8 जनवरी की हड़ताल सम्पन्न, अब आगे क्या होगा?

सालाना हड़ताल तो महज रस्म अदायगी है! इसे निरन्तरता के साथ जुझारू आन्दोलन में बदलना होगा!

पिछले वर्ष 8-9 जनवरी की आम हड़ताल के ठीक एक साल बाद इस वर्ष पुनः 8 जनवरी की देशव्यापी आम हड़ताल हुई। इससे पूर्व 2016 व 2017 में 2 सितम्बर की सालाना हड़तालें हुईं थीं। पिछले वर्ष के मुकाबले यह हड़ताल इस मायने में ज्यादा व्यापक रही कि धार्मिक बंटवारे के ख़तरनाक़ कुचक्रों के बावजूद इस बार मज़दूरों-कर्मचारियों के साथ छात्र और किसान भी हड़ताल में शामिल हुए।

इस बार की हड़ताल बेहद कठिन परिस्थितियों में हुई, क्योंकि मज़दूर-मेहनतकश पर लगातार हमले के बावजूद प्रचण्ड बहुमत से मोदी-2 की सरकार बनी और पहले से ज्यादा आक्रामक हमले बढ़े। जहाँ पूँजीपतियों को लाभ के लिए लम्बे संघर्षों के दौरान हासिल 44 श्रम क़ानूनों को 4 श्रम संहिताओं में बदलकर क़नूनी रूप देने, सार्वजनिक कम्पनियों को बेचने, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे पूरी तरह खोलने, छँटनी-बन्दी, फिक्स्ड टर्म-नीम ट्रेनी, सरकारी कर्मियों की जबरिया अवकाश आदि की गति बेलगाम हो गई। आर्थिक मंदी के साथ महँगाई-बेरोजगारी आसमान छूने लगी।

वहीं बुनियादी व नागरिक अधिकारों पर तेज हमले के साथ जनता को बाँटने वाले कश्मीर, 370, एनआरसी, एनपीआर, नागरिकता संसोधन क़ानून जैसे संघी एजेण्डे पर भी ख़़तरनाक़ खेल गति पकड़ चुका है। विशेष साम्प्रदाय व प्रगतिशील ताक़तो पर हमले तेज हो गये हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि जब मोदी सरकार वैश्विक पूँजी और उसके मुनफे के हित में आक्रामक रूप से सक्रिय है, तो फिर सतत संघर्ष की जगह सालाना हड़ताल का अनुष्ठान क्यों? यह सवाल भी लाज़िमी है कि ऐसी रस्मअदायगी में मज़दूर आन्दोलन के वास्तविक हिरावलों को शामिल होना चाहिए या नहीं?

एक अन्तराल के बाद एक दिनी हड़ताल कितनी कारगर?

एक अहम सवाल यह है कि जिस तरह से उदारीकरण की नीतियाँ मज़दूर वर्ग पर थोपने का काम तूफानी रफ्तार पकड़ चुका है, वैसे में क्या महज एक दिन की किसी हड़ताल से कोई दबाव या प्रतिरोध कायम रह सकता है? क्या इससे सरकार की निजीकरण, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या श्रम सुधार की जारी नीतियों में कोई फर्क पड़ेगा? आज पूँजी की ताक़त और फ़िरक़ापरस्ती जिस तरह से हमलावर है, उसके सामने कुछ एक विरोध प्रदर्शन या हड़ताल के क्या मायने हैं?

ये कुछ रस्मी कवायदें सत्ताधारियों पर मूलतः कोई फर्क नहीं डाल सकतीं। इसीलिए विरोधों के बीच नीतियाँ बन और लागू हो रही हैं। ऐसी रस्मी कवायदें मज़दूरों में एक निराशा भी पैदा करती हैं। यह भी एक अहम कारण है कि मज़दूरों, विशेष रूप से इन नीतियों का प्रमुख शिकार औद्योगिक मज़दूरों की भागेदारी लगातार घटी है।

आज के कठिन दौर में मज़दूर अधिकारों पर लगातार हो रहे हमलों का माकूल जवाब देने से लेकर मज़दूर वर्ग के मुक्तिकामी जुझारू संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए वास्तव में क्या दृष्टिकोण अपनाना चाहिए? इस पर विचार करना आवश्यक होगा।

केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की हक़ीक़त

यह समझना जरूरी होगा कि आज देश में मौजूद बड़े ट्रेड यूनियन महासंघों का चरित्र क्या है?

इसमें संदेह नहीं कि आज मज़दूर वर्ग पर हमला जितना विकट है, उस परिप्रेक्ष्य में मौजूदा केंद्रीय ट्रेड यूनियनें एक सुसंगत आंदोलन के रूप में इस लड़ाई को आगे ले जाने में असमर्थ हैं, बीएमएस और इंटक तो नव-उदारवादी नीतियों का विरोध भी करने को तैयार नहीं हैं। जबकि एटक और सीटू जैसे महासंघ साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की नीतियों को वस्तुतः स्वीकार चुकी हैं और इसी व्यवस्था में कुछ मोलतोल कर जैसे-तैसे विरोध के बहाने अपना अस्तित्व बचाने में लगी हैं।

यह भी छुपी बात नहीं है कि ये महासंघ अलग-अलग उन्हीं चुनावी पार्टियों से जुड़े हुए हैं, जो मज़दूर जमात पर खतरनाक नीतियां थोपती रही हैं। उदारीकरण के बहाने निजीकरण, छँटनी, तालाबन्दी, विनिवेशीकरण, एफडीआई, श्रम अधिकारों में कटौती जैसी नीतियां कांग्रेस की देन है, इण्टक उसी का घटक है। इन्हीं नीतियों को तेज गति देते हुए बाजपेई की भाजपा नीत सरकार ने बीमा क्षेत्र के निजीकरण से लेकर सरकारी कर्मचारियों के बुढ़ापे का पेंशन छीनने आदि के साथ खतरनाक द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट पेश की और अब मोदी सरकार की देशी-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हित में बेलगाम नीतियां सामने हैं। बीएमएस संघ-भाजपा का घटक है और मोदी सरकार के बचाव में खुलकर खड़ी हो चुकी है।

दूसरी ओर, केन्द्र में संयुक्त मोर्चे की सरकार का हिस्सा रहते और पश्चिम बंगाल में सत्तासीन रहते वामपंथी पार्टियां मज़दूर विरोधी नीतियों को लागू करने के लिए कुख्यात रहीं, जिनसे जुड़े सीटू, एटक जैसे महासंघ हैं। ‘मुहँ में राम, बगल में छुरी’ के तर्ज पर चलने वाले इन महासंघों से उम्मीद करना ही बेमानी होगा।

पिछले तीन दशक के मज़दूर आन्दोलनों पर गौर करें। परम्परागत केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के पास मज़दूर आन्दोलन को सतत विकसित क्रम में चलाने की न तो कोई रणनीति ही रही है और न ही जरूरत। फिर भी मज़दूरों के लगातार दबाव में उन्होंने कई रस्मी प्रदर्शन, भारत बन्द या हड़तालें कीं। ज्यादातर ये बैंक, बीमा, केन्द्रीय व कुछ राज्य कर्मचारियों तथा मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र तक सिमटी रहीं।

जबकि मज़दूर आन्दोलन की वास्तविक पक्षधर शक्तियाँ के सामने लगातार सक्रियता और जुझारूपन के बावजूद किसी व्यापक व सशक्त आन्दोलन विकसित करने की सीमाएं बनी हुई हैं। टुकड़ों में महज इलाके या किसी यूनिट तक संघर्ष सिमट कर रह जा रहे हैं। इस दौरान जुझारू व स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों के कई विष्फोट हुए, जो मज़दूरों के आक्रोश और जुझारूपन के द्योतक हैं। लेकिन इनकी भी एक सीमा बनती है।

तो मेहनतकश के वास्तविक हरावल क्या करें?

इस वस्तुस्थिति में दो रास्ते हैं – या तो हड़ताल के विरोध में खड़े होकर इन महासंघों का पर्दाफास किया जाय, या फिर हड़ताल में शामिल होकर व इनकी पहल का इस्तेमाल करके संघर्ष को गति देते हुए उनके चेहरे से नकाब उतारा जाय। इस प्रकार संघर्ष के अपने एजेण्डे को आगे बढ़ाया जाय।

गौरतलब है कि जब-जब क्रान्तिकारी यूनियनों व संगठनों ने इन रस्मीं हड़तालों में भागेदारी निभाई तब-तब इसका फलक निजी क्षेत्र के साथ ही असंगठित क्षेत्र तक विस्तारित हुआ। यह एक अनुभवसंगत बात व जमीनी सच्चाई है कि जैसे ही कुछ जुझारू पहल आगे बढ़े हड़ताल ने व्यापक रूप धारण किया। कार्यक्षेत्र के मज़दूरों की पहल व उत्साह में वृद्धि देखने को मिली। साथ ही महासंघों की हकीकत को मज़दूरों को समझने में मदद मिली और एक हद तक उनका चेहरा भी उजागर हो सका।

समर्थन के साथ सशक्त विकल्प की तैयारी

वैसे तो ऐसी हड़तालों के इस्तेमाल की अपनी एक सीमा है, लेकिन इससे कटकर पैदा होने वाली सीमा और बड़ी हो जाती है। मज़दूरों की आबादी सड़कों पर हो तब हम बाहर रहकर उनको वास्तविकता से परिचित नहीं करा सकते। इसलिए इन हड़तालों को सशर्त व सक्रिय समर्थन देने के साथ एक जुझारू विकल्प की तैयारी की दिशा में आगे बढ़ना आज के समय की माँग है।

इसी के साथ जुझारू यूनियनों व संगठनों द्वारा न्यूनतम सहमति के साथ साझे प्रयासों को गति देना भी समय की जरूरत है। एक सही और सच्चे आन्दोलन की माँग है कि निरन्तरता में आन्दोलनों को लगातार ऊपर उठाया जाये। अलग-अलग आन्दोलनों को एक कड़ी में पिरोया जाये और मज़दूरवर्ग के मुक्तिकामी संघर्ष से इसे जोड़ने के मशक्कत भरे प्रयास में आगे बढ़ा जाय।

एक सशक्त विकल्प विकसित करने में मज़दूरों की अपनी पहल का विकास और क्रान्तिकारियों के पहल लेने की क्षमता का विकास – दोनों ही आवश्यक पूर्व शर्त है। परम्परागत यूनियनों के समानांतर एक जुझारू आन्दोलन का विकास ही रस्मीं कवायदों पर रोक लगा सकती है। विकास की इस प्रक्रिया में अपने एजेण्डे पर ऐसी हड़तालों में शामिल होना ही वक्त की जरूरत है।

इस कठिन चुनौतीपूर्ण दौर में मज़दूर आन्दोलन को सही समझ के साथ आर्थिक लड़ाइयों तक सिमट चुके मज़दूर आन्दोलन को बाहर निकालना व नये तौर-तरीके विकसित करते हुए, उसे आगे बढ़ाना होगा। मज़दूरों के वेतन-भत्ते की लड़ाई तो रोजमर्रा के संघर्ष हैं। इस संघर्ष के साथ मज़दूर वर्ग को वैचारिक सोच से लैस करते हुए उन्हें अपनी मुक्ति के दीर्घकालिक आन्दोलन की ओर विकसित करना होगा।

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