मज़दूर वर्ग के शिक्षक व दोस्त थे लेनिन

कॉमरेड लेनिन (जन्मदिवस 22 अप्रैल – निधन 21 जनवरी ) पर उन्हें याद करते और प्रेरणा लेते हुए…

मज़दूर वर्ग पर भयावह हमलों के इस दौर में मज़दूर वर्ग के महान नेता, शिक्षक, दोस्त और दुनिया की पहली सफल मज़दूर क्रान्ति के नेता लेनिन को याद करना आज पहले से ज्यादा प्रासंगिक है। लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ में पहले समाजवादी राज्य की स्थापना हुई थी, जिसने दुनिया को दिखा दिया कि शोषण-उत्पीड़न के बन्धनों से मुक्त होकर मेहनतकश जनता कितना चमत्कार कर सकती है।

व्लादीमिर इल्यीच लेनिन का जन्म 22 अप्रैल 1870 को रूस के सिम्बीर्स्क नामक एक छोटे-से शहर में हुआ था। उन दिनों रूस में ज़ारशाही का निरंकुश शासन था। उस दौर में जहाँ मेहनतकश मज़दूर तथा किसान भयंकर शोषण और उत्पीड़न का शिकार थे, वहीँ, पूँजीपति, जागीरदार और ज़ारशाही के अफ़सर ऐयाशीभरी ज़िन्दगी बिताते थे। लेनिन 13 वर्ष के थे तभी उनके बड़े भाई अलेक्सान्द्र को ज़ार की हत्या की साजिश में फाँसी पर चढ़ा दिया गया और उनकी बड़ी बहन आन्ना को जेल में डाल दिया गया था। इन घटनाओं का उनपर गहरा असर पड़ा।

क़ानून की पढ़ाई करने के दौरान उन्होंने छात्र आन्दोलनों में भागेदारी शुरू की। इसी दौर में कार्ल मार्क्स तथा फ्रे़डरिक एंगेल्स की रचनाओं से उनका परिचय हुआ। रूसी क्रान्तिकारी नेता प्लेखानोव द्वारा बनाये गये ‘श्रमिक मुक्ति दल’ में वह सक्रिय हुए।

लेनिन सेण्ट पीटर्सबर्ग आकर मज़दूरों को संगठित करने के काम में जुट गये। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर मज़दूरों के कई अध्ययन मण्डल शुरू किये और फिर ‘श्रमिक मुक्ति के लिए संघर्ष की सेण्ट पीटर्सबर्ग लीग’ नामक संगठन में सबको एकजुट किया। संघर्ष व अध्ययन के साथ लेनिन ने यह स्थापित किया कि एक क्रान्तिकारी पार्टी की अगुवाई में मज़दूर क्रान्ति के द्वारा ही रूसी जनता की मुश्किलों का अन्त हो सकता है। उन्होंने कहा कि मज़दूरों को केवल अपनी तनख़्वाह बढ़वाने और कुछ सुविधाएँ हासिल करने की लड़ाई में नहीं उलझे रहना चाहिए बल्कि उन्हें सत्ता अपने हाथ में लेने के लिए संघर्ष करना चाहिए।

लेनिन ने बताया कि क्रान्ति करने के लिए पेशेवर कार्यकर्ताओं वाले मज़दूर वर्ग की एक क्रान्तिकारी पार्टी का होना ज़रूरी है। उन्होंने मार्क्सवाद को उन्नत करते हुए पूँजीवाद की चरम अवस्था, साम्राज्यवाद के दौर में मज़दूर वर्ग की मुक्ति का सिद्धांत दिया और उसे 1917 की रूसी (अक्टूबर) क्रांति से सत्यापित भी किया। क्रान्ति के बाद मज़दूर-मेहनतकश की मुक्ति का रह खुली। \

रातोरात भूमि-सम्बन्धी आज्ञापत्र जारी करके ज़मीन पर ज़मींदारों का मालिकाना बिना मुआवज़े के ख़त्म कर दिया गया। ज़मीन इस्तेमाल के लिए उसे जोतने वाले किसानों को दे दी गयी, किसानों को लगान से मुक्त कर दिया गया और तमाम खनिज संसाधन, जंगल और जलाशय जनता की सम्पत्ति हो गये। सभी कारख़ाने राज्य की सम्पत्ति बन गये और तमाम विदेशी क़र्ज़े ज़ब्त कर लिये गये।

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सोवियत रूस में मज़दूरों का राज क़ायम होते ही सारी दुनिया के लुटेरे पूँजीपति बौखला उठे। मज़दूरों के राज को ख़ून की नदियों में डुबो देने के लिए रूस और दुनिया के सरे लूटेरे एकजुट हमला बोल दिए। एक तरफ ज़ारशाही के पुराने जनरलों की फ़ौज और क्रान्ति-विरोधियों के विभिन्न गुटों का हमला, तो दूसरी ओर अठारह देशों की सेनाओं का हमला। लेकिन लेनिन के नेतृत्व और कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई में सारे देश के मेहनतकश अपने राज्य की हिफ़ाज़त करने के लिए उठ खड़े हुए। 1917 से 1921 तक रूस में भीषण गृहयुद्ध चलता रहा और मज़दूर वर्ग की जीत हुई।

तमाम संकटों को झेलते हुए लेनिन की देखरेख में समाजवादी निर्माण का काम ज़ोर-शोर से शुरू हुआ, जिसने कई कीर्तिमान बनाए। मज़दूर वर्ग की सोई हुई ताक़त को जगाकर लेनिन के नेतृत्व में जो कुछ स्थापित हुआ, वह पूँजीवादी पुरोधाओं को भी विस्मृत कर दिया।

1918 में क्रान्ति के दुश्मनों की साज़िश के तहत एक हत्यारे द्वारा चलायी गयी गोलियों से लेनिन बुरी तरह घायल हो गये थे। कुछ सप्ताह बाद वह फिर काम पर लौट आये, लेकिन कभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सके। 21 जनवरी 1924 को सिर्फ़ 53 वर्ष की उम्र में लेनिन का निधन हो गया।

कॉमरेड लेनिन आज भी मेहनतकश वर्ग के प्रेरणा के श्रोत हैं, उनकी मुक्ति के पथ के राही हैं।

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