सप्ताह की कविता : फ़िरकापरस्ती के ख़िलाफ़ 5 कविताएँ !

साम्प्रदायिक फसाद / नरेन्द्र जैन

रोजी रोटी का
सवाल खड़ा करती है जनता
शासन कुछ देर सिर खुजलाता है
एकाएक साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है

हर हाथ के लिए काम माँगती है जनता
शासन कुछ देर विचार करता है
एकाएक साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है

अपने बुनियादी हक़ों का
हवाला देती है जनता
शासन कुछ झपकी लेता है
एकाएक साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है

साम्प्रदायिक फसाद शुरू होते ही
हरक़त में आ जाती हैं बंदूकें
स्थिति कभी गम्भीर
कभी नियंत्रण में बतलाई जाती है
एक लम्बे अरसे के लिए
स्थगित हो जाती है जनता
और उसकी माँगें

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में शासन
अपनी चरमराती कुर्सी को
ठोंकपीट कर पुन: ठीक
कर लेता है।


अन्धी वतन परस्ती हमको किस रस्ते ले जायेगी / गौहर रज़ा

धर्म में लिपटी वतन परस्ती क्या-क्या स्वांग रचायेगी
मसली कलियाँ, झुलसा गुलशन, ज़र्द खि़ज़ाँ दिखलायेगी

यूरोप जिस वहशत से अब भी सहमा-सहमा रहता है
खतरा है यह वहशत मेरे मुल्क में आग लगायेगी

जर्मन गैसकदों से अबतक खून की बदबू आती है
अन्धी वतन परस्ती हम को उस रस्ते ले जायेगी

अन्धे कुएँ में झूठ की नाव तेज़ चली थी मान लिया
लेकिन बाहर रौशन दुनिया तुम से सच बुलवायेगी

नफ़रत में जो पले बढ़े हैं, नफ़रत में जो खेले हैं
नफ़रत देखो आगे-आगे उनसे क्या करवायेगी

फ़नकारों से पूछ रहे हो क्यों लौटाये हैं सम्मान
पूछो, कितने चुप बैठे हैं, शर्म उन्हें कब आयेगी

यह मत खाओ, वह मत पहनो, इश्क़ तो बिलकुल करना मत
देश द्रोह की छाप तुम्हारे ऊपर भी लग जायेगी,

यह मत भूलो अगली नस्लें रौशन शोला होती हैं
आग कुरेदोगे चिंगारी दामन तक तो आयेगी


राजा ने आदेश दिया / देवी प्रसाद मिश्र

राजा ने आदेश दिया : बोलना बन्द
क्योंकि लोग बोलते हैं तो राजा के विरुद्ध बोलते हैं

राजा ने आदेश दिया : लिखना बन्द
क्योंकि लोग लिखते हैं तो राजा के विरुद्ध लिखते हैं

राजा ने आदेश दिया : चलना बन्द
क्योंकि लोग चलते हैं तो राजा के विरुद्ध चलते हैं

राजा ने आदेश दिया : हँसना बन्द
क्योंकि लोग हँसते हैं तो राजा के विरुद्ध हँसते हैं

राजा ने आदेश दिया : होना बन्द
क्योंकि लोग होते हैं तो राजा के विरुद्ध होते हैं

इस तरह राजा के आदेशों ने लोगों को
उनकी छोटी-छोटी क्रियाओं का महत्त्व बताया


अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो / राहत इन्दौरी

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है


दरिंदा / भवानीप्रसाद मिश्र

दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला

स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला

और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई

मानवता
थोडी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई !



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