वर्ष 2019 : मेहनतकश जनता के लिए क़यामत का साल

गुजर गए भयावह साल के दर्द को नए साल में समतामूलक समाज के निर्माण के संघर्ष में बदलना होगा!

गुजरा साल मेहनतकश आवाम के लिए भयावह दुख-तक़लीफों, अधिकारों के छिनने में तेजी, साम्प्रदायिक बंटवारे की और तेज होती रफ़्तार के बीच महँगाई-बेरोजगारी के बनते नए रिकार्डों, छंटनी-बंदी व दमन के साए में बीता। तो यह मज़दूरों के बिखरे, लेकिन जुझारू संघर्षों के साथ भी गुजरा। जहाँ सरकारी संस्थाएं व मशीनरी सरकारी नियंत्रण में क़ैद होती गईं, वहीँ प्रतिरोध की आवाज़ें भी बुलंद होती रहीं।

मोदी सरकार ने पूरी हठधर्मिता के साथ पूरे साल दो एजेंडों पर तेजी से एक साथ काम किया और लागू किया। पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने मालिकों के हित में श्रम कानूनों में जो गंभीर बदलाव शुरू किये थे, इस साल उन्हें अंतिम रूप दिया गया। एक तरफ देशी-विदेशी मुनाफाखोरों के हित में श्रम क़ानूनी अधिकारों पर डकैती और तेज हुई, निजीकरण-छंटनी-बंदी बेलगाम हुई, महँगाई-बेरोजगारी भयावह रूप लेती रही, तो दूसरी तरफ पुलवामा, तीन तलाक, कश्मीर, सीएए, एनआरसी, एनपीआर की प्रक्रिया के साथ देश के लोकतांत्रिक ढाँचे को तबाह करके साम्प्रदायिक विभाजन की गति बेलगाम हो गई। प्रचंड बहुमत ने इन दोनों प्रक्रियाओं को और गति दे दी।

दोनों ही मेहनतकश जनता के ऊपर बड़ा और खतरनाक हमला है। आइए इसे देखें-

मज़दूरों के अधिकार छिनने में तेजी

देशी-विदेशी मुनाफाखोरों के हित में लंबे संघर्षों के दौरान हासिल 44 श्रम कानूनी अधिकारों को कमजोर करके चार संहिताओं को कानूनी रूप देने, स्थाई रोजगार की बुनियाद को ही नष्ट करने के लिए फिक्सड टर्म, नीम ट्रेनी आदि को कानूनी दर्जा देने, विभिन्न प्रकार के अस्थायी एवं अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों को ‘ कामगार’ की श्रेणी से बाहर करने, अपनी माँग उठाने के कानूनी अधिकार से वंचित करने, 9 से 16 घंटे तक मनमाने काम के घंटे को क़ानूनी रूप देने, हड़ताल करने से रोकना और यूनियन गठित करने के अधिकारों पर हमला आदि मज़दूरों पर बड़े हमले हुए।

निजीकरण का घोडा बेलगाम

इस साल जनता के खून पसीने से खड़े रेलवे, शिपिंग कंपनी, दूरसंचार, कोल क्षेत्र, खदान, आर्डिनेंस सहित ज्यादातर सरकारी सार्वजनिक उद्योगों को ओने-पौने दामों में अदानिओं-अम्बानियों को सौंपने, छँटनी-बंदी को बेलगाम करने, सरकारी कर्मचारियों को जबरिया अवकाश के बहाने निकालने आदि का काम तेजी पकड़ चुका है।

मोदी सरकार-2 के कार्यकाल में निजीकरण के पहिए की चाल और तेज हो गई है। सरकार उन कंपनियों को भी निशाना बनाती रही है, जो देश की अर्थव्यस्था व सुरक्षा की नजर में समाज की रीढ़ हैं।

छंटनी-बंदी के बीच बेरोजगारी भयावह

एक तरफ बेरोजगारी 45 सालों में चरम पर रहा, दूसरी तरफ सरकारी क्षेत्र के तेजी से निजीकरण के साथ निजी क्षेत्र – ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल व अन्य उद्योगों में मंदी के बहाने भारी तादाद में मज़दूरों की छंटनी होती रही। मज़दूर यूनियनों-संगठनों को कमजोर करने और  उन पर दमन का पाटा तेजी से चलता रहा।

कार्यस्थल की दुर्घटनाओं में तेजी

कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की घटनाएँ और बढ़ती रहीं। फैक्टरियों में आग लगने या दुर्घटनाओं में मज़दूरों का बेमौत मरना आम बात हो गयी है। साल के अंतिम महीने में दिल्ली की एक फैक्टरी में आग लगने से 45 से अधिक मज़दूरों के जलकर मरने की घटना बानगी मात्र है।

महँगाई से बेहाली

पूरे साल महँगाई सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ती रही। गरीबों से उनका प्याज भी छिन गया। शिक्षा व चिकित्सा आम लोगों की पहुँच से और ज्यादा बाहर होती चली गई।

महिला उत्पीडन में बेतहाशा बृद्धि

इस साल महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध और तेजी से बढ़ते रहे। मुजफ्फरपुर आश्रय गृह, हैदराबाद में 27 वर्षीय पशु चिकित्सक की सामूहिक बलात्कार और बेरहमी से हत्या, राजस्थान के खेड़ली गांव में छः वर्षीय मासूम से जघन्य अपराध, उन्नाव की बलात्कार पीड़िता को जिंदा जलाने, बिहार के बक्सर में रेप के बाद हत्या महज कुछ बानगी मात्र है। जबकि उन्नाव गैंगरेप में कुलदीप सेंगर के अपराधिक मामलों को बचने का सत्ताधारी खेल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के यौन उत्पीड़न की शिकार पीडिता की ही जेल, सुप्रिम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पर एक महिला के आरोप का मानकों के विपरीत निस्तारण इस साल का न्याय की आस पर एक जिंदा सवाल रहा।

हाल में जारी एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों (वर्ष 2017) में हर दिन 90 बलात्कार हो रहे हैं। आज 2019 की स्थिति तो और भी अधिक भयावह होगी। हालत ये हैं कि देश भर  मे तीन लाख 59 हज़ार 849 मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित हैं।

कथित हिन्दू राष्ट्र के बहाने जनता में बंटवारा तेज

इसी के साथ मोदी सरकार असल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए धार्मिक उन्माद फैलाकर जनता की एकता तोड़ने की साजिश रचती रही। सरकार की नीतियों के विरोध करने के जनवादी अधिकार को पुलिस व सुरक्षा बलों के सहारे कुचले जाने की रफ़्तार भयावह हो गई।

वर्ष 2019 को बीजेपी सरकार द्वारा अपने हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे को अमली जामा पहनाने का साल रहा। पिछले पांच सालों की तैयारी के बाद यह साल उसको लागू करने का रहा, जो प्रचंड बहुमत का दंभ है। इस प्रकार यह जनता में भयानक बंटवारे की खतरनाक योजनाओं को तेजी से अमलीजामा पहनाते हुए देश के संवैधानिक लोकतांत्रिक ढाँचे पर बड़ा हमला बोला है।

वर्ष की शुरुआत में, चुनाव से पूर्व पुलवामा हमला और फिर सर्जिकल स्ट्राइक, चुनाव बाद तीन तलाक, असम में एनआरसी लागू करने, कश्मीर के टुकड़े करके, धारा 370 को समाप्त करके कश्मीर घाटी के 75 लाख लोगों को अनिश्चितकाल के लिए बंदी बनाने के क्रम में अब संविधान व धर्मनिरपेक्षता विरोधी नागरिकता संशोधन अधिनियम, देशव्यापी एनआरसी और एनपीआर की प्रक्रिया तेज कर दिया है।

इसके साथ ही दमन के बीच इसके ख़िलाफ़ छात्र-नौजवान-मज़दूर-संवेदनशील नागरिक लड़ा रहे हैं, जो आने वाले साल के लिए एक रौशनी का काम कर रहा है।

सर्वोच्च अदालत की खास सक्रियता

देश की सर्वोच्च अदालत की इस वर्ष खास सक्रियता में तेजी रही। जहाँ साढ़े सात सालों से जेल में बंद बेगुनाह मारुति मज़दूरों को ज़मानत की अर्जी ख़ारिज हुई, वहीँ राफेल डील भ्रष्टाचार का मामला ही ख़त्म हो गया, तो उन्नाव बलात्कारी को ज़मानत मिली और उसे हत्या की छूट मिली।

खास सक्रियता संघ एजेंडे पर भी कायम रही। सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को बाबरी विध्वंस पर आस्था के बिना पर फैसला सुना दिया। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मसले पर सकारात्मक फैसला बाद में आस्था के केंद्र में आ गया।

सेना का भी केन्द्रीकरण

पिछले पांच साल के कार्यकाल में देश के सारी संस्थाओं के केन्द्रीकरण की योजना को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार के हाथों में केन्द्रित करके संवैधानिक ढाँचे को नष्ट-भ्रष्ट करने का खेल इस वर्ष और आगे आगे बढ़ता रहा। साल के अंतिम दिन जनरल बिपिन रावत को तीनों सेनाओं- थल सेना, नौसेना और वायु सेना का चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ (सीडीएस) नियुक्त कर दिया।

मेहनतकश पर चौतरफा मार

ऐसे में देश की जनता, विशेष रूप से मेहनतकश जनता, अब तक के सबसे खतरनाक बंटवारे की शिकार बन गई। मेहनतकश आवाम पर यह दोहरा हमला पूँजीपतियों के भारी मुनाफे की राह बनाने के साथ संघ की दीर्घकालिक फिरकापरस्ती की योजनाओं को भी लागू करने का सबब है।

ध्यान रहे कि साल 2020 भी श्रम अधिकारों में और कटौती, निजीकरण-छंटनी-बंदी, महँगाई-बेरोजगारी के साथ हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे को जारी रखने का साल साबित होगा, जिनमें बाकी श्रम संहिताओं के साथ यूनिफॉर्म सिविल कोड और धर्म परिवर्तन क़ानून लाने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इसलिए जुझारू एकता के साथ संघर्ष तेज करना होगा

आज मोदी सरकार द्वारा योजनाबद्ध तरीके से धार्मिक कट्टरता और उन्माद, अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद का ज़हर फैला कर परदे के पीछे से देश की आम जनता, ख़ास कर मजदूरों, पर इतने बड़े-बड़े हमले करने की योजना लागू होम रही है। सरकार के लिए ‘देशहित’ का मतलब अम्बानी-आदानी जैसे पूँजीपतियों का हित ही है। ‘देशहित’ का मतलब मज़दूर-मेहनतकश जनता का हित होना चाहिए। इसके लिए मज़दूर वर्ग को गुलामी की जंजीरों में जकड़कर रखने वाली मौजूदा पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष तेज करना पड़ेगा।

फिर भी मज़दूर लड़ रहे हैं

आज दमन के वावजूद देश भर में मज़दूर संघर्षरत है। रेल, रोडवेज, आर्डिनेंस फैक्ट्रियों के मज़दूर निजीकरण के खिलाफ संघर्षरत है, ऑटोमोबाइल, आई टी के, होंडा से लेकर माइक्रोमैक्स, एमकोर, वोल्टास, एलजीबी, शिरडी, शिवम्, डाइकिन आदि के मज़दूर छंटनी-उत्पीडन के खिलाफ संघर्षरत है, आंगनवाड़ी, मिड-डे-मील, आशा वर्कर, मनरेगा मज़दूर मजदूरी के सवाल पर संघर्षरत है।

आज देश की मेहनतकश जनता के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा है। अपनी मूलभूत बुनियादी अधिकारों से पहले से ही वंचित मेहनतकश जनता और भी वंचित हो रही है। मेहनतकाश आवाम की तबाही पर मुनाफाखोरों की मीनारें खड़ी हो रही हैं। ऐसे में जनता को सांप्रदायिक आधार पर भयानक रूप से बाँट देने की हर साजिश – चाहे वह कश्मीर, 370 के नाम पर हो, चाहे सीएए-एनआरसी-एनपीआर आदि के नाम पर हो – का और इस रूप में चलने वाले सभी दमन का विरोध जरूरी और अवश्यंभावी है।

देश की मेहनतकश जनता को आने वाले साल इन्हीं भयावह चुनौतियों के बीच अपनी संग्रामी एकता को मजबूत करते हुए शोषणविहीन समाज के निर्माण के संघर्ष को तेज करना होगा!

%d bloggers like this: