आसन्न तरीके से करेगा।

भारत में जनजातीय लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह, नेशनल आदिवासी अलायंस (एनएए) के वी.एस. रॉय डेविड ने कहा है: “हम इस प्रतिगामी जन-विरोधी आदेश का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करते हैं जो लाखों आदिवासियों और जंगल के अन्य पारंपरिक निवासियों को सड़क पर ला देगा। ”

सर्विवाल इंटरनेशनल ने भारत में जंगल में रहने वाले जनजातियों के अधिकारों के लिए दशकों से अभियान चला रखा है। यह पिछली अतीत में हुई बेदखली की कार्रवाईयों के भयावह परिणामों को उजागर करता है, जैसे कि पच्चेरु गांव के चेंचू लोग, जो 1980 के दशक में संरक्षण के नाम पर बेदखल किए गए थे। बचे हुए चेंचू लोगों की रिपोर्ट है कि जहां गाँव में 750 परिवार रहते थे, वहाँ बेदखली होने के बाद सिर्फ 160 परिवार बच गए। कई लोग भूखे मर गए।

चीफ रौनी, वी.एस. रॉय डेविड, ग्लैडसन डुंगडुंग और उनके घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों का प्रतिरोध शक्तिशाली और प्रभावी साबित हुआ हैं। बोल्सेनरो और मोदी शासन दोनों ने जनजातीय और आदिवासी लोगों के हित के लिए बने संरक्षण और कानूनों को ख़त्म करने के लिए कानून प्रस्तावित कर रखें हैं, लेकिन विरोध की वजह से इन सरकारों को इन प्रस्तावों को अभी कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा है:

2019 में, भारत के औपनिवेशिक वन कानून में प्रस्तावित संशोधन का एक गुप्त मसौदा प्रेस में लीक हो गया था। इसने वन रक्षकों को आदिवासी लोगों को गोली मारने, सामूहिक दंड देने, संपत्ति जब्त करने और नागरिकों को बचने का कोई रास्ता ना देते हुए गिरफ्तार करने की अनुमति दी। इसने अधिकारियों को एफआरए के तहत प्रदान किए गए अधिकारों को छीनने और वन भूमि को निजी कंपनियों को सौंपने की अनुमति दी। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विरोधों के बाद, इसके लीक होने के आठ महीने बाद, भारत सरकार ने कानून में प्रस्तावित इन बदलावों को वापस ले लिया, हालांकि अभी डर बना हुआ है कि सरकार इसे किसी और तरीके से वापस ले आएगी।

बोल्सनरो शासन ने जनजातीय स्वास्थ्य प्रणाली, एसईएसएआई को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया, जो 34 जनजातीय विशेष स्वास्थ्य जिलों में चल रही विकेन्द्रीकृत देखभाल की व्यवस्था है, जो स्थानीय समुदायों के सहयोग से चलता है और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप है। जनजातीय समूहों ने SESAI के विघटन को अपने जीवन और विशेष रूप से अपने बच्चों और बुजुर्गों के जीवन के लिए सीधे खतरा मान रहे हैं। इस प्रस्ताव के खिलाफ पूरे देश में जनजातिय लोगों में आक्रोश और विरोध फैल गया। पराना से रोंडोनिया तक, पेरनामबुको से माटो ग्रोसो डो सुल तक, जनजातीय समूहों ने SESAI के समर्थन में सार्वजनिक भवनों और राजमार्गों पर कब्जा कर लिया। तब स्वास्थ्य मंत्रालय पीछे हटा और आश्वासन दिया कि कार्यक्रम को समाप्त नहीं किया जाएगा, यह घटना इस प्रस्ताव के पहली बार सामने आने के 1 सप्ताह के बाद की है।

ब्राज़ील और भारत ऐसे राज्य हैं जिनकी स्थापना में विविधता का पहलू मूल रूप से शामिल है और यही इनकी पहचान है। दोनों देशों के पास अपनी संविधान में अपने जनजातीय और आदिवासी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के प्रावधान मौजूद हैं। जो भी संवैधानिक लोकतंत्र में विश्वास करता है, उसे भारत और ब्राजील के जनजातीय और आदिवासी लोगों के साथ उनके संघर्ष में साथ खड़ा होना चाहिए। यह जनजातियों के लिए, प्रकृति के लिए, सभी मानवता के लिए उठ खड़े होने का समय है।

जेस फ्रैंकलीन का यह लेख मूल रूप से काउंटरपंच पर अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है।

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