ग्राम्शी : जिन्होंने मज़दूर वर्ग को नई दिशा दी

इटली में फासीवाद के खिलाफ लगातार संघर्षरत रहे मज़दूर वर्ग के नेता कॉमरेड एंटोनियो ग्राम्शी के जन्मदिवस 23 जनवरी पर

आज भारत में मज़दूर वर्ग के सामने जिस प्रकार की स्थितियां बन रही है, ठीक ऐसी ही स्थितियां 100 साल पहले इटली देश में बनी थी। हमारे देश मे भी फासीवाद के उभार के साथ मेहनतकश आवाम पर पहले से ज्यादा मानसिक नियंत्रण के साथ सांस्कृतिक वर्चस्व कायम हो गया है। ऐसे में कॉमरेड ग्राम्शी के विचार की अहमियत आज और ज्यादा बढ़ गई है।

इटली में फासीवाद और मज़दूर वर्ग

100 साल पहले का वह दौर था, जब प्रथम विश्व युद्ध के त्रासदपूर्ण दौर से बाहर निकले पराजित इटली में बेहद संकट का समय था। ऐसे में जहाँ मज़दूरवर्ग अपने संघर्ष को नया रूप दे रहा था, तो दूसरी ओर मुसोलिनी के नेतृत्व में फासिस्ट पार्टी का उभर हुआ और उसने मेहनतकश जमात पर बड़ा हमला बोला। लोकलुभावन नारों के साथ उसने सभी प्रकार के जनवादी अधिकारों को रौंदते हुए फासिस्ट तानाशाही स्थापित की थी। जिसने हिटलर के नेतृत्व वाली जर्मनी की नाज़ी सत्ता के नापाक गंठजोड़ से पूरी दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध मे झोंक दिया था।

ग्राम्शी मज़दूर वर्ग के उन नेताओं में शामिल थे, जो दमनकारी और विकट यातनादाई परिस्थितियों में भी फासीवाद व पूँजीवादी शोषण के हर रूपों के ख़िलाफ़ संघर्षरत रहे और मज़दूर वर्ग की हिफाज़त में मृत्यु तक डटे रहे। 

ग्राम्शी का संघर्षपूर्ण जीवन

ग्राम्शी का जन्म 23 जनवरी 1891 को इटली के सर्दिनिया में एल्स के एक गांव में हुआ था।  इटली की फासीवादी सरकार ने नवंबर 1926 में राज्य सुरक्षा कानून की घोषणा की और 8 नवंबर 1926 को क्रांति को गिरफ्तार किया गया इस दौरान ग्राम्शी को भयावह यातनाओं से गुजरना पड़ा। 1926-1937 के दौरान अमानवीय परिस्थितियों में 11 साल के जेल जीवन के दौरान उनकी मौत हो गई, लेकिन इस पूरे विकट दौर में भी वे लगातार सक्रिय रहे, मज़दूर वर्ग की मुक्ति के बारे में लगातार सोचते और लिखते रहे।

ग्राम्शी एक निर्धन परिवार से आते थे। उन्हें अपने छात्र जीवन में ही कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी। वे लिखते हैं कि “जब मैं 11 वर्ष का था तभी से काम करना शुरू कर दिया था।” वे बताते हैं कि “महीने में नौ लायर कमाता था (जो 1 किलो रोटी के बराबर था) जिसके लिए मुझे प्रतिदिन 10 घंटे काम करना पड़ता था, जिसमें रविवार भी शामिल था। मुझे रजिस्टर उठाने पड़ते थे, जो मेरे वजन से ज्यादा होता था। कई रात तो मैं चुपचाप रोता रहा, क्योंकि मेरे सारे बदन मे दर्द था।

इन्हीं स्थितियों में ग्राम्शी का मज़दूर वर्ग के प्रति लगाओ, जुड़ाव और वैचारिक विकास साथ-साथ हुआ और वे मार्क्सवाद के प्रबल प्रवक्ता बने।

वैचारिक विकास के साथ मज़दूरों को दी नई दिशा

अपने अध्ययन के दौरान ही वे तुरिन गए, जहाँ वे मज़दूर वर्ग के आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने इटली के समाजवादी आंदोलन को ‘एक आवश्यक और नई विशेषता प्रदान की’। वे उस वक्त के कम्युनिस्ट आंदोलन में, विशेष रुप से दूसरे इंटरनेशनल द्वारा फैलाए जा रहे वैचारिक भ्रम के खिलाफ लेनिन के संघर्ष के साथ खड़े रहे। उन्होंने स्पष्ट किया कि मज़दूर वर्ग को वास्तव में इटली के इतिहास के नायक के रूप में अपनी भूमिका की पहचान करनी चाहिए।

दूसरे विश्व युद्ध के त्रासदपूर्ण दौर के बाद वे मज़दूर आंदोलन के अभिन्न हिस्सा बने। उन्होंने 1919 में ‘आर्दाइन न्योवो’ नामक एक समाचार पत्र की शुरुआत की। इस समय इटली में मज़दूरों का एक शानदार आंदोलन- ‘फैक्ट्री काउंसिल आंदोलन’ आगे बढ़ रहा था।

सितंबर 1919 में मज़दूरों ने नगर के सबसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान के संचालन को अपने हाथों के लिया। उद्योगपतियों को फैक्ट्री काउंसिल के आधिपत्य को मान्यता देने के लिए विवश होना पड़ा। इसे विफल करने की कोशिश के जवाब में राजनीतिक आम हड़ताल हो गई, जिसमें औद्योगिक और खेतिहर मजदूर भी शामिल हुए। 2 वर्ष तक चले संघर्ष में विफलता मिली, लेकिन इटली के मजदूर आंदोलन के लिए महवपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

ग्राम्शी ने इस आंदोलन के अनुभवों से अपने को समृद्ध किया, जिसके आधार पर उन्होनें इटली क्रांति के सिद्धांत का विकास किया। 1921 में इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। इसी दौर में फासिस्ट पार्टी का भी विकास आगे बढ़ा। जिसके खिलाफ एक सही संघर्ष को आगे बढ़ाने में उन्होंने महती भूमिका निभाई। 1924 में वे पार्टी के महा सचिव निर्वाचित हुए।

1924 में इटली में संसद का चुनाव हुआ। फासीवादी आतंक के बावजूद जनता ने कम्युनिस्ट और समाजवादी उम्मीदवारों को भी अप्रत्याशित बहुमत से जिताया, इनमें ग्राम्शी भी शामिल थे। लेकिन मुसोलिनी की फासिस्ट नीतियों ने संसद में चुने गए प्रतिनिधियों को बाहर कर दिया। जिसके खिलाफ आम हड़ताल की घोषणा हुई।

ग्राम्शी ने इटली में बढ़ रहे हैं फासीवाद से लड़ने की एक मुकम्मल योजना पेश की और संघर्ष को आगे बढ़ा रहे थे कि इसी दौरान 1926 नवंबर के अंत में इटली की फासीवादी सरकार ने राज्य सुरक्षा के लिए एक मनमाना कानून घोषित किया। जिसके तहत फासिस्ट सरकार का अधिनायकत्व शुरू हो गया। सरकार की नीतिओं की मुखालफत करने वाली सारी संस्थाएं प्रतिबंधित हो गईं और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं।

नवम्बर 1926 को ग्राम्शी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर एकतरफा मुकदमा चला और उन्हें 20 साल कैद की सजा सुनाई गई। जजों ने फैसले के बाद ग्राम्शी को इंगित करते हुए बोला “20 वर्षों तक इस मस्तिष्क को काम करने से रोक देना चाहिए।” फासिस्ट उनके दिमाग को पंगु बनाना चाहते थे, क्योंकि वे सोचते थे कि 20 वर्ष तक कैद रहने के बाद वे मज़दूरों की मुक्ति के बारे में सोचने लायक ही नहीं रहेगा।

इस दौरान उन्हें भयानक यातनाएं दी गई,  बीमारियों के बावजूद उनका इलाज नहीं कराया जाता था, सोने नहीं दिया जाता और नाम मात्र का खाना दिया जाता था। जिससे उनका स्वास्थ्य और भी ज्यादा खराब हो गया। इन विकट स्थितियों के बावजूद ग्राम्शी फासीवाद और साम्राज्यवादी-पूँजीवादी शोषण और मजदूर की मुक्ति के रास्ते पर लगातार लिखते रहे। उनकी जेल रचनाएं आज भी इटली ही नहीं पूरी दुनिया के मज़दूरों के लिए, विशेष रूप से फासीवाद से संघर्ष के लिए महत्वपूर्ण हैं।

सांस्कृतिक वर्चस्व शोषकों का हथियार है!

उन्होंने बताया कि किस तरह फासीवादी और दुनिया के शोषक पूँजीपति मज़दूरों के मस्तिष्क पर अधिकार कायम कर लेते हैं, उन्हें बंटवारे की राजनीति का शिकार बनते हैं और अपनी शोषणकारी नीतियों को लागू करने के लिए मज़दूरों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसी को उन्होंने ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ (वर्चस्व) का नाम दिया और इसको पूँजीवाद के सुरक्षाकवच की संज्ञा दी।

ग्राम्शी ने बताया था कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पूँजीवाद न केवल हिंसा और राजनीतिक-आर्थिक मनमानी का सहारा लेता है, बल्कि वह सामाजिक आदर्शो एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को भी अपने विमर्श में मनमाना रूप दे देता है। परिणामस्वरूप पूँजीवादी विचार जनमानस की सामान्य तर्कबुद्धि में गहरे पैठ जाते हैं। इससे समाज, विशेषकर श्रमिक वर्ग के बीच यह रजामंदी बनने लगती है कि मज़दूर वर्ग तथा बुर्जुआवर्ग के हित परस्पर स्वतंत्र एवं एक-दूसरे से भिन्न हैं। यह प्रवृत्ति उन्हें परिस्थिति से अनुकूलन की ओर ले जाती है। जो अंततः श्रमिक आक्रोश और उसके संघर्ष को कमजोर करता है। अपनी बुरी स्थिति को वह अपनी नियति मानने लगता है और उसके निदान के लिए धार्मिक शक्तियों की शरण में चला जाता है। इससे न केवल उसका संघर्ष कमजोर पड़ता है, बल्कि संकट के लिए जिम्मेदार कारकों से मुक्ति की उसकी छटपटाहट भी कमजोर पड़ने लगती है। उसकी यह प्रवृत्ति धर्मसत्ता को समाज में अपरिहार्य एवं शक्तिसंपन्न बनाती है, जो सर्वहारा के मुक्ति-संघर्ष को कमजोर करने का काम करता है।

ग्राम्शी के ये विचार आज मज़दूर आन्दोलन में विकट समस्या के रूप में सामने हैं, जिसकी रौशनी में मज़दूर आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए नए हथियारों को विक्सित किया जाना जरूरी है।

27 अप्रैल 1937 को 11 वर्षों की कठोर जेल यात्रा के उपरांत कॉमरेड ग्राम्शी की दुखद मृत्यु हो गई, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। फासीवादी उभर के इस दौर में और भी ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो गए हैं।

ग्राम्शी ने अपने बहन को जेल से भेजे पत्र में लिखा था- “मेरा कारावास एक राजनीतिक लड़ाई है, जो लड़ी गई है और जो सिर्फ इटली में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लड़ी जाएगी और कौन जानता है यह कब तक जारी रहेगी?”

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