जेएनयू : नही; ये सब अचानक नही हुआ

@5 जनवरी : जेएनयू सुनियोजित हमले का निशाना क्यों बन रहा है?

अपनी पढाई में अव्वल रहने के साथ देश-दुनिया के ज्वलंत मुद्दे हों या मज़दूर-मेहनतकश के संघर्ष, जेएनयू के विद्यार्थी हर जगह सहयोगी बनकर खड़े रहते हैं। कूपमंडूकता की जगह वे तर्कशील, वैज्ञानिक और प्रगतिशील विचारों के वाहक बने रहते हैं। छात्रों-शिक्षकों के बीच जनतान्त्रिक रिश्ता है। यही वे प्रमुख वजह हैं, जिसके कारण वे संघ-भाजपा और सत्ता प्रतिष्ठान के निशाने पर हैं। बीते 5 जनवरी की हमलावर घटना उसकी कड़ी है। …यह अचानक नहीं है… पढ़िए गिरीश मालवीय की पोस्ट…

…. कल रात जो जेएनयू में हुआ है उसके पीछे की सोच 2014 के बाद से पूरी रफ्तार से फली फूली है….। पहले एक शब्द को जनता के दिलो-दिमाग मे स्टेबलिश किया गया है कि जेएनयू में ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ है फिर इसका एडवांस वर्जन लाया गया कि यह ‘अर्बन नक्सल’ है।

जो व्यवस्था अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती है वह लोगों को ‘अरबन नक्सल’ घोषित कर देती है, जो सवाल पूछता है वो अरबन नक्सल है। जो गरीबों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के मुद्दे उठाता हैं, अरबन नक्सल है…। ये सब अब सरकार के निशाने पर हैं…।

पिछले दिनों यह अर्बन नक्सल शब्द प्रधानमंत्री की वोकेब्लरी में शामिल हुआ है। ….10 नव 2018 को प्रधानमंत्री जगदलपुर छत्तीसगढ़ की रैली में इस शब्द का प्रयोग करते हैं….। पिछले दिनों दिल्ली के रामलीला मैदान में मोदी कहते हैं कि ‘अर्बन नक्सल के जरिए एनआरसी के मुद्दे पर मुसलमानों में कांग्रेस अफवाह फैला रही हैं’।….जिस तरह से देश भर मे एनआरसी ओर CAA के मुद्दे पर प्रदर्शन देखने को मिले हैं, संविधान के मूल स्वरूप को कायम रखने को लेकर जनता में एक तरह की भावना जो पैदा हुई है उससे यह सरकार अंदर ही अंदर हिल गयी है, उसे इतने कड़े प्रतिरोध की उम्मीद नही थी।

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घटना के बाद रात में जेएनयू में हजारों छात्रों का प्रदर्शन

कल रात की घटना की भूमिका देश के गृहमंत्री दोपहर मे अपनी रैली में बांध चुके थे, दोपहर को उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ‘कांग्रेस पार्टी के टुकड़े-टुकड़े गैंग और अराजक तत्वों ने दिल्ली में हिंसक वारदातों को अंजाम दिया है। ये लोग लोगों को भटका रहे हैं और राजधानी दिल्ली का माहौल ख़राब करने पर तुले हुए हैं। ……’कांग्रेस के टुकड़े-टुकड़े गैंग लोगों के बीच भ्रम फैलाने में लगी हुई है। ये लोग दिल्ली के शांतिपूर्ण माहौल को अशांत करने पर तुले हुए हैं। ऐसे सभी लोगों को सबक सिखाने का वक्त आ चुका है’…।

‘सबक सिखाने’ का वक्त आ गया है मतलब साफ है कि सिग्नल ग्रीन है,….जाओ और हमले करो!

कल जेएनयू की रात की तुलना 1938 की हिटलर कालीन जर्मनी में 9-10 नवंबर की रात से की जा सकती हैं, (जिसे क्रिस्टल नाइट या नाइट ऑफ ब्रोकन ग्लास कहा जाता है) जहाँ यहूदियों को बुरी तरह से मारा पीटा गया था, ऐसा पूरे देश भर में किया गया।

देशभर में विरोध प्रदर्शन जारी

….मोदी के भारत मे वह दिन भी दूर नहीं दिख रहा है जब यही खेल एक साथ पूरे देश मे खेला जाएगा। ….यहाँ भी ‘सबक सिखाने’ के आह्वान किये जा रहे हैं। जल्द ही हिटलर की ही तरह Final Solution’ यानी अन्तिम समाधान’ और ‘इवैक्युएशन’ का कॉल दे दिया जाएगा। ….मोदी-संघ के ‘वाइप आउट’ एजेंडे को मूर्तरूप देने में कोई कोर कसर नही छोड़ते दिख रहे हैं। …..और शुरुआत हो चुकीं है…..

-गिरीश मालवीय की फेसबुक पोस्ट

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